क्या है गांधी टोपी का उदेश्य ?



   

फ़ोटो - जनसत्ता. कॉम


पुराने  ज़माने  में  बदन  के  साथ  साथ  सिर  भी  ढका  जाता  था।  नंगे  सिर  को  लज्जित  आचरण  माना  जाता  था।  लोग  उसी  लज्जानिवार्ण  के  लिए  पांच - पांच , दस - दस  मीटर  के  कपड़े  की  पगड़ी  पहनते  थे।  जैसे  जैसे  समय  बीतता  गया  वैसे  वैसे  कुछ  लोग  सिर  ढकने  के  लिए  टोपीया  पहनने  लगे।

पगड़ी  हो  या  टोपी , लोग  अपने  अपने  जाती  सांप्रदाय  को  ध्यान  में  रखकर  खास  रंग , खास  बनावट  की  खास  तौर तरीके  वाली  पगड़ी  तथा  टोपी  पहनना  पसंद  करते  थे।  

इसे  यह  होता  था  की  समानता  कही  नज़र  नही  आती  थी , बलके  सांप्रदायिकता  तथा  उच्च नीच  का  भाव  साफ  साफ  नज़र  आता  था।

गांधीजी ने  भारत  भ्रमण  के  दौरान  जो  गरीबी  भूखमरी  देखी , लोगो  को  तन  ढकने  के  लिए  कपड़े  तक  नही  है  यह  देखा  तब  गांधीजी ने  लोगो  को  समझाते  हुए  कहा  की  हमारी  भुखी - नंगी  जनता  के  पास  तन  ढकने  के  लिए  कपड़ा  तक  नही  है  और  हम  अपनी  झूठी  शान  को  बढाने  के  चक्कर  में  दस - दस  मीटर  की  पगड़ी  पहनते  है  ये  हमे  शोभा  नही  देता।

तब  जाकर  गांधीजी  की  बात  मानते  हुए  सिर  ढकने  के  लिए  एक  ऐसी  टोपी  का  निर्माण  किया  गया  जिस  में  कपड़े  का  उपयोग  कम  हुआ  हो , जिस  में  किसी  भी  जाति - धर्म  का  भाव  ना  दिखे  वैसी  श्वेत  खादी  की  स्वदेशी  कपडे  से  बनी  गांधीटोपी।

जिसे  पहनने  से  ना  कोई  उच्च , ना  कोई  नीच।  ना  कोई  राजा , ना  कोई  रंक। ना  कोई  हिंदू , ना  कोई  मुसलमान।  

भारतमाता  के  लाल  सभी  समान।

स्वयं  गांधीजी ने  वह  टोपी  दो  साल  तक  पहनी।  आगे  चलकर  गरीब  आदिवासीयो  की  अर्धनग्न  अवदशा  देखकर  गांधीजी ने  अपने  तन  से  कपड़ो  के  साथ  साथ  टोपी  का  भी  त्याग  कर  दिया।






यह लेख नरेश बारीया स्वदेशी  की वाल से साभार हैंं।



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