मैं मूर्तिपूजक नहीं हूं, मैं तो मूर्तिभंजक हूं - आंबेडकर

हिन्दू नायक पूजा : रानाडे, आंबेडकर और लोहिया - कुमार मुकुल



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मैं मूर्तिपूजक नहीं हूं, मैं तो मूर्तिभंजक हूं - आंबेडकर


18 जनवरी 1943 को पूना में महादेव गोविंद रानाडे की 101वीं जयंती पर दिए गए भाषण में डा.अम्बेडकर ने रानाडे की तुलना में गांधी और जिन्ना की जमकर आलोचना की थी। ऐसे दौर में जब उत्तर प्रदेश की पूर्व मूख्यमंत्री द्वारा खुद की और अपने गुरू अम्बेडकर की मूर्तियां पार्क में लगवाई जा चुकी हों और भाजपा और संघ भी आंबेडकर पूजा के रास्‍ते पर बढते दिख रहे हों, अम्बेडकर के इस आलेख से गुजरना एक मार्गदर्शी अनुभव हो सकता है। इस आलेख में अाम्बेडकर मूर्तिपूजा और नायक पूजा की जमकर आलोचना करते हैं। गांधी और जिन्ना के तानाशाह रवैये पर चोट करते भाषण के प्रस्तावना में वे लिखते हैं - ‘‘ कि वे किसी ऐसे व्यक्ति को सहन नहीं कर सकते जिसकी इच्छा तथा सहमति पर समझौते की मान-मर्यादा व प्रतिष्ठा निर्भर करे और जो मुगलेआजम की तरह व्यवहार करे।‘‘ वे लिखते हैं - ‘‘ मैं मूर्तिपूजक नहीं हूं, मैं तो मूर्तिभंजक हूं।‘‘ वे भारतीय जनता से भी यह आशा करते हैं कि वे - ‘‘ किसी दिन यह सीख लेंगे कि देश, व्यक्ति से कहीं महान होता है। श्री गांधी या जिन्ना की पूजा और भारत की सेवा में आकाश-पाताल का अंतर है...।‘‘ यहां हम गांधी जिन्ना की जगह मायावती, मोदी, नीतिश की पूजा पढ सकते हैं। नीतिश ने भी बिहार में अपने परिजनों की मूर्तियां लगवायीं और वे भी खुद को लोहिया से जोडते हैं।

यहां हम प्रखर समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के नेहरू विरोध की याद कर सकते हैं। वे भी नेहरू का जयकारा लगाने वाली भारतीय जनता का मार्गदर्शन करना चाहते थे। अपनी पुस्तक ‘भारत विभाजन के अपराधी‘ में एक जगह लोहिया लिखते हैं -
‘‘ देश का हर असरदार आदमी आखिरकार श्री नेहरू की आरती उतार चुका है, और सभी मत , जिनकी चर्चा होती है या जो मान लिए जाते हैं, वे उन्हीं से उपजते हैं और उनमें से बहुत से अशिष्टतापूर्ण और निरर्थक हैं।‘‘

यहां हम अम्बेडकर के नाम की माला जपने वाली सुश्री मायावती, भाजपा और लोहिया के विचारों को अमली जामा पहनाने का दावा करने वाले नीतिश कुमार से सवाल कर सकते हैं कि अपनी और अम्बेडकर की और परिजनों की मूर्तियां बना ये राजनेतागण कौन सा नया आदर्श भारतीय जनता के सामने रख रहे हैं।

Ram Manihar Lohiya ( PC - Google) 

रानाडे को गांधी-जिन्ना से महान बताते हुए डाॅ.अम्बेडकर राजनीतिज्ञ मात्र की महानता पर सवाल खडा करते हैं और उन्हें नकली चरित्र मानते हैं। रानाडे को प्रथम श्रेणी का अर्थशास्त्री, इतिहासकार, शिक्षाविद व धर्मतत्वज्ञ बताते हुए वे कहते हैं कि रानाडे राजनीतिज्ञ नहीं थे -‘‘ क्योंकि यदि वे राजनीतिज्ञ होते, तो हो सकता है कि वह महान व्यक्ति न हो सकते। जैसा कि अब्राहम लिंकन ने कहा था -

‘‘ राजनीतिज्ञ ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनक हित लोक-हित से अलग होता है ... और वे ईमानदार मनुष्यों से काफी हटकर होते हैं।‘‘

उपरोक्त संदर्भ में देखें तो अम्बेडकर-लोहिया राजनीतिज्ञ नहीं हो पाते। अम्बेडकर सत्यनिष्ठा को एक महान गुण बताते हैं और लोहिया को भी जब उनका एक सहकर्मी चुनाव जीतने के लिए सत्यभाषण से हटने की सलाह देता है तो लोहिया पूछते हैं -

‘‘ क्या राजनीति चुनाव जीतने के लिए की जाती है। फलतः लोहिया बस एक चुनाव जीत पाते हैं जीवन में, वह भी काफी कम मतों के अंतर से। पर लोकहित की बलि नहीं चढाते वे।

लोहिया ने एक राजनीतिज्ञ के मुकाबले खुद को एक समाजसुधारक के रूप में खडा करने की अधिक कोशिश की और राजनीति में चाहे वे सफल ना हुए पर जातिप्रथा और गैर-बराबरी से लडाई में कुछ मील के पत्थर खडा करने में सफलता जरूर पाई। अाम्बेडकर  अगर आज लगातार प्रासंगिक होते जा रहे हैं तो इस कारण कि उन्होंने अपने राजनीतिज्ञ पर अपने समाज सुधारक रूप को तरजीह दी थी। रानाडे पर विचार करते हुए वे उनकी तुलना में मात्र एक व्यक्ति ज्योतिबा फुले को देख पाते हैं। फुले भी एक महान समाजसुधारक थे।

अपने भाषण में अम्बेडकर समाजसुधारक और राजनीतिज्ञ की सामाजिक भूमिका की पडताल करते हैं। अम्बेडकर राजनीतिज्ञों के जेल जाने के तमाशे पर भी सवाल खडा करते हैं। वे लिखते हैं -‘‘ जेल में जाना भारत में शहादत का काम हो गया है।‘‘ वे देखते हैं कि बदमाश और दुष्ट भी जेल जाकर शहीद का तमगा पा रहे हैं। वे देखते हैं कि आज जब राजनीतिज्ञ कैदियों को अपराधी नहीं माना जा रहा, जेल जीवन की यातनाएं वैसी नहीं हैं जैसी कि वे तिलक के काल में थीं। यूं किसी भी रूप में एक राजनीतिक बंदी को अम्बेडकर एक समाजसुधारक के मुकाबले साहसी नहीं मानते।

महादेव गोविंद रानाडे  (PC - NBT)

इसकी व्याख्या करते अम्बेडकर पाते हैं कि एक राजनीति बंदी जहां सरकार को चुनौती देता है वहीं एक सुधारक समाज को चुनौती देता है। जबकि राजनीतिज्ञ कुछ महीने जेल काटकर नायक बन बाहर आता है और जन समर्थन पा पूजा जाने लगता है। जबकि समाज सुधारक अकेला लडता दिखता है। यहां अम्बेडकर सवाल उठाते हैं कि -
‘‘ कौन अधिक साहस दिखाता है... वह समाज सुधारक जो अकेला लडता है, या वह राजनीतिज्ञ देशभक्त जो बहुत बडी संख्या में अपने समर्थकों के सहयोग से लडता है।‘‘ वे रानाडे को इन अर्थों में बडा समाजसुधारक मानते हैं और फूले से उनकी वाजिब तुलना करते हैं।

अपने समाज सुधारक वाले रवैये के चलते अाम्बेडकर और लोहिया को ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पडा। लोहिया को मारवाडी, सूदखोर का बच्चा जैसी गालियां दी गयीं। जबकि नेहरू के लिए अपना खजाना खोले रखने वाले मारवाडी समुदाय ने लोहिया को हमेशा दुत्कारा। गांधी के लिए भी पूंजीपति समुदाय अपना धर्मखाता खोले रखता था पर अाम्बेडकर को चोटें सहनी पडीं। लोहिया यह कहते मरे कि शायद मरने पर उन्हें सही समझा जाए। समझा भी गया ओर मरकर वे और प्रासंगिक हुए। उनके नाम पर लोग सत्तसीन हुए। अम्बेडकर के पीछे चलने वाले भी सत्तासीन हुए। पर आज उनके समाज सुधारक छवि की बलि चढा कर कैसे उनके विचारों की दुर्गति कर उनके पिछलग्गू उन्हें बेच रहे हैं यह सामने आता जा रहा है।

हिन्दू धर्म और जाति प्रथा पर अम्बेडकर और लोहिया का हमला एक सा तीखा है। दोनों ही जाति-प्रथा और वर्ण-व्यवस्था को देश की गुलामी का कारक मानते हैं। अम्बेडकर लिखते हैं -‘‘ नब्बे प्रतिशत हिन्दु-ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के अंतरगत शस्त्र धारण नही कर सकते थे। यदि देश की सैन्य संख्या में खतरे के समय वृद्धि नहीं की जा सकती तो देशकी रक्षा किस प्रकार की जा सकती है, जैसा कि प्रायः आरोप लगाया जाता है, बुद्ध ने हिन्दू समाज को अपने अहिंसा के सिद्धांत द्वारा कमजोर बनाया था। हिन्दू समाज को कमजोर बनाने वाले बुद्ध नहीं , बल्कि चातुर्वण्र्य का वह ब्राह्मणवादी सिद्धांत है जो न केवल हिन्दू , अपितु हिन्दू समाज के अपकर्ष के लिए भी उत्तरदायी है।‘‘

इस मुद्दे पर लोहिया का मत भी अम्बेडकर के समान है। ‘जाति-प्रथा नाशः क्यों ओर कैसे‘ शीर्षक लेख में लोहिया लिखते हैं - ‘‘ विदेशी हमले के दुखदायी सिलसिले को जिसके सामने हिन्दुस्तानी जनता पसर गई, अंदरूनी झगडे और छप-कपट के माथे थोपा जाता है। यह बात वाहियात है। उसका तो सबे बडा एकमात्र कारण है जाति। वह नब्बे प्रतिशत आबादी को दर्शक बनाकर छोड देती है...।‘‘

अम्बेडकर रानाडे के इस तर्क को महत्व देते हैं कि हिन्दू समाज में व्यक्ति के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं जिसे मनुष्य नैतिक तौर पर मान्यता दे सके। वहां सारी सुविधाएं मुट्ठी भर लोगों के लिए हैं।







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