नंबरों की ऐसी कैसी दशहत है कि बच्चे आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं।




फ़ोटो - इंडिया टुडे 

जैसे ही बोर्ड के रिज़ल्ट आने शुरू होते हैं वैसे ही 10वीं में पास हुए बच्चे इस तैयारी में लग जाते हैं कि उन्हें मैथ्स लेना है या कॉमर्स और 12वीं में पास हुए बच्चे कॉम्पिटिशन एग्ज़ाम में लग जाते हैं क्योंकि यह करियर को दिशा देने का बहुत ही संवेदनशील समय होता है। जहाँ कुछ बच्चे टॉप करके खुशी मनाते हैं कि उन्हें किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिल जाएगा, वहीं दूसरी तरफ कई घरों में सन्नाटा छा जाता है जब उनके बच्चे कम नंबर लाते हैं और आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं। 

कल सीबीएसई का 10वीं का रिज़ल्ट आया, कई बच्चों ने 500 में से 499 नंबर हासिल किए। देखकर आश्चर्य हुआ कि इतने नंबर कैसे आ सकते हैं! मतलब पूरे के पूरे नंबर। अब जिनके इतने नंबर आए हैं वो और उनके परिवार वाले तो ज़ाहिर तौर पर खुश होंगे लेकिन जिनके 70, 80, या 90 प्रतिशत नंबर आए हैं वो ये नंबर देखकर निराश हो जाते हैं जबकि इसका कोई कारण नहीं है। 70, 80 प्रतिशत नंबर भी कम नहीं होते हैं लेकिन संस्थानों में एडमिशन को लेकर इतना अनावश्यक दबाव रहता है कि इस दबाव को बच्चे झेल नहीं पाते, ऊपर से मां-बाप भी परीक्षा से पहले ही बच्चों को रट-रटकर याद दिलाते रहते हैं कि बेटा तुमको आईएएस का एग्ज़ाम देना है तो फलां एग्ज़ाम देना है, तुमको यहाँ एडमिशन लेना है वहां एडमिशन लेना है, इतने प्रतिशत नंबर तो आने ही चाहिए। अब बताइए इतने तरह के दबाव एकसाथ कौन झेल सकता है। आज का अखबार देखा तो एक 70 प्रतिशत अंक पाने वाली लड़की ने 'कम नंबर' आने के नाते आत्महत्या कर ली। ज़ाहिर है ऐसी खबर पढ़कर दुःख होता है। 

ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है, कमोबेश हर बार यही होता है। जब रिज़ल्ट आते हैं तो ऐसी घटनाएं अक्सर सुनने को मिल जाती हैं। क्या अब बच्चों के अंदर उतना पेसेंस नहीं रहा कि वो कोई बात सुन पाएं। अपने माता-पिता की बात का भी इतना असर कि गलत कदम उठ लेते हैं। 

फ़ोटो - मिड डे 

मोटे तौर पर देखा जाए तो इन मामलों को लेकर आत्महत्या जैसी घटनाओं की दो-तीन मुख्य वजहें समझ आती हैं। पहली और सबसे महत्वपूर्ण वजह ये कि बचपन में पढ़ाई की शुरुआत होते ही बच्चों के दिमाग में ज़्यादातर माँ-बाप ठूंस-ठूंसकर यह बात भर देते हैं कि आगे चलकर तुम्हें किस फील्ड में जाना है, बिना उसकी छमता पहचाने और फिर माँ-बाप और बच्चे सब लग जाते हैं उसी दौड़ में और जब हाईस्कूल और 12वीं में पहुंचे तो ये दबाव अपने चरम पर होता है कि अच्छा सा अच्छा कॉलेज मिले, फलां कॉम्पिटिशन में निकल जाएं। क्योंकि कुछ कॉम्पिटिशन में तो सिर्फ एक-दो मौके ही मिलते हैं और कुछ विश्वविद्यालय तो ऐसे हैं जिनमें 100 प्रतिशत अंक लाने के बावजूद भी दाखिला नहीं मिल पता है। ऐसे में छात्र करें भी तो क्या। ये 100 प्रतिशत वाली बात थोड़ी पचती नहीं है कि कोई 100 जानकार कैसे हो सकता है किसी विषय में और अगर वो उतना नंबर नहीं ला पाया तो क्या वो पढ़ने का हकदार नहीं है? और क्या एक दो संस्थान ही हैं पढ़ने के लिए, सबको उसी संस्थान में दाखिला क्यों लेना है। 

अब बात आती है मां-बाप की, अपनी सारी उम्मीदों का पलड़ा रख देते हैं अपने बच्चों पर! क्यों भाई? साथ चलिए, सपोर्ट करिए, बात करिए उनसे। अंदाज़ा लगाइए कि इस बात का इतना दबाव होता है कि बच्चों को लगता है अब इतने कम नंबर से ना ही अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिलेगा और ना ही मम्मी-पापा खुश होंगे और वो इस परिस्थिति का सामना करने से बेहतर आत्महत्या करना समझते हैं। अगर उनको इस बात का भरोसा होता कि अगर कम नंबर भी आएगा तो मम्मी-पापा गुस्सा नहीं होंगे और फलां कॉलेज में एडमिशन नहीं भी मिला तो किसी और कॉलेज में एडमिशन मिल जाएगा या कोई और ऑप्शन देखे लेंगे या एक साल और तैयारी कर लेंगे; तो वे ऐसा कदम बिलकुल नहीं उठाते।

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जिन बच्चों ने ऐसा कदम उठाया है, ज़ाहिर है उनके घरवाले अब यही सोच रहे होंगे कि ऐसा क्यों किया, कोई बात नहीं नंबर कम आए तो कहीं और पढ़ लेते.... लेकिन अब तो हो चुका जो होना था। 

लेकिन ये सिलसिला रुके इसका तो प्रयास करना ही होगा और इस तनाव को गंभीरता से लेते हुए मां-बाप को अपने बच्चों को आश्वासन दिलाना होगा कि कम नंबर आने से ज़िन्दगी ख़त्म नहीं हो जाती और पढ़ने के लिए तमाम संस्थान हैं और समय भी, आखिर जिसको लेकर इतनी उम्मीदें पालते हैं वही नहीं रहेगा तो फिर बाकि बातें तो बेकार हो जाएंगी न। उम्मीद है ये सिलसिला रुकेगा और माँ-बाप अपनी सक्रिय भूमिका निभाएंगे और बच्चों पर एडमिशन और अधिक नम्बरों का दबाव खत्म होगा।  






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