एक अचंभा देखा रे भाई, मोदी मिलावैं कबीर-नानक-गोरख कै ताईं !




फ़ोटो - ज़ी न्यूज़ 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मगहर में अपना भाषण शुरू करते हुए कहा कि कबीरदास जी यहीं पर बाबा नानक और गुरु गोरखनाथ जी के साथ आध्यात्मिक चर्चा किया करते थे। 

संत कबीर का जन्म 1398 में हुआ था और निधन 1518 में। कबीर करीब 120 साल जिए थे। लेकिन उनकी इस उम्र पर कई तरह के संदेह हैं। 

बाबा नानक 1469 में पैदा हुए और 1539 में उनका निधन हुआ। यानी कबीर जिस समय 71 साल के थे तब बाबा नानक जन्मे थे। कबीर का 120 साल की उम्र में हुआ तो नानक जी 49 साल के थे। 

यह संभव है कि बाबा नानक और कबीर की मुलाकात हुई हो। यह भी संभव है कि दोनों ने एक साथ साधना भी की हो। लेकिन अगर कबीर का निधन 80 साल के आसपास हुआ हो तो यह यह मुलाकात संभव नहीं, क्योंकि उस समय नानक जी महज 11 साल के रहे होंगे। अगर कबीर का निधन 70 साल की उम्र में हुआ तो यह मुलाकात बिलकुल ही संभव नहीं। 

लेकिन यह तो बिलकुल असंभव है कि 11वीं सदी में पैदा हुए गुरु गोरखनाथ जी 14वीं सदी में यानी तीन सदी बाद कबीर से मिलने के लिए आ गए। यह कैसे संभव हो सकता है कि कोई व्यक्ति तीन सदी बाद अचानक प्रकट हो जाए। मोदी जी की यह चूक इसलिए भी बहुत गंभीर है, क्योंकि गुरु गोरखनाथ के मठ के सबसे बड़े मठाधीश मुख्यमंत्री आदित्यनाथ उनके बगल में बैठे थे। क्या उन्होंने आज तक मोदी जी को यह भी नहीं बताया कि गोरखनाथ जी 11वीं सदी में पैदा हुए थे।  

फ़ोटो - आजतक


मोदी जी ने यह भी ग़लत बोला कि कबीर के लंबे काल खंड के बाद संत रैदास आए। हद है प्रधानमंत्री जी! क्या हो गया है आपको। आप कहां से यह ज्ञान  लेकर आ रहे हैं। संत रैदास का जन्म 1450 में उस समय हुआ था जब संत कबीर 52 साल के थे। रैदास की मृत्यु 1520 में हुई यानी कबीर से महज दो साल बाद। यानी दोनों संत लगभग समकालीन थे। 

मोदी जी ने वृंद के दो दोहे भी कबीर के नाम से पढ़ डाले। एक मांगन मरन समान है मत कोई मांगो भीख और काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब! यह हैरानीजनक बात है कि हर क्षण कबीर का नाम लेने वाले इस भाषण को लिखे या पढ़े जाने से पहले मोदी जी ने स्वयं या उनके भाषण लिखने वालों ने ध्यान नहीं रखा। यह बहुत गंभीर बात है। 

यह अदभुत हैरानी वाली बात है कि प्रधानमंत्री के पद पर बैठे इतने बड़े राजनीतिज्ञ ऐसी ग़लतियां कर रहे हैं। यह ज़रूरी नहीं कि किसी राजनीतिज्ञ को यह सब ज्ञान हो ही, लेकिन इसका यह मतलब साफ़ है कि भारतीय प्रधानमंत्री कार्यालय में बौद्धिक दारिद्रय वाले अफ़सर इस देश के सबसे राजनेता को देश और दुनिया में उपहास का विषय बनवा रहे हैं। यह मोदी का उपहास नहीं, यह देश के सर्वोच्च पद का अपमान है। यह किसी भी तरह ठीक नहीं है। मोदी को चाहिए कि वह अपने इन चमचों को लात मार कर निकाल बाहर करे!









यह पोस्ट त्रिभुवन जी के फेसबुक वाल से साभार हैं।






Comments