क्या आपको पता है गोरखनाथ की जाति।


By - प्रद्युमन यादव


 Credit - youngisthan.in 




गोरखनाथ , नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे । इनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ थे । गुरु शिष्य होने के कारण यह दोनों एक दूसरे के समकालीन थे । हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार गोरखनाथ का जन्म 11वीं शताब्दी के आसपास हुआ था । ब्रिग्स उन्हें 12वीं सदी से पूर्व का मानते हैं । बच्चन सिंह गुरु-शिष्य संबंध और मत्स्येंद्रनाथ का समकालीन होने के कारण उनका जन्म 10वीं-11वी सदी का बताते हैं । सभी के मतों का अवलोकन किया जाए तो यह कहा जा सकता है उनका जन्म दसवीं और ग्यारहवीं सदी के मध्य हुआ था । 

उनके जन्म क्षेत्र को लेकर भी अनेक मत हैं । ब्रिग्स उन्हें पूर्वी बंगाल का मानते हैं तो कुछ अन्य विद्वान उनका जन्म कांगड़ा , पंजाब , तराई क्षेत्र आदि क्षेत्रों में  मानते हैं । इन मतों का आधार गोरखनाथ का प्रभाव और कार्यक्षेत्र माना जाता है । 

किंतु इस आधार पर देखा जाय तो गोरखनाथ का सबसे अधिक प्रभाव उत्तर प्रदेश के अवध और पूर्वांचल क्षेत्र में दिखता है । इन क्षेत्रों के बड़े कवि कबीर , तुलसीदास और मालिक मुहम्मद जायसी गोरखनाथ से प्रभावित नज़र आते हैं । कबीर गोरखनाथ के हठयोग से प्रभावित थे जो उनकी उलटबासियों में साफ नजर आता है । तुलसीदास भी गोरखनाथ को नज़रंदाज़ नहीं कर पाए हैं । गोरखनाथ के भक्ति विरोधी होने के कारण तुलसीदास को कहना पड़ा था - " गोरख जगायो जोग , भगति भगायो लोग " । इसके अलावा उनके द्वारा घोषित - " धूत कहो , अवधूत कहो " का अवधूत भी गोरखपंथी ही है । जायसी ने भी अपनी सभी रचनाओं में गुरु महिमा व नाथ संप्रदाय का जिक्र किया है। पदमावत में उन्होंने सीधे लिखा है - "गुरु सुवा जे पंथ देखावा" । अतः प्रभाव क्षेत्र के आधार पर यह कहा जा सकता है कि गोरखनाथ अवध या पूर्वांचल क्षेत्र में पैदा हुए थे जहां से उनके ज्ञान की ज्योति देश के अन्य हिस्सों में फैली । 

अब आते हैं असल मुद्दे यानी गोरखनाथ की जाति पर । उनकी जाति के बारे में पहला लोक प्रचलित मत उनके ब्राह्मण होने का है । तीन पीढ़ियों से ठाकुर जाति के कब्जे वाला मठ उन्हें ब्राह्मण बताता है । मठ की कहानी में मत्स्येंद्रनाथ का एक विधवा ब्राह्मणी को भभूत देने , ब्राह्मणी का उसे गोबर के ढेर में फेंकने और उस ढेर के गोरखनाथ के पैदा होने का जिक्र किया गया है । इस बकवास का कोई ऐतिहासिक और साहित्यिक आधार नहीं है । यह कथा रामचंद्र शुक्ल द्वारा कबीर को ब्राह्मण साबित करने वाली कथा के समान ही काल्पनिक और मिथ्या है जिसमें उन्होंने रामानंद द्वारा विधवा ब्राह्मणी को गलती से पुत्रवती होने का आशीर्वाद देने और तत्पश्चात कबीर के जन्म लेने का जिक्र किया है । 

गोरखनाथ को ब्राह्मण साबित करने की दूसरी असफल कोशिश साहित्य जगत में रांगेय राघव द्वारा की गई है । इसके लिए उनका आधार ये है कि , क्योंकि गोरखनाथ ने संस्कृत में भी रचनाएं की और ऐसा ब्राह्मण ही कर सकता है , इसलिए वह ब्राह्मण थे । किंतु असलियत यह है कि गोरखनाथ की कोई भी प्रामाणिक रचना संस्कृत में नहीं है । 1930 में गोरखनाथ की रचनाओं को गोरखबानी नाम से प्रकाशित करने वाले पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ की सबसे प्रामाणिक रचना सबदी को माना है । हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का भी यही मानना है । सबदी , आरंभिक हिंदी और अवधी की रचना है , संस्कृत की नहीं । असल में संस्कृत की रचनाएं जबरन गोरखनाथ के मुख में प्रवेश कराने की कोशिश मात्र है । कर्मकांड और ब्राह्मणवाद के विरोध में नाथ सम्प्रदाय की स्थापना करने वाले और सामान्य परिवार से आने वाले गोरखनाथ के लिये ये कतई जरूरी नहीं था कि वह लोकभाषा की बजाय संस्कृत जैसी कुलीन और मरी हुई भाषा का प्रयोग करें । जब संस्कृत के ज्ञाता तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखने के लिए संस्कृत के बजाय लोकभाषा अवधी का प्रयोग किया तो गोरखनाथ तो तुलसीदास के बिल्कुल विपरीत ध्रुव थे । अतः रांगेय राघव का मत भी खारिज हो जाता है । 

गोरखनाथ की रचनाओं के आधार पर उन्हें तेली , बहेलिया तथा सुनार भी कहा गया है । लेकिन यह भी कमजोर तर्क है । गोरखनाथ की सबसे प्रामाणिक रचना सबदी में सर्वाधिक 4 बार उन्होंने स्वयं को ग्वाल कहा है और 18 जगहों पर गाय का उल्लेख किया है । अगर उनकी रचनाओं को आधार बनाया जाय तो उनकी सर्वाधिक उपयुक्त जाति ग्वाल , अहीर होगी । 

अब सवाल उठता है कि गोरखनाथ की जाति वास्तव में क्या थी ? 

इस संदर्भ में कई प्राचीन ग्रंथो में उल्लेख मिलता है और कई इतिहासकार तथा साहित्यकार इस पर प्रकाश डालते हैं जिससे उनकी सबसे उपयुक्त जाति ग्वाल , अहीर साबित होती है। 

- इतिहासकार एससी दास ने उनकी जाति चरवाहा बताया है । 

-इतिहासकार देबी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने अपनी पुस्तक लोकायत में उनकी जाति चरवाहा बताया है।

- इसी तरह डॉ. संजय पासवान और डॉ. जयदेव ने अपने इनसाइक्लोपीडिया में उनकी जाति चरवाहा बताया है । 

- इन साक्ष्यों से इतर तिब्बती साक्ष्यों में भी उन्हें अमर चरवाहा घोषित किया गया है । 

- प्राचीन ग्रंथ योगिसम्प्रदायाविष्कृति में उल्लेख है कि " एक दिन गाय चराते हुए गोरखनाथ को सर्प ने काट लिया था " यह स्पष्ट प्रमाण है कि वह गाय चराने वाले ग्वाल , अहीर जाति से थे । 

- जॉन नैपियर ने भी एक प्राचीन कथा का उल्लेख किया है जिसमें मत्स्येंद्रनाथ को घरेलू जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए गोरखनाथ उन्हें गाय बना देते हैं तथा खुद ग्वाले के रूप में उनका उद्धार करते हैं । इससे भी यह स्पष्ट है होता है कि गोरखनाथ ग्वाल , अहीर थे । 

-‎ इसके अलावा गोरखनाथ की रचना सबदी पर विचार किया जाय तब भी वह ग्वाल , अहीर ही ठहरते हैं । 

यहां यह सवाल उठ सकता है कि गाय चराने वाले अन्य जातियों के लोग भी हुआ करते थे फिर गोरखनाथ को ग्वाल , अहीर ही क्यों माना जाय ?  ध्यातव्य है कि गाय चराना और गाय चराने वाली जाति से यानी ग्वाल होना , ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं । उत्तर भारत में गाय चराने का काम बहुत सी जातियाँ करती रही हैं लेकिन गाय चराने वाले पेशे के नाम पर बनी जाति सिर्फ गाय से संबंधित नाम वाली ग्वाला , अहीर जाति है । 10वी-11वीं शताब्दी में जब जातियाँ पेशे के आधार पर रूढ़ हो चुकी थी , उस समय ऐसा होना लाज़मी भी था । गोरखनाथ भी इसी पेशेवर जाति के प्रतीत होते हैं न कि सिर्फ गाय चराने वाले चरवाहे । ऐतिहासिक तथ्यों में गाय चराने का उल्लेख सिर्फ उनके काम ही नहीं बल्कि उनकी जाति के संदर्भ में भी हुआ है । ग्वाला जाति से होने के कारण ही आज भी उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर अहीर जातियों में दूध को गोरखनाथ से जोड़कर देखा जाता है । उनकी मान्यता है कि दूध गोरख बाबा की देन है ।  

अतः इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि गोरखनाथ ग्वाला , अहीर जाति में पैदा हुए थे । इन प्रमाणों के आधार पर उनकी सबसे उपयुक्त जाति ग्वाला , अहीर ही हो सकती है । 

संदर्भ ग्रंथ - 

1. बच्चन सिंह , हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास , पृष्ठ 34
2. वही , पृष्ठ 36
3. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी , नाथ सिद्धों की रचनाएं , पृष्ठ 12
4. रांगेय राघव , गोरखनाथ और उनका युग , पृष्ठ 45
5. वही , पृष्ठ 46
6. पिताम्बरदत्त बड़थ्वाल ,  गोरखबानी , पृष्ठ 91
7. ‎वही , पृष्ठ 113 
8. ‎वही , पृष्ठ 117
9. ‎गोरखनाथ मठ , महागुरु गोरखनाथ एवं उनकी तपस्थली 
10.George Weston Briggs , Gorakhnath And The Kanphata Yogis
11. Dr. Sanjay paswan & dr. Pramanshi jaidev ,  Encyclopedia of dalits in india struggle for self liberation , pg 32
12. Prof. Gordan Djurdjevic ( university of british colombia ) , Masters of magical powers : the nath sidhas  in the light of esoteric notion , pg. 282
13. S.C. Das , pag sam zon zanq , .Index , pg. 9
14. John napiar , They sing wedding of god , pg. 247
15. Mohan Singh , Gorakhnath and medual hindu mysticism 
16.Debiprasad Chattopadhyaya , Lokayata, PPH, sixth reprint November 2012, p.330, Tantrism and the Castes
17. ‎The 84 Indian Adepts of Abhayadatta System ( Himalayan Art Resources ) , pg. 2


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