आरक्षण का होना टैलेंट का अपमान होना नहीं होता।





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बरसों पहले मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है। इसके लिए सरकार द्वारा मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना , जवाहर रोजगार योजना , शहरी गरीबों के लिए स्वयं रोजगार योजना जैसी योजनाओं सहित तमाम बीमा , कृषि एवं ग्रामीण योजनाएं चलाई जाती रही हैं। फिर भी एक सवर्ण पृष्ठभूमि का व्यक्ति इतनी आसान बात को अपने जातीय दुराग्रह या कंडीशनिंग के चलते नहीं समझ पाता है। उसका जोर सदैव इस बात पर ही रहता है कि आरक्षण का होना टैलेंट का अपमान है और अगर आरक्षण होना भी चाहिए तो आर्थिक आधार पर होना चाहिए। आईये , आज आरक्षण पर बात करते हैं और इस संवैधानिक प्रावधान को समझने की कोशिश करते हैं।

एक सामान्य समझ है कि आरक्षण जाति को दिया जाता है। जबकि ऐसा नहीं है। आरक्षण जाति नहीं वर्ग को दिया जाता है। अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग , वर्ग हैं न कि जाति। दूसरी समझ ये है कि आरक्षण का आधार जाति है। ये भी गलत है। आरक्षण का आधार जाति नहीं बल्कि विभिन्न जातीय समूहों का सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन , मुख्यधारा से अलग व अल्प प्रतिनिधित्व वाली विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक अवस्था और उनकी पद दलित स्थिति का होना है। यही कारण है कि पिछड़े वर्ग में सिर्फ गैर-सवर्ण जातियाँ ही नहीं बल्कि सवर्ण राजपूतों और ब्राह्मणों की कई जातियाँ तथा उपजातियां भी शामिल हैं। इसीलिए अनुसूचित जाति के अंतर्गत न सिर्फ हिन्दू धर्म बल्कि बौद्ध और सिख धर्म की पद दलित जातियाँ भी शामिल हैं। इसी तरह अनुसूचित जनजाति में हिन्दू धर्म समेत सभी धर्मों के जनजातीय समूह शामिल हैं।

आरक्षण वंचित वर्गो का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का जरिया है। ऐसे वंचित वर्ग जो हजारो साल के शोषण के बाद उपजी विषमता के कारण आज शिक्षा , लोक नियोजन , राजनीति आदि विभिन्न क्षेत्रो में बहुसंख्यक होने के बाद भी अपनी आबादी की तुलना में बेहद कम भागीदारी रखते है।  ऐसा नहीं है कि इस वर्ग के व्यक्ति में प्रतिभा नहीं होती या वो मेहनत नहीं करते हैं। वो भी प्रतिभाशाली और मेहनती हैं। बात बस इतनी है कि उन्हें अवसर नहीं मिला। अतीत में लंबे समय तक उनके अधिकारों का हनन हुआ है। उन्हें करीब दो हज़ार साल से भी अधिक समय तक शिक्षा समेत अनेक  अधिकारो से वंचित रखा गया है। यहां तक कि आजादी के समय तक उन्हें अपने शिक्षा और रोजगार जैसे मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ा और आज भी अनेक स्तरों पर उन्हें जातीय भेदभाव झेलते हुए अपने मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

आज जब आरक्षण के माध्यम से उन्हें अवसर मिलने लगा है तो विभिन्न परीक्षाओं में चयनित होकर अथवा उनमें सर्वोच्च   स्थान हासिल कर वह साबित कर रहे हैं कि उनमे प्रतिभा की कमी नहीं है। वस्तुतः प्रतिभा का जाति से कोई सम्बन्ध होता ही नहीं है। बात सिर्फ अवसर की होती है। उचित अवसर और माहौल मिले तो कोई भी शीर्ष पर पहुच सकता है। चाहे वह किसी भी जाति का हो।

सवर्ण पृष्ठभूमि के लोग आज 20% से भी कम आबादी के बावजूद विभिन्न क्षेत्रो में 80% से ज्यादा प्रतिनिधित्व रखते हैं। ऐसा इसलिए है क्योकि उन्हें प्राचीनकाल से ही अवसर  और उचित माहौल मिलता रहा है। उनके अमानवीय शोषण से कायम वर्चस्व के चलते ही उनका शिक्षा के क्षेत्र में दो हज़ार साल से भी अधिक समय तक 100% प्रतिनिधित्व रहा  है। आजादी के समय भी कमोबेश यही परिस्थितियां रही हैं। इस एकाकी प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व के कारण प्रतिभाशाली से लेकर बेहद गए-गुजरे , बेकार , अयोग्य और पतित किस्म के सवर्णो को भी इस स्थिति का लाभ मिला है और प्रायः हर क्षेत्र में उनका कब्ज़ा रहा है। ऐसे में आरक्षण वंचित वर्गो का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी और कारगर जरिया है जिसके द्वारा शिक्षा , लोक नियोजन और राजनीति के क्षेत्र में उन्हें भी अवसरों की प्राप्ति हो रही है और वो इन क्षेत्रो में उभर कर आगे आ रहे हैं।

वस्तुतः इस बहुसंख्यक वंचित वर्ग के प्रतिनिधित्व के बिना देश-निर्माण का कार्य अधुरा है। जब तक देश के सभी संसाधनों समेत विभिन्न क्षेत्रो में उनकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी तब तक देश तरक्की और विकास के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकेगा।  पिछले दो हज़ार सालो में हम देख चुके है कि सवर्णों के शिक्षा , धर्म , राजनीति आदि क्षेत्रो में 100%  प्रतिनिधित्व के कारण देश का नुकसान ही हुआ है और देश पतन और जहालत की ओर ही अग्रसर हुआ है। वर्तमान में  आरक्षण का देश -निर्माण के एक बड़े कार्यक्रम के रूप में तब तक जारी रहना आवश्यक है जब तक वंचित वर्गो का शिक्षा , नौकरी , राजनीति आदि क्षेत्र में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं हो जाता। 

ये तो हुई आरक्षण के प्रासंगिकता की बात। दूसरा सबसे विवादास्पद मुद्दा विभिन्न परीक्षाओं के कट ऑफ से संबंधित है जिसको लेकर सवर्णो में रोष रहता है। आईये इस पर भी बात कर लेते हैं।

वंचित वर्गो की कम कट आफ उनके समुचित प्रतिनिधित्व के लिए ही रखी जाती है। आज भी बहुसंख्यक  (सवर्णों की आबादी से चार गुना अधिक ) होने के बावजूद भी राजनीति , नौकरियों और शिक्षण संस्थानों तक उनकी पहुच नहीं है। हालांकि इसमें अब समय के साथ सुधार आ रहा है और  आरक्षण द्वारा प्राप्त अवसरों के कारण हर साल उनका प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ रहा है।

असल में वंचित वर्गो को आरक्षण , प्रतिनिधित्व हेतु केवल इंट्री लेवल पर ही दिया जाता है। शिक्षण संस्थानों में दाखिले के बाद उन्हें अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर ही हर सेमेस्टर पास करना पड़ता है। ऐसे शिक्षण संस्थानों में परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए उन्हें किसी तरह का आरक्षण नहीं दिया जाता है। वो भी वैसे ही उत्तीर्ण होते है जैसे कि एक सवर्ण उत्तीर्ण होता है। उन्हें भी संस्थान उनकी मेहनत से उत्तीर्ण होने के बाद वैसी ही डिग्री देते हैं जैसी सवर्णों को मिलती है। डिग्री देने में आरक्षण का पालन नहीं किया जाता है। राजनीति में भी आरक्षित सीटों पर टिकट हासिल करने तथा चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार को अपने चुनावी कौशल और नेतृत्व क्षमता का प्रयोग करना पड़ता है। नौकरियों में भी ऐसा नहीं है कि चयनित होने के बाद उन्हें ट्रेनिंग में आरक्षण दिया जाए। उनकी ट्रेनिंग वैसी ही होती है जैसी सवर्ण अभ्यार्थियो की होती है। उनके लिए भी काम की परिस्थितियां , तौर-तरीके और चुनौतियाँ आदि वैसी ही होती है जैसी सवर्ण अभ्यार्थियो के लिए होती हैं। नौकरी में बने रहने के लिए तमाम नियम-विनियम भी सभी के लिए एक जैसे ही होते हैं।

जो सवर्ण अभ्यर्थी यह सोचते है कि उनका चयन वंचित वर्ग के अभ्यर्थी से अधिक नंबर पाने के बाद भी नहीं हो पाया और उनकी प्रतिभा का हनन हुआ वो गलत सोचते हैं।

वास्तव में उनके जैसे समान सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले और सदियों से अवसर प्राप्त उनके भाई-बंधू भी 50% खुली सीटो पर सेलेक्ट होते हैं। टॉप करते हैं। एक समान सामाजिक पृष्ठभूमि और हजारो साल से अवसर प्राप्त लोगो की श्रेणी में होने बावजूद भी अगर कोई व्यक्ति सेलेक्ट नहीं हो पा रहा है तो इसमें कमी आरक्षण की नहीं , उस व्यक्ति की है। जब उस व्यक्ति के जैसे ही अवसर प्राप्त उसके अन्य भाई- बंधू चयनित हो जा रहे है तो वह व्यक्ति क्यों नहीं हो पा रहा हैं ? वह किस मुंह से अपनी असफलता या कमजोरी का दोष आरक्षण को देता है।

अगर वह अपने जैसे प्रिविलेज  लोगो से मुकाबला करने की कुव्वत नहीं रखता है तो वह निश्चय ही बेकार है। उसने ढंग से पढाई नहीं की है। उसने गलतियां की है जिसका दोषी आरक्षण नहीं सिर्फ और सिर्फ वह व्यक्ति है। उसे अगर कोसना हो तो अपने सवर्ण भाइयो को कोसना चाहिए कि वो इतना अधिक स्कोर क्यों करते हैं कि उनके जैसे समान प्रिविलेज लोग सेलेक्ट नहीं हो पाते हैं। उस व्यक्ति को उनसे विनती करना चाहिए  कि " भ्राते ! मैं भी आप जैसी सामाजिक पृष्ठभूमि का हूँ। प्रिविलेज्ड हूं। मेरे सामने भी कभी अवसर का संकट नहीं रहा है। किंतु किसी गुप्त रोग अथवा कमजोरी के कारण , मैं आपका मुकाबला करने में सक्षम नहीं हूं। इसलिए प्लीज आप लोग थोडा कम स्कोर किया करिए ताकि आपकी तरह मेरे जैसे प्रिविलेज लोग भी सफल हो सके " 

अगर ये विनती हो सके तो अच्छी बात है। इससे शायद कुछ बात बन जाए। वरना ऐसे लोग करते रहें आरक्षण का विरोध। न उनसे कुछ हो पायेगा , न उनका कुछ हो पायेगा। आरक्षण आज भी प्रासंगिक है और तब तक रहेगा जब तक कि समुचित प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।





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