शुक्र है दुआ तो मांग सकती हूं। इन सब चीज़ों से रुक्सत तो हो सकूँगी।


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तेरी नेमतों का जितना शुक्र अदा करू कम है, सब कुछ दिया अपने अपनी अज़ीम मखलूक इंसान को पर मैं एक चीज़ के लिए ताहे दिल से आपका शुक्र अदा करना चाहती हूँ और वह है मौत का । बदलते वक्त के साथ लोग इतना बदलते जा रहे है आपसी प्यार तो दूर दुसरो को रुलाने और रुसवा करने के लिए साज़िशें बुनते है । 

एक दूसरे को नफरत की निगह से देखते है ,बड़े ऊँची आवाज़ में डाट दे तो छोटे  उन को उससे से  भी ज़्यादा ऊँची आवाज़ में जवाब देना जानते है। मेरी उम्र अभी इतनी नहीं जो में ये कह सकु मैंने ज़िन्दगी के हर पहलू को देखा है पर लगभग हर  मुकाम से गुजरी ज़रूरी हूं।

बंधे रिश्तो को टूटते हुए देखा है एक दूसरे के लिए नफ़्सा नफसी देखी है आज मुझे मेरे नानू की बाते बिल्कुल ठीक लगती है आज की पीढ़ी की बातें करते करते क्यों उनकी आँखे नम हो जाती है क्यों वो आज की पीढ़ी पर इतना अफ़सोस करते है, बेगड़ते हालात को देख कर मुझे इतना बुरा लगता है तो उन का गमगीन होना लाज़मी है और आने वाला वक़्त में  क्या होगा ये कोई नही जानता पर यकीनन हालात आज के दौर से बत्तर ही होंगे जब मुझे अभी के हालात देख कर  सुकून नहीं मिलता सबर नही होता। 

मैं उस उम्र में पहुंच कर कैसे हालात को देखूँगी शुक्र है मौत है ! वरना सब तरफ यही हाल देखूँगी कम से कम मौत की दुआ तो मांग सकती हूं। इन सब चीज़ों से रुक्सत तो हो सकूँगी।



तैबा ख़ान एक ऐसी लेखक है  जिनका दुनिया देखने का नज़रिया अलग है। इन की लेखनी में अलग रस देखने को मिलता है, जिस में नवाबों के शहर की तहज़ीब साफ नज़र आती है। इस वक़्त ये एडवरटाइजिंग कंपनी बतौर कंटेंट राइटर काम कर रही है और ये बहुत बहुत क्रिएटिव है। 


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