हे जनता! नेताओं को राजनीति के लिए वक्त दो, देशहित के लिए तो बहुत वक्त पड़ा है।



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राजनीति दो तरीके से की जा सकती है, एक तो इस तरह से कि देशहित में कुछ करना है, देश को सुधारना है और कमियों को दूर किया जाएगा और दूसरे तरीके की राजनीति होती है राजनीति करने के लिए राजनीति। यानि की उसका उद्देश्य कोई देशहित-वित करना नहीं है बल्कि राजनीति में ताउम्र बने रहना है, जब तक सांस है। 

राजनीति की तिकड़म से शुरू होकर ये गोल-गोल घूमते हुए वहीं फिर लौट आती है और बेचारी जनता मुंह बाए इस बात का इंतज़ार करती रहती है कि ये लोग हमारे लिए परेशान हैं, हमारे लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। उसका यह भ्रम बार-बार टूटता है लेकिन उसके पास विकल्प ही नहीं है। 

आज फलां पार्टी सरकार में है तो वो सारी कमियों का ठीकरा पिछली सरकार पर फोड़ते-फोड़ते आराम से 5 साल तो निकाल ही लेती है और ज़रा भी उम्मीद बचती है कि अगले चुनाव में भी आ सकते हैं तो वो कहता है कि भाई थोड़ा समय तो लगता ही है पिछली सरकार की गन्दगी साफ करने में। 

फिर वही कहानी दोहराई जाती है, जब 'विपक्ष', सरकार में आता है और वो आते ही पहला काम जो करता है वो है बदला। भाई तुम सरकार में थे तो हमारी बहुत बखिया उधेड़ी थी अब हम तुम्हारी उससे दोगुना उधेड़ेंगे और इस काम में कम-से-कम दो कार्यकाल तो लगेगा ही। पार्टियों की सारी मेहनत और देश का सारा पैसा पक्ष और विपक्ष की आपसी खींचातानी में हवन होता रहता है और जनता अपने आप को देश का नेता चुनने का अधिकारी मानने का भ्रम पाले बैठी रहती है। सबसे खतरनाक बात तो यह है कि इनमें से कुछ लोगों को इसका एहसास भी नहीं होता है कि ये राजनीति मिलकर उनका मज़ाक उड़ा रही है और खुद मलाई काट रही है। 

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रही बात विपक्ष की तो उसे उन मुद्दों पर बहस करने या विरोध करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखती जिससे देश के लोगों के जीवन पर फर्क पड़ता है, उनके लिए विपक्ष में होने का मतलब है विरोध, सिर्फ और सिर्फ विरोध। चाहे बात गलत हो या सही हो, ज़रूरी हो या गैर-ज़रूरी, किसी नेता की निजी ज़िन्दगी में घुस जाओ और मंचों पर खड़े होकर उसका खानदान गिना दो, यही ज़िम्मेदारी है विपक्ष और सरकार की जनता के प्रति क्योंकि चुनावी वादे इनके लिए गूलर के फूल की तरह होते हैं जो किसी को नज़र ही नहीं आते। 

जिस बात के लिए आज विपक्ष हाय तौबा मचाता है, कल सरकार में आने पर उसी के समर्थन में घर के सरदार की तरह ऐसे खड़ा हो जाता है जैसे इसमें कोई बुराई ही नहीं है। मतलब इस आपसी खींचातानी में इतना छीछालेदर हो जाता है राजनीति का कि किसी को ध्यान ही नहीं रहता कि कुछ और भी ज़रूरी मुद्दे हैं जिनपर नेताओं को और देश के लोगों को बात करनी चाहिए। 


कल कोई राज्य था, आज कर्नाटक है, कल कहीं और होगा और हम मुंह ताकते रहेंगे। इनको तो ये भी नहीं लगेगा की अरे हमने तो गलती से एक गलती कर दी! नहीं, बिलकुल इस बात की उम्मीद भी मत करिए। संविधान पूजनीय पुस्तक है काम में लाई जाने वाली नहीं। राज्यपाल भी संविधान के संरक्षक के तौर पर नहीं पार्टी के सदस्य की तरह व्यवहार करता दिख रहा है। 

तो इतना तो अच्छे से समझ आ गया है कि इनको फुर्सत नहीं है कि तुम्हारे हक़ हुकूक की बात करें। वक्त ही कहाँ है, कीचड़ फेंक और पत्थर फेंक से फुर्सत मिलेगी तब तो। किसी ऐसे पर भरोसा करने और उसपर मंत्रमुग्ध होकर उसका भक्त बनने से बेहतर है उससे कभी-कभी सवाल भी कर लो और खुद आगे आकर अपने हित की बात करो। 








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