आ...मेरे लाल तुझे चूम लूं जरा।


By - नवनीत मिश्रा


फ़ोटो - गूगल 

इस तस्वीर में सेना का शौर्य छिपा है, बहादुरी का सौंदर्य छिपा है। एक मां की ममता छिपी है, एक बेटे का सपना छिपा है, और इससे भी बढ़कर एक परिवार की देश के लिए खुशी-खुशी जान देने का जज्बा छिपा है। सेना के अफसर की वर्दी में खड़े जिस युवा को आप देख रहे हैं, उसकी उम्र महज छह साल थी, जब  पिता की तिरंगे में लिपटी लाश मुजफ्फरनगर वाले घर पहुंची थीं।

पिता बच्चन सिंह उस राजपूत रायफल्स की दूसरी बटालियन में लांस नायक थे, जिसने कारगिल की लड़ाई में देश को सबसे पहली खुशखबरी सुनाई थी। यह खुशखबरी थी तोलोलिंग इलाका फतह की। कारगिल युद्ध में यह पहली सफलता थी, जिसे भारतीय सेना ने लॉचिंग पैड के रूप में इस्तेमाल कर पाकिस्तान को घुटने के बल ला दिया था।

खैर, वह छह साल का बच्चा तब पिता की लाश देखकर विचलित नहीं हुआ, बल्कि उसने खुद सेना की वर्दी पहनने का सपना संजो लिया। बिल्कुल पापा की तरह सरहद पार के दुश्मनों से लड़ने का जज्बा हृदय में उसने पैबस्त कर लिया। दूसरी मां होती तो शायद पति के खो देने के गम और खौफ में शायद ही बेटे को सेना में जाने देती, मगर पुत्र की बात सुनकर मां कमलेश बाला गर्वित हो उठीं।उन्होंने बेटे को भी पापा की तरह सेना में जाने की इजाजत दी।

ठीक 19 साल बाद 13 जून 2018 को बेटे हितेश का सपना पूरा हुआ। जब सेना में लेफ्टिनेंट पद पर कमीशन मिला है। पिता लांस नायक थे तो बेटा हितेश आज बड़ा अफसर। 12 जून 1999 को उनके पिता शहीद हुए थे, ठीक एक दिन पहले उनकी इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून मे पासिंग आउट सेरेमनी थी। यह तस्वीर उसी सेरेमनी की हैं।लाल की सफलता पर निहाल मां बेटे को चूम रही है।हितेश का एक भाई भी है। वह भी सेना में जाने की तैयारी में है। इस बहादुर परिवार और कमलेश बाबा जैसी देवी के आगे बार-बार सिर झुकाता हूं।






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