कैसी होती दुनिया जो नेता होते निर्वस्त्र !



फ़ोटो - न्यूयॉर्क टाइम्स


फ्रांस के नेचुरिस्ट एसोसिएशन ने पाले द तोक्यो
( palais de tokyo's ) आर्ट एक्जीबिशन आयोजित की है। यह एक्जीबिशन सिर्फ बिना कपड़ों के देखी जा सकती है। 30 हजार से अधिक लोग अब तक सोशल मीडिया पर इस एक्जीबिशन को देखने में दिलचस्पी दिखा चुके हैं। 2 मिलियन से अधिक सोशल मीडिया पर इसका पेज विजिट कर चुके हैं। इसके पीछे नेचुरिस्ट एसोसिएशन का उद्देश्य बस इतना है कि लोग अधिक खुलेपन से आर्ट को महसूस कर सकें। आयोजकों की नजर में नग्नता सबसे बड़ी इक्वलाइजर है। यह दुनिया बहुत अलग होती, अगर नेता अपनी बैठकें कपड़े उतार कर करते। 

मैं बस इस लाइन पर अटक गया हूं। क्या सच में नेता कपड़े उतारकर बैठक करते तो ये दुनिया कुछ और होती, जबकि यह स्थापित है कि हमने न सिर्फ जिंदगी की बल्कि इस दुनिया की शुरुआत भी बिना कपड़ों के ही की है। एसोसिएशन की एक सदस्य कहती हैं, हम उम्मीद करते हैं कि बाहर के दरवाजे पर कपड़ों के साथ लोग अपनी पहचान का कुछ हिस्सा भी उतार पाएंगे। वे भीतर आएंगे तो अधिक खुले और सहज होंगे। अफसोस इसी बात का है कि दुनिया में आते ही सबसे पहला काम कपड़े पहनाने का ही होता है। एक बार तन से कपड़ा चढ़ता है तो फिर लबादे बढ़ते ही जाते हैं। शरीर से ज्यादा मन पर दिलो दिमाग पर परत चढ़ती जाती है। 

फ़ोटो - गूगल


और नेताओं पर तो लबादों का कोई हिसाब ही नहीं है। उनकी सोच-समझ पर इतने मुलम्मे चढ़े हैं कि कई बार समझना मुश्किल हो जाता है कि ये मनुष्यता से कितनी कोस दूर निकल आए हैं। मैं वस्त्रहीन होकर उन्हें देखता हूं तो महसूस करता हूँ कि उन्होंने बड़े जतन से अपने आपको इस बात के लिए तैयार किया है। इस हद तक मुलम्मे चढ़ाएं हैं कि अब वे उनका हिस्सा ही बन चुके हैं। दोनों को अलग किया जाना नामुमकिन हो गया है। पार्टी, विचारधारा, सोच, तेरा-मेरा, वोटर, वोट बैंक, नीतियां, चंदा, धंधा सब कपड़ों की तरह उनके तन से चिपटे हुए हैं, मन का हिस्सा ही हो चुके हैं। 

इसी के कारण वे मंदिर और मदरसे में हुए दुष्कर्म में भेद समझ पाते हैं। इंसानों में काफिर और खुदापरस्त का भेद कर पाते हैं। हत्या में से शहादत के बीज ढूंढ लाते हैं और हत्यारे को धर्मवीर कहने का साहस कर पाते हैं। इतिहास को तोड़ते-मरोड़ते हैं। ऑक्सीजन की कमी से मरते बच्चों को भूलकर तस्वीरों पर बवाल करते हैं। भात-भात करते मर गई बेटी को बिसरा कर दावत उड़ाते हैं। अगड़ा-पिछड़ा, ऊंचा-नीचा, भ्रष्ट, कुलटा सारी परिभाषाओं को गोल-गोल घूमाते हैं। नजर से नहीं नजरिये से हर बात का हिसाब लगाते हैं। हर जगह काला-सफेद ढूंढते हैं। हरा-भगवा, सफेद को आपस में लड़वाते हैं। खून के रंग का अंतर समझते हैं। गोली के निशान में भी बारूद के बजाय फिरका सूंघते हैं।

फोट - गूगल 

हालाँकि इनके बीच एक नेता था, जिसने दूसरे का तन ढंकने के लिए खुद को न्यूनतम वस्त्रों में समेट लिया था। यहाँ रुक कर उन्हें देखता हूं तो लगता है सच में नेता की सोच और उसके कपड़ों का बड़ा गहरा रिश्ता है। कुछ कपड़े उतारकर गांधी और उदार हो गए। लोगों के अधिक करीब और उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गए। दिन में छह छह बार डिजाइनर कपडे पहनकर, तन के साथ मन पर भी मुलम्मे चढ़ाकर बाकी अधिक स्वार्थी, कपटी और षड्यंत्रकारी बन गए। क्योंकि फिर सारा संघर्ष ही कपड़े बचाए रखने तक सीमित होकर रह जाता है। कपड़े उतरते ही कोई संघर्ष बाकी नहीं रहता। महावीर और बुद्ध की निर्वस्त्रता में भी तो वही सम्यक ज्ञान प्रकट होता है, जो दुनिया को समता की नजर से देखता और दिखाता है। 

तो क्या खूब हो जो नेता सारे कपड़े उतारकर सियासत की इस नुमाइश में उतरें। हर जगह न कर पाएं तो कम से कम संसद में ही यह रस्म निभा लें। क्या भरोसा शायद एक दिन में ही देश का मुकद्दर बदल जाए। जो लोग बिना कपड़ों के पाले द तोक्यो देख कर आए हैं, उन्होंने आर्ट को अंतस की गहराइयों से महसूस किया ही होगा। हम उस दिन का इंतजार करेंगे, जब हमारे नेता सारे वस्त्र उतारकर इस देश की अवाम को देखेंगे। शायद वही दिन सारे दुर्दिनों का आखिरी दिन होगा। 





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