पंचर बनाने वाली माँ की कहानी।

By - सूरज मौर्या



मैना अपने बच्चों के साथ। (फ़ोटो - हिंदी डाकिया)

कहते है इस दुनिया में हर चेहरा एक कहानी है। ये कहानी है एक ऐसी माँ की जो ज़िंदगी और वक्त से लड़ रही हैं। ये कहानी है एक ऐसी माँ की जिसने ज़िंदगी के 22 साल अपनी 3 बेटियों के भविष्य को सुधारने में लगा दिया।

ये कहानी है मंदसौर की रहने वाली मैना की। मैना आज 52 साल की हैं। लेकिन उनकी ज़िंदगी की कहानी की शुरुआत आज से 22 साल पहले से होती हैं।

मैना जिसकी शादी हो चुकी थी। जो अपने पति के साथ रहती थी। लेकिन समय का मारा इंसान वक्त के साथ अपने हर प्रिय को खो देता हैं। ठीक वैसे ही मैना के साथ भी हुआ। मैना ने पहले अपने पिता को खोया। फिर उसके एक साल बाद ही अपने पति को भी खो दिया।  ससुराल में रहते हुए उसे ताने मिलने लगे तो वो अपने बच्चों के साथ मायके आ गयी। मैना की तीन बेटियां हैं। वो कुछ समय तक अपने मायके में रही लेकिन वहाँ भी जब परिवार वालो से कुछ अन्नबन्न हुई तो वो अकेले ही अपने बच्चों के साथ रहने लगी।


मैना पत्रकार आकाश चौहान के साथ ( फ़ोटो - हिंदी डाकिया) 

अपना और अपने बच्चों का पेट पालने के लिए मैना ने पहले मजदूरी का काम करना शुरू किया फिर कुछ समय बाद मैना ने ट्रक और बाइक के टायर पंचर बनाने शुरू कर दिए। इस दौरान उन्होंने सड़क के किनारे झोड़पी बनवायी और वही रहने लगी। यहीं से पंचर की दुकान भी जारी रखी।

मैना ने टायर पंचर बनाने का काम बचपन में अपने पिता से ही सीखा था। जो आज उनका सहारा बन गया।

मैना बताती है कि अब वो साड़ी नहीं पहनती है अब वो पेंट और शर्ट में होती हैं। पेंट और शर्ट पहने के बाद उनकी ज़िंदगी बदल गयी। पहले वो ट्रक के बड़े - बड़े टायर्स को उठा कर पटक देती थी लेकिन उम्र के साथ उनकी शक्ति भी अब कम हो गयी हैं। शुरुवात में दुकान चलाने में बहुत तकलीफ होती थी और डर भी लगता था क्योंकि उनकी दुकान सड़क किनारे थी। इसलिए दिन में जितनी वाहनों का पंचर बना लेती थी उससे ही अपना घर चलती थी। शाम में जल्दी वो दुकान बंद कर घर बंद कर लेती थी।

पंचर बनाने की वजह से उनकी रीड की हड्डी कमजोर हो गयी है है जिसका 2 - 3 साल तक इलाज चला लेकिन उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा आज भी उन्हें पीठ से संबंधित तकलीफ सहनी पड़ती हैं।



आज उनकी तीनो बेटियां पढ़ रही है। वो चाहती है कि जिस तरह उन्होंने धक्के मार कर अपनी ज़िंदगी चलायी है उस तरह उनके बच्चे न करें। वो अपने बच्चों को नौकरी लगवाने के लिए पिछले चार साल से जाती प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सरकारी दफ्तरों का चक्कर लगा रही है लेकिन जाती प्रमाण पत्र नही बन पा रहा हैं।
मैना की बेटियों का कहना है कि उनकी माँ ने वो काम किया है जो एक पिता करते है। वो लोग अपनी माँ की तकलीफ को समझती हैं और वो लोग पढ़ कर सरकारी नौकरी करगें। उन्हें ऐसी माँ कहीं नहीं मिलेगी।

तो ये कहानी है मैना की जो पता नहीं कितने सालो से हर रोज कितने मर्दो के व्यवहार को समझती है उनसे डील करती हैं। हमारे समाज में अकेली महिला एक न्योता के समान होती है लेकिन मैना तुम सच में मैना हो जिसने अब तक अपने मेहनत के बल बुते पर खुद को और आने बेटियों को सभाल कर रखा।

वो सख्सियत जो सब कुछ खोने के बाद भी पिछले चार सालो से एक जाति प्रमाण पत्र के लिए भटक रही है। मैना तुम्हारे जज्बे को सलाम।  









ये कहानी आकाश चौहान द्वारा रिसर्च की गयी हैं और सूरज मौर्य द्वारा लिखी गई है। 





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