"अपना हाथ जगन्नाथ" वाली भाषा को फ़िल्म ‘वीरे दी वेडिंग’ ने छीन लिया हैं।



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अपना हाथ जगन्नाथ….हमेशा इस तरह की बात एक पुरूष के मुंह से सुनी होगी। पर ‘वीरे दी वेडिंग’ एक ऐसी फिल्म है जिसने अपना हाथ जगन्नाथ वाली भाषा को छीना है। समाज तो यही सोचता आया है ना कि सेक्स की इच्छा केवल पुरुषों को होती है लड़कियां तो पत्थर की बनी होती हैं। खैर इस फ़िल्म ने  महिलाओं के प्रति बने कई ढांचों को तोड़ा है। चाहें वो लड़कियों का शराब पीना हो, चाहें सिगरेट पीना, चाहें खुद के निर्णय खुद लेना हो।

अब आजकल लोगों को ये बड़ी समस्या हो रही है कि आजकल की जितनी महिला आधारित फिल्में बन रहीं हैं उनमें केवल सेक्स डिमांड पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है। पार्च्ड, लिपस्टिक अंडर माय बुरखा जैसी फिल्मों को लेकर भी कई लोगों ने लिखा कि फ़िल्म केवल शराब, सिगरेट और शारीरिक ज़रूरत पर आधारित है। महिलाओं की शिक्षा या उनके अन्य पहलुओं पर इन फिल्मों में बात नहीं होती। लेकिन इस तरह की फिल्मों के आने से एक चीज़ अच्छी हुई है और वो है महिलाओं की शारीरिक ज़रूरतों पर खुलकर बात होना। अभी तक तो इस तरह की बातें करना भी पाप होता था। पर अब सिनेमा की वजह से ही सही ये परेशानियां सामने तो आ रही हैं। 

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‘वीरे दी वेडिंग’ चार लड़कियों की कहानी है। करीना वो लड़की है जो शादी नहीं करना चाहती। ज़िम्मेदारियाँ नहीं लेना चाहती। पर हमेशा की तरह हिंदी सिनेमा की हैप्पी एंडिंग वाली थ्योरी के तहत करीना शादी कर लेती है। और वो शादी करने के लिए एक सही बात बोलती है कि शादी नहीं करूंगी तो ज़िन्दगी तो और बर्बाद हो जाएगी। क्योंकि करीना और सुमित व्यास एक दूसरे को बहुत प्यार करते हैं। फ़िल्म के निर्देशक शशांक घोष ने दिखाया है कि लड़कियों की आजादी मतलब सिर्फ लड़की की आज़ादी।


उसकी मां, उसके परिवार की उससे क्या उम्मीदें हैं। ये सब दरकिनार कर केवल एक लड़की की आज़ादी को शराब के बोतल में बंद कर दिया है। करीना शादी इसलिए नहीं करना चाहती क्योंकि वो परिवार में फंसना नहीं चाहतीं हैं। लेकिन अंततः उन्हें समझ आ जाता है कि परिवार से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता है। 
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इस फ़िल्म में सबसे दमदार भूमिका स्वरा भास्कर की है। अनारकली ऑफ आरा में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुकी स्वरा ने इस फ़िल्म में भी बहुत मेहनत की है। एक स्वरा का अभिनय और उनके संवाद ही थे जिसने पूरे सिनेमा हॉल में तालियों की गूंज भर दी। हालांकि जिन गालियों का इस्तेमाल फ़िल्म में किया गया है वो गलत है। लेकिन कहते हैं समाज में जो घटता है वो सिनेमा में दिखाया जाता है। पर हम हैं कि सिनेमा से आदर्श भूमिका निभाने की मांग करते हैं। इसलिए सिनेमा में इस्तेमाल की गईं गालियां गलत लगती हैं। पर आपके सामने खड़ा होकर कोई गाली देगा या आप खुद दे रहे होंगे तो आपको परेशानी नहीं होगी। मैं खुद अपशब्दों का विरोध करती हूं पर सिर्फ सोशल मीडिया पर नहीं। 

सोनम और शिखा तलसानिया ने भी अच्छा काम किया है। सोनम वो लड़की हैं जो शादी करना चाहती हैं, और शिखा की शादी हो चुकी है और एक बच्चा भी है। 

शशांक घोष ने एक तरफ तो महिला आज़ादी और सशक्तिकरण की बात की है फ़िल्म में। दूसरी तरफ चार नायिकाओं में से केवल एक ही कामकाजी है। बाकी तीनों के पास सिवाय शराब, सिगरेट के कोई नौकरी नहीं है। यह फ़िल्म एक तरफ तो कुछ बंदिशों को तोड़ने का प्रयास करती है तो दूसरी तरफ महिला सशक्तिकरण मतलब मादक पदार्थ और स्वयं की आज़ादी की बात करती है। कुलमिलाकर फ़िल्म मनोरंजन के लिए ठीक है।




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