मैं और मेरा एटीएम।

 By - अमित मंडलोई





मैं और मेरा एटीएम अक्सर ये बातें करते हैं कि तुम नहीं होते तो कैसा होता। मैं बैंक में पहले की तरह अलग-अलग रंग की पर्चियां भरता। कैशियर से बेवजह हंसता मुस्काता। कभी कतार लंबी होती तो आसपास के लोगों पर ज्ञान बघारता। बैंकिंग सिस्टम से शुरू कर नेताओं की हरकतों, सब्जियों के दाम और मौसम की बीमारियों तक पर भाषण देता। बैंक कर्मचारियों की ढीले रवैये का मजाक बनाता। पानी के पुराने मटके और गंदे ग्लास पर फब्तियां कसता। मेरे कटाक्ष पर झुंझलाते बैंक अफसरों के चेहरे की खीज पढक़र सुकून महसूस करता।

मगर ये हो न सका। मगर ये हो न सका और अब ये आलम है कि तुम मेरी जेब में हो। जिस दिन पहली बार तुम्हे देखा तो देर तक बस देखता ही रह गया। एक पल को बैंक में इस टेबल से उस टेबल, इस दस्तखत से उस दस्तखत की सारी मशक्कत काफूर होती नजर आई। जरा सी गलती पर बैंक कर्मचारियों की वे झिड़कियां, जाने कहां से चले आते हैं? तारीख भी ठीक से लिखते नहीं आती? ओवर राइटिंग क्यों करते हो? पढ़ते नहीं आता क्या? साफ लिखा है फॉर आफिशियल यूज। और मैं झुंझला कर रह जाता, खिसियाता, धीरे से होंठों के बाहर एक फीकी मुस्कान ठेल देता। अभी ठीक करता हूं सर, नई पर्ची बना दूं क्या, दोबारा यहां भी दस्तखत कर देने से हो जाएगा क्या? कहकर किसी तरह अफसर की मिजाजपुर्सी करता। 

पहली बार जब कांच की पेटी के भीतर तुम्हारी संगत में बैठा तो ऐसा लगा जैसे उन सारे घावों पर किसी मरहम रख दिया हो। कार्ड स्वैप किया और करारे नोट बाहर। सुबह-दिन, दोपहर हर वक्त मोबाइल नेटवर्क की तरह मेरा बैंक मेरे साथ दौडऩेे लगा। मैं जानता था ये सारी ताकत सिर्फ तुम्हारी है। मैंने तुम्हारे लिए नए होल्डर खरीदे, पर्स में अलग जगह बनाई, जहां अदब से तुम्हे रख सकूं। दुनिया की नजर से छुपा सकूं। तुम और तुम्हारा पिन दोनों ही मुझे बहुत प्यारे थे। माशूका के प्रेम पत्र की तरह, मैं तुम्हे सहेजता रहा और तुम मुझे कतारों से बचाते रहे, वक्त-बेवक्त आने वाली जरूरतों में काम आते रहे। 

जिंदगी की पटरी पर तुम्हारे साथ मेरा प्रेम बढ़ता जा रहा था। तभी अचानक एक दिन रात के 8 बजे मेरे 12 बज गए। ऐसा लगा जैसे दो प्रेमियों को एकांतवास करते हुए माशूका के खूंखार बाप ने देख लिया। और फिर सबकुछ बदल गया। तुम्हारा होना न होना जैसे एक बराबर हो गया। अब तुम साथ थे फिर भी लंबी कतारें थीं। बैंक से भी कहीं ज्यादा बड़ी। और गुस्से में भरा मैं अब भाषण नहीं दे पा रहा था। घने अवसाद में था। प्रेम का टूटना और बिखर जाना क्या होता है, तभी समझ आया जब चौराहों पर तुम्हारे साथ मेरा इश्क यूं नीलाम हुआ। 

खैर मुझे सहने की आदत है। वह मेरी मजबूरी है या फिर शौक मैं अब तक नहीं समझ पाया, लेकिन मैं सहने के सांचे में ढला हूं। इस बदलाव को भी तुम्हारी नई अदा मानकर मैं इसके साथ भी ढल गया। कतारों में लगा, धक्के खाए, बिना भाषण दिए इंतजार करता रहा। खुश था कि वक्त बुरा है, लेकिन फिर भी तुम साथ हो। उम्मीद थी कि कभी तो यह सूरत बदलेगी और फिर हम लौट आएंगे अपने पुुराने अड्डों पर। वही करारे नोटों की रौनक होगी। 

लेकिन यह क्या, अब तो तुम्हारा मिजाज मौसम से ज्यादा बदलता है। सेंसेक्स कम उतरता-चढ़ता है तुम ज्यादा मचलते हो। अभी भी फिर तुम रूठे हो, नोटों से रीते हो। मैं महोब्बत में भरकर तुम्हे मशीन में लगाता हूं लेकिन बदले में नोट नहीं सिर्फ एक मैसेज पाता हूं। तकनीकी खराबी से ये एटीएम कुछ समय के लिए बंद है, कैश खत्म हो गया है कृपया समीप के फलां एटीएम पर संपर्क करें। और बेचारे वित्त मंत्रीजी हैं, सफाई देते हैं कि कैश का संकट नहीं है, अचानक नोटों की मांग बढऩे से दिक्कत आई है। उन्हीं के राज्य मंत्री जरूर थोड़े ईमानदार दिखते हैं, कबूल कर लेते हैं कि कुछ राज्यों में संकट है। आरबीआई कुछ और ही कहती है, सवा लाख करोड़ कैश बाजार में है, जो जरूरत से ज्यादा है। 

मैं कभी इन बयानों को कभी खाली एटीएम को देखता हूं। फिर मुझे आंध्र के चीफ सेक्रेटरी की महीनेभर पहले भेजी गई चिट्ठी याद आती है, झारखंड से गई सूचना भी अलर्ट करती है। फिर शिवराज की आशंका कौंधती है, लोग नोट इकट्ठा कर रहे हैं। जमाखोरी हो रही है, मैं फिर सोच में पड़ जाता हूं। नीबू, प्याज और टमाटर की कतार में नोट को खड़ा पाता हूं। आरबीआई के सुझाव पर अब हर अप्रैल में, मैं भी कुछ नोट दबाकर रख लूंगा और एफडीआरआई से पहले कुछ तो जुगाड़ लगा लूंगा। 

दोस्त माफ करना भरोसा तुम से नहीं इस व्यवस्था से उठ रहा है। मेरे मुंह से जो खांस रहा है उसका धुआं मेरे फेफड़ों में भरा है। यह कुंठा का बलगम है, जो नसों को जाम किए हुए है। एक नीरव मोदी पूरा खजाना लूट जाता है और मैं अपने ही पसीने के कमाई के लिए तरसता हूं । तब खुद को चौराहे पर खड़ा पाता हूं। तुमसे प्यार करूं, नफरत करूं या फिर विरक्त ही हो जाऊं। ले आऊं एक मटका और गाड़ दूं घर के पिछवाड़े में। वहीं बूंद-बूंद कर भरता रहूंगा कुछ सिक्के कुछ नोट। मैं अक्सर अपने आप से यही बात करता हूं। क्या तुम न हो तो ही शायद जिंदगी कुछ बेहतर हो।





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