जलती चिताओं के बीच ज़िंदगी अपनी तान को छेड़े रखती है।

By - प्रवीण झा



शायद ये हो जाता तो वो नहीं होता और वो होता तो कुछ नहीं होता। मेरी ज़िंदगी इस टाइम फ्रेम में अटक गई है, ज़हर के घूँट पी रहा हूँ ये जानते हुए की ये ज़हर मुझे शिव नहीं बनाएगा।

शिव से शव की अवस्था में रहना ज़िंदगी है।

दुआ के धागों में, जलती चिताओं के बीच ज़िंदगी अपनी तान को छेड़े रखती है।

किसी के होने या ना होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता जब भी ये बात कोई कहे तो समझ जाना कि उसकी जान अटकी हुई है हलक में और किसी भी वक़्त निकल सकती है।

मौत को रोमांटिक बनाना अपने आप में एक कला है लेकिन सच कहूँ दिल से ज़िंदगी से ज़्यादा रोमांटिक और कुछ नहीं। केदारनाथ सिंह ने कहा कि जाना हिंदी की सबसे खौफ़नाक क्रिया है, अगर ये सच नहीं है तो किसी को जाते हुए महसूस करना। जब वो जा रही थी तो मैं उसके हाथों को पता नहीं क्यूँ इस क़दर देख रहा था जैसे शायद पता नहीं अब अगले पल मुझसे क्या हो जाए। उसका जाना मुझे भीतर से तोड़ रहा था, मैं बहुत रोना चाहता था इस क़दर जैसे बरसों से नहीं रोया था।

एक कमरे में उसकी यादों के साथ रोज़ मेरी रातें गुज़र जाती है थोड़ा घुटते हुए और लिखते हुए। लिखकर घुटन कम हो जाएगी ये सोचकर थोड़ा और घुट लेता हूँ। उसका दुप्पटा जो मेरे सिरहाने रखा रहता है, उसमें आज भी उसकी ख़ुशबू है वो ही ख़ुशबू जो उसकी शराब सी गर्दन के आसपास रहती है।

उसने अपना दुप्पटा दे दिया था बहुत कुछ कहकर लेकिन ये नहीं कहा कि उसके बिना क्या करना है। मुझे समझ नहीं आता है कि मैं ज़िंदगी जी रहा हूँ कि किसी फ़िक्शन के स्क्रीनप्ले स्क्रिप्ट में फँस गया हूँ, जहाँ हर कैरेक्टर अपनी एक भूमिका निभा रहा है कर मेरा काम सिर्फ हर किसी को एक नदी किनारे से देखना है।

कभी दुनिया के ढंग से हुए नहीं और जो तुम आ गई थी तब तक ऐसा लगा सारी दुनिया मेरी है। वो दुनिया जो मेरे दमघोंटू कमरे में रहती है जहाँ रौशनी कम है और यादें ज़्यादा है जहाँ एक रस्सी टंगी हुई है मौत के लिए और साथ ही जल रहा है एक दिया ज़िंदगी के लिए।




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