अगर आप इंदौर से हो तो ये खबर आपको झंझोर कर रख देगी।

ये हमारा इंदौर नहीं हो सकता।




यकीन करना मुश्किल है कि हमारे अपने शहर के बीचोबीच कोई वहशी मां के पास सोई चार महीने की दूधमुंही बच्ची को उठाकर ले गया और दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या कर दी। पूरे शहर को कठघरे में लेने जैसी वारदात। ये कैसा इंदौर बना लिया हमने। स्मार्ट सिटी, स्वच्छ इंदौर, एजुकेशन हब, इंडस्ट्री हब, मेडिकल हब की होड़ और चकाचौंध में कहां मर गई हमारी संवेदनाएं। मानवीय मूल्य कहां जाकर दफन हो गए हैं। फूल सी मासूम बच्ची पर इंदौर की धरती पर खड़ा होकर कोई ऐसी निगाह कैसे डाल सकता है।

ये देवी अहिल्या का शहर है, जिसे हमारे पूर्वजों ने खून-पसीने के साथ ही दया, करुणा, स्नेह और मैत्री के संस्कारों से सींचा है। हमने कभी मूल्यों की शर्त पर तरक्की को स्वीकार नहीं किया, फिर आज ऐसा क्या हो गया है। इस घटना के आगे सब बौना और निरर्थक लग रहा हैै। अगर हम अपने शहर में एक चार महीने की बच्ची को सुरक्षा नहीं दे सकते तो फिर ये सारे तामझाम किस काम के हैं। कहां है इस शहर का कानून और उसका रसूख।

उस बच्ची पर गलत निगाह डालने से पहले दरिंदे की रूह क्यों नहीं कांपी, कलेजा क्यों नहीं फट गया। खून से सनी वे सीढिय़ां हम पर सबसे बड़ा बोझ बन गई हैं। हमसे ज्यादा बड़ा बोझ उन जिम्मेदारों के लिए, जिनका कर्तव्य है इस तरह की घटनाओं को रोकना। शहर के हृदय स्थल पर जो एक बच्ची की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं ले सकते, उन्हें पद पर बने रहने का अधिकार क्यों होना चाहिए। 



कहां गया था पुलिस का पूरा अमला, कौन वहां रात को ड्यूटी पर तैनात था। शर्म आनी चाहिए उन तमाम लोगों को जो लोगों की सेवा और सुरक्षा के नाम पर उनकी गाढ़ी कमाई से वेतन पाते हैं। पीड़ितों की आर्त पुकार क्यों उन तक नहीं पहुंच पाती है। वे किसी पीड़ित को कैसे टरकाकर भगा देते हैं कि साहब आएं तब आना।

क्या शहर में कानून और थाना सिर्फ अफसरों की जागीर बनकर रह गया है। क्या अफसर होंगे तो ही लोगों को सुरक्षा मिलेगी, वरना बड़े से बड़े अपराध पर सब तमाशा देखते रहेंगे। क्या सारी धाराएं कठपुतलियों की तरह अफसरों के इशारे पर नाचती हैं। कहां हैं और कौन हैं वे अफसर जिन्होंने थानों को बपौती समझ लिया है। कानून को गिरवी रख लिया है। बंद कर देने चाहिए ऐसे थाने, जहां कानून नहीं बल्कि अफसरों का राज है। ये निर्लज्जता की पराकाष्ठा है। अगर कानून के रखवाले जिम्मेदारी नहीं निभा सकते तो बेहतर है कि पद छोड़ दें। 



एक सवाल यह भी है कि जब शहर में इतने रैन बसेरे हैं, उनके नाम पर लाखों रुपए का बजट खर्च हो रहा है, तो फिर किसी परिवार को फुटपाथ पर इन वहशी दरिंदों के बीच सोने के लिए क्यों विवश होना पड़ रहा है। क्यों कोई उन्हें जाकर नहीं देखता, उन्हें रैन बसेरा भेजने की कोशिश नहीं करता या रैन बसेरे भी चंद लोगों के अड्डे बनकर रह गए हैं, जहां वास्तविक जरूरतमंद की पहुंच ही नहीं है। उस बच्ची को इंसाफ तभी मिल पाएगा जब तमाम दोषी अपने अपराधों की सजा पाएंगे।





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