एससी - एसटी ऐक्ट में क्या बदलाव हुआ है।


By - प्रद्युम्न यादव




एससी/एसटी ऐक्ट में क्या बदलाव हुआ है और उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। 

पढ़िए।


1. इस एक्ट के तहत अब कोई भी शिकायत मिलने पर तत्काल एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी। सबसे पहले शिकायत की जाँच डीएसपी स्तर के पुलिस अफसर द्वारा की जाएगी।

भारत जैसे देश में जहां ब्यूरोक्रेसी में सवर्ण बहुसंख्या में हैं और गैर दलित , आदिवासी एससी /एसटी से मज़बूत स्थिति में वहां डीएसपी किसके पक्ष में और किस स्तर की जांच करेंगे ये समझना मुश्किल नहीं है। 

2. दूसरा संशोधन तो अपराधी के लिए सोने पर सुहागा है। इसके तहत न्यायालय द्वारा स्पष्ट किया गया है कि यह जाँच पूर्ण रूप से समयबद्ध होनी चाहिये। जाँच किसी भी सूरत में 7 दिन से अधिक समय तक नहीं चलनी चाहिए।

मतलब ये कि मामले में जांच के दौरान कोई तथ्य या सबूत आये उसके पहले ही एक हफ्ते के भीतर समय का हवाला देकर उसे निपटा दिया जाएगा। 

3. अभियुक्त की तत्काल गिरफ्तारी नहीं की जाएगी। सरकारी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली अथॉरिटी की लिखित मंज़ूरी के बाद गिरफ्तारी होगी और अन्य लोगों की ज़िले के एसएसपी की लिखित मंज़ूरी के बाद। 

एक सवर्ण अधिकारी या गैर दलित/आदिवासी अधिकारी , अभियुक्त की गिरफ्तारी में कितनी रुचि लेगा यह आसानी से समझा जा सकता है।  इससे होगा ये की तत्काल गिरफ्तार न होने की वजह से आरोपी खुला घूम सकेगा और बाहर रहकर केस से जुड़े तथ्यों में छेड़छाड़ कर सकेगा।

4. गिरफ्तारी के बाद अभियुक्त की पेशी के समय मजिस्ट्रेट द्वारा विचार करने के बाद यह तय किया जाएगा कि अभियुक्त को और अधिक समय के लिये हिरासत रखा जाना चाहिये अथवा नहीं।

इस स्तर पर भी सब कुछ मजिस्ट्रेट पर छोड़ दिया गया है।

5. एक्ट के सेक्शन 18 के मुताबिक इसके तहत दर्ज केसों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं था। अब शीर्ष अदालत ने अग्रिम जमानत का प्रावधान जोड़ने का आदेश दिया है।

ये और भी खतरनाक है क्योंकि केस दर्ज होते ही जमानत मिल जाने पर बाहर आने के बाद आरोपी ,  पीड़ित पक्ष या गवाहों को नुकसान पहुंचा सकता है।

इस तरह शिकायत से लेकर , जांच होने , एफआईआर दर्ज होने , गिरफ्तारी , हिरासत में रखने और सज़ा के बाद जेल में रखने , सभी जगहों पर आरोपी को बचने/बचाने का पूरा मौका दिया गया है और सबसे जरूरी बात यह है कि जब सब कुछ पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट को ही करना है तो अदालत के पास करने के लिए क्या बचेगा ? 

रही बात इस एक्ट के दुरुपयोग की तो इस संदर्भ में अदालत के दिये गए तर्क बेहद सतही हैं। अदालत ने कहा है कि इस तरह के अधिकांश दर्ज मुकदमों में ज्यादातर आरोपी बरी हो या गए या उन पर लगे मुकदमें वापस ले लिए गए। इसलिए ऐसे सभी मामले फर्जी थे। " इस हिसाब से बलात्कार के मामलों में सज़ा की दर 27% है। यानी 73% लोग छूट जाते हैं। इसकी पलटकर व्याख्या करने वाले ये कह सकते हैं कि 100 में 73 लोगों को 'झूठा फंसाया' जाता है।"









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