मेरी पहली माशूक़ है बनारस।

By - सूरज सरस्वती


फ़ोटो - गूगल 

मैं बनारस से हूँ। अपने जीवन के 20 साल मैंने बनारस को दिए हैं।  सच कहूं तो इन बीस सालों में उसने कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा। शायद उसका हर प्रारूप में समृद्ध होना ही उसका बड़प्पन था। बनारस जिसे असीमितताओं का शहर भी कहते हैं। ये हर रोज़ आपको बदलता हुआ दिखाई देता है। लोग कहते हैं यहाँ मौत के बाद मुक्ति मिलती है। गंगा आपके सारे पापों को हर लेती है और आपकी आत्मा शुद्ध हो कर परमात्मा में विलीन हो जाती है। भारत के सबसे पुराने शहरों में से एक जिसने ख़ुद किसी से कभी कुछ माँगा ही नहीं सिर्फ दिया है। यहाँ तक की मोक्ष भी। 

कई लोगों को लगता है बनारस सिर्फ घाट और मंदिरों तक सीमित है। ऐसा होता तो भारत का तीसरा सबसे बड़ा विश्वविद्यालय वहाँ नहीं होता। ऐसा विश्वविद्यालय जिसका विचार प्रस्तुत करने पर ही ज़मीन दान में दे दी गयी। जो किसी विद्यार्थी में भेद भाव नहीं करता हो।  जिसनें न जाने कितने परचम दुनिया भर में फहरा दिए हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय को मालवीय जी ने जन्म दिया है।  उसके बाद बनारस ने उसकी समृद्धि को कभी कम नहीं होने दिया।  मैं ये कह सकता हूँ कि मालवीय जी ने वरदान दिया बनारस को जिसका बनारस ने कभी दुरूपयोग नहीं किया।  ऐसा शहर जहाँ 5 विश्वविद्यालय हों। उसके ऊपर सिर्फ घाटों पे बात होगी तो बुरा तो लगेगा ही। 

कला की दृष्टि से भी बनारस हद से ज़्यादा समृद्ध है। चाहे बिरजू महाराज हों , पं राजन मिश्र - साजन मिश्र, सितारा देवी , पं किशन महाराज , विकास महाराज , समता प्रसाद,छंन्नु लाल मिश्रा, रवि शंकर और न जाने कितने नाम जो इस शहर ने दुनिया को दिए हैं। 

साहित्य की बात करें तो एक नाम है जिसे लिखने के बाद ही हिन्दी का साहित्य शुरू होता है मुंशी प्रेमचंद। लेकिन ऐसा नहीं है कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती है शुरू होती है।  

तुलसीदास, कबीर दास , भारतेन्दु हरिश्चंन्द्र , देवकी नंदन खत्री , धूमिल , जयशंकर प्रसाद , काशी नाथ सिंह जैसे कलम के सिपाही बनारस को वरदान स्वरूप मिले। जिन्होंने इस शहर को अपनी स्याही से रंगा है।  

एक ऐसी वीरबाला जिसको मैंने हमेशा से अपना आदर्श माना  रानी लक्ष्मीबाई। जो स्त्री क्या संपूर्ण मानव जाति के लिए एक उदाहरण बन के अभी तक जीवित हैं। 

शल्य चिकित्सा के पितामह आचार्य सुश्रुत का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व में काशी में हुआ था। इन्होंने सुश्रुत संहिता की रचना की थी। हमनें दुनिया को सर्जरी करना सिखाया है। 

फ़ोटो - आर्टिस्टसेरा 

अब कुछ मीठा हो जाये। एक ऐसी मिठाई जो बनारस में ही बनती है मलइयो।  यहाँ आपको इसे खाने के लिए भी इंतज़ार करना पड़ेगा नवम्बर तक। क्यों कि रात की ओस में ही इसे पकाया जाता है। जिस शहर में एक मिठाई के लिए इतना वक्त लगे। उसकी समृद्धता को जानने में भी वक़्त लगेगा न। 

संत महात्माओं ने भी इस मिट्टी को पारस बना दिया। चाहे वो तैलंग स्वामी हो , सतुआ बाबा , कीनाराम बाबा और भी हैं। 

अब आते हैं काशी के नाथ पर अर्थात विश्वनाथ पर। श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो भागों में हैं, दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं और दूसरी और भगवान शिव वाम रूप (सुंदर) में विराजमान हैं, इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है। देवी भगवती के दाहिने ओर विराजमान होने से मुक्ति का मार्ग केवल काशी में ही प्रशस्त होता है। काशी में ही मनुष्य को मुक्ति मिलती हैं, और पुनः गर्भधारण नहीं होता, भगवान शिव खुद यहा तारक मंत्र देकर लोगों को तारते हैं। अकाल मृत्यु से मरा मनुष्य बिना यहां शिव अराधना के मुक्ति नहीं पा सकता। सबसे महत्वपूर्ण बाबा विश्वनाथ दरबार में गर्भ गृह का शिखर है, जिसमें ऊपर की ओर गुम्बद श्री यंत्र से मंडित हैं, जो तांत्रिक सिद्धि के लिए सर्वोत्तम स्थान है। श्री यंत्र-तंत्र साधना के लिए प्रमुख माना जाता है।

भगवान शिव औघड़ हैं। वैसे ही काशी भी औघड़ है। इसे आप जिस तरीके से अपनाएंगे ये आपको उसी तरीके से अपनायेगी। कहा तो ये भी जाता है कि जब तक शिव की कृपा नहीं होगी आप उनके बनारस में स्थिरता नहीं पा सकते हैं। 

महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश भी सारनाथ बनारस में ही दिया था।  

फ़ोटो - गूगल

मिर्ज़ा ग़ालिब और बनारस का एक पाक रिश्ता था। या यूं कहें कि वो तो चले गए मगर आज तक उनकी रूह वही बनारस के घाटों, वहां की तंग गलियों, मंदिर के घंटों में आज तक ज़िन्दा है। बनारस के कण-कण से गालिब को बेइंतहा मोहब्बत थी। इसलिए उन्होंने अपनी फारसी मसनवी चिराग-ए-दैर में बनारस की सभ्य संस्कृति को देखते हुए इसे काबा-ए-हिंदोस्तान का दर्जा दिया।

तआलिल्ला बनारस चश्मे बद्दूर।
बहिश्ते ख़ुर्रमो फ़िरदौस मामूर'।
 ~ असद 

इसका मतलब है हे प्रभु! बनारस को बुरी नज़र से बचाना। यह नन्दित स्वर्ग है, यह भरा-पूरा स्वर्ग है।

ऐसी अभी बहुत सी चीज़ें हैं जिनके बारे में बात की जा सकती है। चाहे वो मणिकर्णिका की वो पवित्र ज्वाला हो जहाँ से चिता के लिए आग जाती है। चाहे मिठाइयों में गुलेरी और मनचली की बात की जाये। चाहे लोलार्क कुंड की अलौकिक विशेषता हो। 

अभी तो 88 घाट , मंदिरों , गंगा आरती , बनारसी पान , बनारसी साड़ी, हुड़दंग, की बात मैंने लिखी ही नहीं है। तो ऐसा बहुत कुछ है अभी जिसके बारे में लोग नहीं जानते हैं।  अपने छोटे से ज्ञानचक्षु में इतना ज्ञान भर चुके हैं। वर्तमान धारणाओं में बनारस को सिर्फ "भोसड़ी के" तक ही सीमित कर रखा है और पूरे शहर को और बनारसियों को इसी के तर्ज़ पे गाली देना शुरू कर देते हैं। ऐसी धारणाओं पर बिना किसी ठोस जानकारी के अपना अटूट विश्वास बनाकर रखने वालों की तर्कहीन बातों पर आहत मत होइये। बल्कि उन्हें जा कर सांत्वना दीजिये कोई बात नहीं, सबकी किस्मत में नहीं होता बनारस हो जाना। 

लोग तो अपनी माशूक़ की तारीफ़ करते नहीं थकते हैं। मेरे लिए "मेरी पहली माशूक़ है बनारस"। मैं हमेशा कहता हूँ  

"बनारस से मेरा वही रिश्ता है जो एक जिस्म का होता है उसकी रूह से"










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