बाबा आप बूढ़े मत होईये।

By - सूरज सरस्वती


Photo - shutterstock 


मेरी गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं। आज कल एक चीज़ नयी हो रही है मेरे साथ। मैं सबसे क़रीब घर में हूँ तो वो हैं मेरे बाबा।  मेरी परवरिश में उनका बहुत बड़ा हिस्सा रहा है। लेकिन ये मेरी घबराहट है या बचपना समझ नहीं आ रहा है।  हर रोज़ मैं उन्हें बूढ़ा होते हुए देख रहा हूँ। शायद बच्चे का बड़ा होना दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत क्रिया हो लेकिन किसी बड़े का हर रोज़ बूढ़ा होना उतना ही कमज़ोर करने लगता है।

इंसान प्रकृति के नियम के साथ चल सकता है । ये मैंने उन्हें ही देख कर सीखा है। कुछ चीज़ें रेत की तरह होती हैं आप कोशिश कर सकते हैं कि वो रुक जाए लेकिन ऐसा संभव नहीं है। ये उम्र भी एक ऐसी ही चीज़ है। मुझमें ज़्यादा करुणा या द्वेष कभी नहीं रहा। हर चीज़ को जीवन का एक हिस्सा ही समझ कर मैंने स्वीकार किया है लेकिन यहाँ पर सारे तर्क सारी विद्याएँ धूमिल हो गयी हैं। वो जो कांच का साँचा जिसमें रेत भरी होती है जिसे वक़्त का मुआयना करने के लिए रखते हैं एक बार सारी रेत के नीचे जाने के बाद उसे दुबारा घुमा दिया जाता है।  मैं चाहता हूँ मैं बाबा की उम्र को उस सांचे में भर के दुबारा घुमा दूँ और उन्हें दुबारा बड़ा होते हुए देखूँ। ये कल्पना वैसी ही है जैसे किसी ने तपस्या कर के अमर होने का वरदान मांग लिया हो मग़र किसी और के लिए।

कल रात में यूँ ही उठ कर बाहर जाने का मन हुआ , गर्मी ज़्यादा थी और नींद नहीं आ रही थी। मैं जब उठा तो देखा बाबा सो रहे थें जैसे कोई मासूम बच्चा पलंग पे चारो ओर घूम कर सोने की कोशिश करता है। ये भी बिल्कुल वैसा ही था। उस वक़्त मेरा मन किया कि मैं जाऊं और उनके सर पर हाथ रख के उन्हें सहलाऊं। फिर एक बात ज़हन में आयी कि कहीं मेरे स्पर्श मात्र से उनकी नींद टूट गयी तो इससे बुरा मेरे लिए कुछ नहीं होगा।

मैं कमरे के बाहर चला गया। कुछ देर टहलने के बाद फिर से कमरे में आ गया। उस वक़्त भी नींद नदारद थी। लेकिन एक सुकून था आँखों में। शायद दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत दृश्यों में से एक दृश्य मेरी आँखों ने देख लिया था। सोच रहा था कि बचपन में मैं भी तो ऐसा ही था या ये कहूँ कि सभी ऐसे ही होते हैं।

मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस परिवर्तन को कैसे संचित करूँ? जिन हाथों ने हर तकलीफ़ में आपकी रक्षा की है आज उन्हीं पे झुर्रियां पड़ रही हैं। जिस इंसान को 47 की बातें मुँह ज़बानी याद रही हों। उसका यूँ अपने परिवार के लोगों को पहचानने के लिए संघर्ष करते हुए देखना कहीं न कहीं मुझे कमज़ोर करता है। कुछ दिन में विश्वविद्यालय खुल जाएगा और मैं फिर से घर से दूर हो जाऊँगा।  लेकिन मुझे इस बात का दुःख कम होगा। ज़्यादा दुःख मुझे बाबा से दूर होने का ही होगा।









Comments