गामा पहलवान के लिए मियां करीम सबसे बड़ी चुनौती थे।



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आज ही के दिन सन 1878 में अमृतसर में पैदा हुए गामा पहलवान , आज़ादी पूर्व और पश्चात की पीढ़ियों  की फंतासी का हिस्सा रहे हैं. उनका नाम लेते ही जहन में 6 फ़ीट से भी अधिक लंबे-चौड़े पहलवान की सूरत उभरती है. लेकिन वह मात्र 5 फिट 7 इंच लंबे थे. उनके नाम पर तमाम कहावतें बनी हैं , कहानियां बनी हैं. वह हकीकत और फंतासी के बीच एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जो आज़ादी के पहले से लेकर आज भी याद किये जाते हैं. वह सिर्फ भारत के ही नहीं बल्कि पाकिस्तान के भी पहलवान हैं. उनकी शोहरत सिर्फ पहलवान की ही नहीं बल्कि उस इंसान के बतौर भी है जिसने विभाजन के बाद लाहौर में अपनी गली में घोषणा कर दी थी कि इस गली के हिंदू मेरे भाई हैं. कोई भी मुसलमान उन पर हाथ उठाने की हिम्मत न करे.

गामा पहलवान का असली नाम गुलाम मोहम्मद था. उनके पिता एक देसी पहलवान थे. पिता के मार्गदर्शन में गामा पहलवान ने बहुत कम उम्र में ही कुश्ती लड़नी शुरू कर दी थी. पहली बार वह 10 वर्ष की उम्र में कुश्ती लड़े और 19 के होते होते उन्होंने भारत के तकरीबन सभी पहलवानों को हरा दिया. 

इसी दौर में गुजरांवाला के एक पहलवान करीम बक्श सुल्तानी हुआ करते थे. सुल्तानी अपने नाम के अनुरूप कुश्ती के सुल्तान थे. उन्हें हराना नामुमकिन था. विरोधी उनकी करीब 7 फुट की ऊंचाई देखकर ही मैदान छोड़ देते थे. उनके आगे पहलवान बच्चे नज़र आते थे. 

उस समय गामा पहलवान के लिए  मियां करीम सबसे बड़ी चुनौती थे. 

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गामा को इस चुनौती का सामना करने के लिए ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. जल्द ही वह दिन आया जब लाहौर में करीम बक्श और गामा पहलवान के बीच मुकाबला हुआ. लोग इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि करीम के आगे गामा पहलवान दो मिनट भी नहीं टिक पाएंगे. 7 फुट के पहलवान के आगे भला 5 फुट , 7 इंच लंबा पहलवान टिक भी कैसे सकता था. खैर , मुकाबला शुरू हुआ और करीम पर लोग दनादन दाव लगाने लगे. लेकिन जिस मुकाबले के दो मिनट में खत्म होने की उम्मीद थी वह तीन घंटे तक चला. अंत में , मामला बराबरी पर खत्म हुआ और लोगों का दांव बेकार साबित हो गया. लेकिन इसके साथ ही इस बात की खुशी भी हुई कि उन्हें गामा पहलवान के रूप में एक शानदार पहलवान मिल गया. उस दिन के बाद गामा पहलवान पूरे हिंदुस्तान में मशहूर हो गए. 

हिंदुस्तान में अपनी धाक जमाने के बाद गामा ने भारत से बाहर विश्व स्तर पर पहलवानी की दुनिया में कदम रखा. 1910 में गामा अपने भाई के साथ लंदन पहुंचे. उन दिनों लंदन में ' चैंपियंस ऑफ चैंपियंस ' नाम की कुश्ती प्रतियोगिता हो रही थी. गामा पहलवान ने इस कुश्ती प्रतियोगिता में शामिल होने की अर्जी दी लेकिन वह स्वीकार नहीं हुई. उन्हें बताया गया कि वह अपने औसत कद के कारण इस प्रतियोगिता में भाग लेने लायक नहीं है. गामा इस प्रतिबंध से गुस्सा हो गए. उन्होंने आयोजक के सामने यह घोषणा कर दी कि दुनिया का कोई भी पहलवान उन्हें नहीं हरा सकता है. उन्होंने सीधे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पहलवान स्टेनिलास जैबिस्को और फ्रैंक गाच को चुनौती दे दी और कहा कि जिसमें दम हो वो आकर आज़मा ले. गामा हरा तो अपने सारे इनाम देकर अपने वतन लौट जाएगा. 

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गामा के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया. आयोजकों को अंदाज़ा नहीं था कि गामा की घोषणा महज़ घोषणा ही नहीं थी. प्रतियोगिता में इंट्री पाने के लिए उनके सामने उस दौर के मशहूर अमेरिकी पहलवान बेंजामिन रोलर को भेजा गया. गामा ने पहले ही राउंड में रोलर को मात्र 1 मिनट 40 सेकेंड में चित्त कर दिया. दूसरे राउंड में पूरा दमखम लगाने के बावजूद रोलर 10 मिनट ही टिक पाए और गामा ने उन्हें पटखनी दे दी.  

इसके बाद भी आयोजकों को संतुष्टि नहीं हुई. अगले दिन गामा का मुकाबला 12 पहलवानों से हुआ जिन्हें गामा ने मिनटों में चित्त कर दिया. गामा के प्रदर्शन से दुनिया भर में तहलका मच गया. सबकी नजर उस औसत कद के पहलवान पर टिक गई. आयोजकों को मजबूरन गामा की चुनौती माननी पड़ी. 

अंततः सितम्बर 10, 1910 को वह दिन आया जब गामा के सामने विश्व विजेता पोलैंड के स्टेनिस्लास जैबिस्को थे. गामा ने जैबिस्को को पहले ही मिनट में ज़मीन पर पटक दिया. इसके बाद अगले 2 घंटे 35 मिनट तक ज़मीन पर ही गुत्थमगुत्था चलती रही. उस दिन कुश्ती का कोई नतीजा नहीं निकल पाया और मैच को ड्रा घोषित करना पड़ा. 

उस दिन किसी के विजेता न बन पाने के कारण एक सप्ताह बाद 17 सितंबर को पुनः दोनों पहलवानों को लड़ने के लिए  बुलाया गया. जैबिस्को पिछले मैच में गामा की ताकत और जुनून देख चुके थे. इसलिए वह उस दिन लड़ने ही नहीं आये और गामा को विजेता मान लिया गया. इस तरह गामा वर्ल्ड हैवीवेट चैंपियन बनने वाले भारत के पहले पहलवान बन गए. इसके बाद पत्रकारों ने जब जैबिस्को से न आने का कारण पुछा तो उन्होंने सीधे कहा  ‘ ये ( गामा) आदमी मेरे बस का नहीं है.’ जब गामा से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने गंभीरता से जवाब दिया  ‘ मुझे लड़कर हारने में ज़्यादा ख़ुशी मिलती , बजाय इसके की मैं बिना लड़े ही जीतकर खुश होउ '

गामा ने भारत लौटने के बाद 1911 में दुबारा मियां करीम से कुश्ती लड़ी. इस बार गामा ने उन्हें करारी शिकस्त दी. पिछली बार का ड्रा रहा मैच , इस बार गामा की जीत के साथ खत्म हुआ. इसके बाद , 1927 में गामा ने अपने जीवन की आखिरी फाइट लड़ी. उन्होंने स्वीडन के पहलवान जेस पीटरसन को हराकर खामोशी से इस खेल को अलविदा कह दिया. 

गामा ने कुल 50 पचास साल तक कुश्ती लड़ी. दिलचस्प बात है कि उनके 50 साल के कैरियर में कोई भी पहलवान उन्हें हरा नहीं सका. 

1947 के विभाजन के बाद गामा लाहौर में बस गए. वहां एक लंबी बीमारी के बाद 1963 में भारत और पाकिस्तान के इस साझे पहलवान ने दुनिया को अलविदा कह दिया. उनका अंत समय गरीबी और गर्दिश में बीता. इस महान पहलवान की स्मृति में बड़ौदा के संग्रहालय में 1200 किलो का वह पत्थर आज भी मौजूद है जिसे 23 दिसम्बर, 1902 के दिन उसने अकेले ही उठाया था. उसे वहां रखने में लगभग  25 लोगों की मदत लेनी पड़ी थी.








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