आखिर क्यों धोंडो केशव कर्वे को ज्योतिबा फुले से पहले भारत रत्न दिया गया ?

फ़ोटो - गूगल
भारत रत्न से सम्मानित धोंडो केशव कर्वे जब पैदा भी नहीं हुए थे उससे 10 साल पहले ज्योतिबा फुले ने महिलाओं के लिए 1848 में भारत का पहला स्कूल खोला. यह भारतीय इतिहास में किसी भी भारतीय द्वारा लड़कियों के लिए खोला गया पहला स्कूल था. जब पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक नहीं मिला तो उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले को पढ़ा-लिखा कर उन्हें बतौर शिक्षक नियुक्त किया. 1848 में स्कूल खोलने के बाद ज्योतिबा ने लड़कियों के लिए 3 और स्कूल खोले. 

धोंडो केशव कर्वे जब 5 साल के बच्चे थे तब ज्योतिबा ने विधवा महिलाओं के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की. वहीं एक विधवा काशीबाई से जन्में बच्चे को गोद लेकर उसे पुत्र का दर्जा दिया. जीवन भर उन्होंने जरठ विवाह , बाल विवाह , बहुपत्नीत्व , केश-वपन , नियोग , वेश्यागमन सभी का प्रबल विरोध किया. समाज को विकल्प के तौर पर पाखंड से मुक्त विवाह का एक नया तरीका दिया जो विधवा सहित सभी स्त्रियों के लिए था. उस विवाह पद्धति का मूल स्त्री-पुरुष समानता पर आधारित था.

ज्योतिबा फुले ( फ़ोटो - Free Press Journal )

इतना ही नहीं विधवा पुर्नविवाह के आड़े आने वाले लोगो को उन्होंने दंडित कर रोका भी. उसे दौर के उन सभी दकियानूस लोगों से टकराये जो किसी भी रूप में महिला अधिकारों के खिलाफ थे. इन सब में उनकी पत्नी ने हमेशा उनका सहयोग किया और सक्रिय तौर पर शामिल रहीं. 

इसके बावजूद भी इन कार्यो के लिए सबसे पहले धोंडो केशव कर्वे को भारत सरकार ने 1958 में भारत रत्न से सम्मानित किया. हमारे लिए ये शर्म की बात है कि उस समय ज्योतिबा और सावित्री बाई फुले का कोई नाम लेने वाला भी नहीं था.

धोंडो केशव कर्वे  ( फ़ोटो - गूगल ) 

मैं ये नहीं कह रहा हूं कि कर्वे का योगदान सम्मान के योग्य नहीं था. उनका जो भी योगदान था उसकी आधारशिला ज्योतिबा और सावित्री बाई फुले ने रखी थी. वे  भारत में महिला शिक्षा और महिलाओं के समान अधिकारों के प्रणेता थे. कायदे से यह सम्मान सबसे पहले उन्हें मिलना चाहिए था. उस समय नहीं तो कम से कम 1990 में अम्बेडकर को मिलने के बाद मिलना चाहिए था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.  उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया. 

आज भी किया जा रहा है. भारत के  सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में ज्योतिबा और सावित्री बाई फुले कुछ विशेष लोगों तक ही सीमित कर दिए गए हैं. जबकि वो सबके हैं. ये बात अलग है कि लोग अपने आप को उनसे जोड़कर नहीं देख पाते हैं.


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