बनारस में हुए हादसे पर एक कविता "बनारस"।



फ़ोटो - लाइव ANS


कुछ काे कुछ सीटें मिली
और कुछ जाे कुछ से रह गया

और बनारस में कहीं
जर्जर बना पुल ढह गया

तुम तुम्हारी फाईलाें में
याेजना भरते रहे
क्या फऱक पड़ता है तुमकाे
यूं काेई मरते रहे

काेई अपनी बहन से मिलने
वहां से जा रहा
काेई अपनी माशूका के साथ
गाेते खा रहा
काेई अपने भाईयाे काे
सच बताने के लिए
निकला हाे शायद पिता 
माँ काे मनाने के लिए

शाम दस्तक दे चुकी थी
सूर्य भी था ढल गया
एक बड़ा सैलाब तब
मलबे के नीचे जल गया

पर तुम्हे मतलब नहीं
ये सब फिजू़ली बात है
आैर दलालाे के दलानाें में
जश़्न की रात है
आज की जाे रात गर तुम
चैन से साे जाआेगे
भेड़िये थे भेड़िये हाे
भेड़िये कहलाआेगे

याद रखना लिख रहां हूं
मैं कहीं खाे जाऊंगा
एक दिन मैं घर तुम्हारे 
माैत बनकर आऊँगा
टाल न पाआेगे यूँ फाईल
समझ के तुम मुझे
काल बनकर जब तुम्हारे
सर पे मैं मंडराऊंगा



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