औरत एक खबर।


 Credit - Feminism in india

चंद औरतें कामयाब होती हैं और नेता लोग उस पर भी उलजुलूल बयान देने लगते हैं। चंद औरतें कामयाब होती हैं और हम समस्त नारी जाति को सशक्त देखते हैं। लेकिन मुझे अभी भी अपने पति के द्वारा उसके चेहरे पर काटे गए दांतों के निशान दिखाती औरत दिखती है। मुझे अभी भी पति के द्वारा मारे गए चाकू के निशान लिए खड़ी एक औरत ही दिखती है। 

मानती हूं कि कुछ महिलाएं कामयाब हुई हैं। लेकिन जो महिलाएं आज भी पति की मार-काट सह रही हैं उनका क्या होगा। इस पिटाई से बचने के लिए अगर वो कानून का भी सहारा लेती है तब भी वो अकेली ही पड़ती चली जाती हैं।  या वो पहले ही कानूनी लफड़ों के बारे में सोचकर अपने कदम दहलीज से बाहर नहीं निकालतीं। 

जब भी कोई महिला ऐसे लाल-नीले निशान लेकर आती है तो मुझे बहुत दुख होता है। और मन करता है जो आदमी ऐसा कर रहा है उसे दो चपत उसकी ही भाषा में लगाएं जाएं। अगर यही सलाह पिटने वाली उन महिलाओं को दो तो उनके तर्क होते हैं। 'मैं मारू उन्हें?' मुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगो' या वो कहेंगी की उनका मरना तो शोभा देता है'। उफ्फ....सहने की भी हद होती है। अरे कभी हिम्मत करो ऐसे वहशीपन से लड़ने की। फिर देखो तुम्हारी हिम्मत क्या रंग लाती है। 

Credit - google 

महिलाएं आज भी घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं और पहले भी होती थी। लेकिन पहले एक सामाजिक दबाव भी रहता था। जब किसी औरत को उसका पति पीट रहा होता था तो आस पड़ोस के लोग उसे बचा लेते थे। लड़ाई को खत्म कराने की कोशिश करते थे लेकिन आज यह सब कुछ नहीं होता है। अगर एक बन्द कमरे में कोई औरत पीटी जा रही है तो कोई उसका दरबाजा खटखटाने नहीं जाता। 

ऐसी घटनाएं आपके आसपास भी ज़रूरी घटती होंगी पर आप कितना उन्हें बचा पाते होंगे मुझे नहीं मालूम। अगर आप वाकई ऐसी घटनाओं के खिलाफ सामाजिक दबाव बनाते हैं और ऐसी गतिविधियां रुकती हैं तो आप बधाई के पात्र हैं। पिछले दिनों जो घटनाएं घटी उन्होंने इतनी बेचैन पैदा कर दी कि मेरे अंदर से भी कविता के ये शब्द छलक पड़े....

उसके साथ तीन दिन 
बलात्कार हुआ
मेरे पास खबर आई
पर मेरे दिमागी तंतु
मेरी रूह सिहरती
हुई खून के थक्के-सी
जम गई थी।

वो बलात्कार से
झुलसी हुई-सी
लकड़ी बन गई थी
पर फिर भी
न्याय के लिए 
सुलग रही थी
उसे मैंने आत्मदाह करते 
मुख्यमंत्री आवास के
 बाहर देखा
मेरी आँखें फंटी
तो थी
पर फंट क्यों नहीं गई
मुझे नहीं मालूम

मेरे घर में
मेरी आँखों के सामने
मेरी अपनी अपने पति के
चाकुओं की मार के
लाल-नीले निशान 
लिए खड़ी थी
मैं गुस्साई तो 
पर रोइ नहीं
क्योंकि वो आपके
और मेरे लिए
महज एक खबर थी
महज एक खबर




यह लेख दिल्ली से मीना ने लिख भेजा हैं। उन्हें लिखने का सिर्फ शौक ही नहीं ये उनका पेशा भी है। कविता, कहानी, राजनीति और महिला मुद्दों जैसे विषयों पर लिखती है। सिर्फ लिखती ही नहीं बल्कि उन मुद्दों पर समाज में काम भी करती हैं। लिखना उन्हें पसंद है शायद इसीलिए वो एक पत्रकार हैं।


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