आज के दौर में लड़का- लड़की के बीच दोस्ती रखना किसी चुनौती से कम नहीं।



Credit - Matadore Network

आज के दौर में स्त्री-पुरुष दोनों के लिए आपसी दोस्त बनाना और दोस्ती बरकरार रखना किसी चुनौती से कम नहीं है. पुराने समय में रक्त संबंधों के अतरिक्त स्त्री-पुरुष संबंध मात्र पत्नी , वेश्या और रखैल तक ही सीमित थे. उनमें दोस्ती जैसा कुछ भी होने का प्रमाण नहीं मिलता है. जहां दोस्ती के कुछ लक्षण नज़र भी आते हैं वहां वह मुंहबोले भाई-बहन के रिश्ते तक ही सीमित रह गयी है. 

क्या आपने कभी देखा है कि पुराने समय में किसी स्त्री के आठ-दस पुरुष दोस्त हुआ करते थे जिनके साथ वह गप्पे लड़ाती थी. उसके ऐसे दोस्त थे जो उसका सुख दुख में साथ देते थे. उसका जब मन होता था वह उनके घर रुक जाती थी. नहीं.

पुराने समय में यह सब लोगों की कल्पना से भी परे था. क्यों ? क्योंकि स्त्री-पुरुष संबंधों के मूल में स्त्री का सिर्फ भोग्या होना और बच्चे पैदा करने की मशीन होना ही शामिल था. रक्त संबंधों के अतरिक्त वह सिर्फ पत्नी  , रखैल और वेश्या ही हो सकती थी. यह तीनों संबंध गैर बराबरी और स्त्री का शोषण करने वाले थे. इनमें से एकमात्र संबंध पत्नी के इर्दगिर्द स्त्री को देवी घोषित कर आदर्श और मूल्यों का मुलम्मा चढ़ाया गया और इस ढांचे में फिट न बैठने पर उन्हें दुष्चरित्र घोषित कर उन आदर्शो और मूल्यों की रक्षा की गयी. वेश्या और रखैल तो विशुद्ध रूप से भोग की वस्तु रहीं. उन्हें कभी भी इंसान की हैसियत नहीं दी गयी. 

भला हो नई पीढ़ी का कि वह एक नया समाज गढ़ रही है. आजकल के वयस्क स्त्री-पुरुषों में सीमित ही सही कायदे की दोस्तियां दिख रही हैं जिन्हें लेकर समाज सहित घरवालों में भी स्वीकार्यता बन रही है. लेकिन यह सब सीमित है. 

फेसबुक पर ही तमाम पुरुष मिल जाएंगे जिनके निजी जीवन में कोई महिला मित्र नहीं है जिसके साथ वह अपने पुरुष मित्रों की तरह ही सहज संबंध में हों.  तमाम ऐसी महिलाएं मिल जाएंगी जिनके निजी जीवन में कोई पुरुष मित्र नहीं है जिसके साथ वह महिलाओं की तरह ही सहज हो. 

दोस्ती एक ऐसा संबंध है जो स्त्री-पुरुष दोनों के भीतर से पितृसत्ता की बुराईयों को खत्म करती है. पुरुषों को यह महिलाओं के प्रति जिम्मेदार , मानवीय , सम्मानपूर्ण और कुंठाओं से मुक्त बनाती है. महिलाओं के लिए यह सार्वजनिक जीवन में पुरुषों की तरह ही  अपना स्पेस बनाने , बराबरी और गरिमापूर्ण संबंध व ऐसी सामाजिक संरचना विकसित करने के लिहाज़ से जरूरी है. 

मैं व्यक्तिगत पर यह मानता हूं कि पुरूष से अधिक दोस्ती की पहल महिलाओं को करना जरूरी है. एक महिला अगर अपने जीवन में 10 ढंग के पुरुष दोस्त बनाती है और उनके साथ अपने महिला मित्रों की तरह ही सहज रहती है तो यह उसके जीवन की एक बड़ी उपलब्धि होगी. इसी तरह एक पुरुष अपने आप को इस लायक मानवीय और संवेदनशील बनाता है कि उसकी 10 महिला मित्र हो सकें तो यह उसके जीवन की बड़ी उपलब्धि होगी.

आम जीवन में और समाज में बदलाव बेहद सामान्य नज़र आने वाली बातों में बदलाव करने से ही आता है. दोस्ती एक ऐसा ही मुद्दा है. जिसके लिए सिर्फ अच्छे और सच्चे दिल से हाथ भर बढ़ाना होता है.







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