जो लोग मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलेजाने का रोना रो रहे हैं वे जाने कौन थे पं. दीनदयाल उपाध्याय जी।


Credit - Punjab Kesari

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के नाम पर  अब एक स्टेशन का नाम रख दिया गया है। कोई पूछे कि उन्होंने क्या किया, तो नाम रखने वाले भी बता नहीं पाएंगे। वे जब पैदा हुए तब देश में अंग्रेज राज कर रहे थे। वे जब जवान हुए तब भी देश में अंग्रेजों का ही राज था। मगर मजाल है, जो आपने अंग्रेजों की तरफ जरा भी ध्यान दिया हो। आजादी की जंग में उनका योगदान आम ढर्रे से कुछ हटकर है और उनकी महानता भी कुछ अलग किस्म की है। इसे आप विनम्र टाइप की महानता कह सकते हैं। छुपी हुई महानता कहने में भी कोई हर्ज नहीं है। यह क्या बात हुई कि लगाया वंदेमातरम का नारा और फांसी का फंदा अपने गले में डालकर झूल गए ? 

ऐसा करने वाले रातों रात देश के हीरो बन गए। मगर वे सस्ती लोकप्रियता के विरूध्द थे और उन्हें इस तरह हीरो नहीं बनना था। वे सच्चे देशभक्त थे और जिस जमाने में लोग देश के लिए जेल जाया करते थे, फांसी पर चढ़ जाया करते थे, आप इन सब लोकप्रिय तौर-तरीके अपनाने की बजाय शाखा में जाया करते थे। वे जानते थे कि असली देशभक्ति यही है। 

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वे दूरदर्शी थे और जानते थे कि इसी चीज को आगे चलकर देश भक्ति समझा जाएगा। उस जमाने में नेहरू अलग-अलग समय पर कुल नौ साल जेल में रहे। आज आप नेहरू की हालत देख रहे हैं। उन्होंने समझदारी की और जेल नहीं गए। उन्होंने अंग्रेजों की भरपूर उपेक्षा की। इतनी उपेक्षा की कि आखिरकार अंग्रेज तंग आ गए और थक-हार कर वापस इंग्लैड चले गए। आपका अंटेशन पाने के लिए अंग्रेज बार-बार और दिन रात भारतीयों पर अत्याचार करते थे। 



वंदे मातरम बोलने वालों को सरे राह कोड़े लगाए जाते थे। मगर आप उसी राह से चुपचाप संघ की शाखा में निकल जाते थे। मजाल है जो तमाशा देखने भी रुकते हों। आपकी उपेक्षा से अंग्रेज मायूस हो जाया करते थे। अंग्रेजों ने आपकी उपेक्षा तोड़ने के लिए एक से बढ़ कर एक अत्याचार किये, मगर आप टस से मस नहीं होते थे। जिस ज़माने में देश के युवा तिरंगा हाथ में लेकर जान देने निकलते थे, आप संघ का भगवा झंडा हाथ में लेकर सदा वत्सले मातृभूमि गाते हुए पथ संचलन निकालते थे और विधर्मियों को भयाक्रांत कर देश की सच्ची सेवा किया करते थे। 

आपको बहुत पहले बहुत बड़े बड़े सम्मान मिल जाने चाहिए थे, मगर देश की आंखे अब जाकर खुली हैं, बल्कि कहना चाहिए जबरन खोली गई हैं। आपके नाम पर स्टेशन का नाम रखा दिया गया है। आपके जैसे बहुत से महान लोग उस जम़ाने में थे, जो अंग्रेजों की भरपूर उपेक्षा करते हुए संघकार्य में व्यस्त रहा करते थे। मगर चिंता की कोई बात नहीं, बहुत सारे स्टेशन भी हैं। 





यह लेख पत्रकार प्रकाश के राय जी के फेसबुक वॉल से ली गयी है जिसे लिखा है  दीपक असीम जी ने।



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