क्या आपको पता है भोजपुरी 1000 वर्ष से अधिक पुरानी भाषा है !

 By - सूरज सरस्वती 


Photo - shashwat


भोजपुरी भाषा के ऊपर कई दिनों से सोशल प्लेटफार्म पर लड़ाईयां देखने को मिल रही है। कारण है भोजपुरी भाषा में आयी अभद्रता। ऐसा नहीं है कि ये शुरू से चला आ रहा है आये कुछ सालों में ये सब अत्यधिक बढ़ गया है। जो कि कई प्रारूपों में गलत है। 

भोजपुरी का इतिहास 7वीं सदी से शुरु होता है। भोजपुरी 1000 वर्ष से अधिक पुरानी भाषा है। राजा भोजदेव (सन् 1005-55 ई.) के नाम पर भोजपुर पड़ा। इस मत के समर्थक जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन, उदयनारायण तिवारी आदि हैं। इस संबंध में उदयनारायण तिवारी ने लिखा है कि “भोजपुरी बोली का नामकरण शाहाबाद जिले के भोजपुर परगने के नाम पर हुआ है।

यदि भोजपुरी बोलने वालों के ऊपर बात की जाये तो क़रीब विश्व भर में 17 करोड़ की आबादी बोल चाल में भोजपुरी भाषा का प्रयोग करती है। जिसमें उत्तर प्रदेश और बिहार की जनसँख्या का बड़ा योगदान है।  

अब ऐसी भाषा को कुछ वर्षों की अभद्रता पर आंकलन करना गलत होगा। 

यह बिहार के पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सारण, सीवान, गोपालगंज, भोजपुर, बक्सर, सासाराम और भभूआ जिलों में तथा उत्तरप्रदेश के बलिया, देवरिया, कुशीनगर, वाराणसी, गोरखपुर महाराजगंज, गाजीपुर, मऊ, मिर्जापुर के लोगों की मातृभाषा है। 

यदि देश के बाहर भोजपुरी के विस्तार की बात की जाये तो ये मॉरीशस, फिजी, गयाना, गुयाना, सूरीनाम, सिंगापुर, उत्तर अमरीका और लैटिन अमेरिका में भी बोली जाती है।

जैसे हर प्रान्त को वहाँ के रहन-सहन, खान-पान पर निर्भर करता है। उसी तरह वहाँ की भाषा भी वहाँ की सभ्यता जानने में हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है। उड़ीसा में उड़िया , बंगाल में बांग्ला , पंजाब में पंजाबी ऐसे हर प्रान्त की प्राथमिक पहचान वहाँ की भाषा से ही है। वैसे ही बिहार और उत्तर प्रदेश में भोजपुरी अपना एक विशाल स्थान रखता है। 

किसी चीज़ की आलोचना अच्छी बात है लेकिन सबसे ज़रूरी है आप जिस भी चीज़ की आलोचना कर रहे हैं आपको उसका विस्तृत ज्ञान होना ज़रूरी है। आज के चार गायकों ने भोजपुरी को जन्म नहीं दिया है। 

आचार्य हवलदार त्रिपाठी "सह्मदय" ने अपने अन्वेषण में पाया की भोजपुरी संस्कृत भाषा से ही उद्घृत हुई है। उनके कोश-ग्रन्थ ('व्युत्पत्ति मूलक भोजपुरी की धातु और क्रियाएं') में मात्र 761 धातुओं की खोज उन्होंने की है, जिनका विस्तार "ढ़" वर्ण तक हुआ है। इस प्रबन्ध के अध्ययन से ज्ञात होता है कि 761 पदों की मूल धातु की वैज्ञानिक निर्माण प्रक्रिया में पाणिनि सूत्र का अक्षरश: अनुपालन हुआ है।

भोजपुरी से घृणा कर रहे लोग जो ये कहते हैं कि इसका कोई अस्तित्व नहीं है। उन्हें जानना चाहिये कि यदि भोजपुरी का अस्तित्व ख़त्म हुआ तो आपका और हमारा अस्तित्व भी नहीं बचेगा। लोकगीत , लोक कला , सामान्य संवाद ये सारी चीज़ें समाप्त हो जाएंगी। फिर किस बात के लिए लोग उत्तर प्रदेश को याद करेंगे। न तो कहीं छठ पूजा होगी , ना कहीं पचरा , न सोहर गाया जायेगा और ना ही कोई बिरहा और न ही कोई कजरी सुनेगा। फिर कोई आपके शहर क्या सीखने आयेगा ? यदि किसी प्रान्त की भाषा शून्य हो जाये तो वहाँ की संस्कृति भी शून्य हो जाती है।  

भोजपुरी साहित्य के शेक्सपियर कहे जाने वाले "भिखारी ठाकुर" का भी इस भाषा के विकास में बहुत बड़ा योगदान है। वो अपने लिखे हुए नाटकों के द्वारा आज की स्त्री के मर्म को दर्शाने का भरसक प्रयास किया है। अपने लेखों के द्वारा समाज में उत्पन्न कुरीतियों को भी दर्शाया है।

ऐसा नहीं है कि आज की उत्तर प्रदेश और बिहार की पीढ़ी भोजपुरी के मर्म से वाकिफ नहीं है । लेकिन रोजी और रोजगार में भोजपुरी का कोई उपयोग न होने के कारण वो इस भाषा से कटती चली जा रही है। 

लेकिन कुछ लोग हैं जो इसे वृद्ध हो चुके कल्पवृक्ष को सींच कर पुनः हरा भरा करने का प्रयास कर रहे हैं। Shashwat भईया हों , सर्वेश भईया या फिर सत्य काम आनंद भैया इन लोगों का भोजपुरी के लिए दिया जाने वाला योगदान सम्मानीय है। 

 जब भी हम किसी और शहर जाते हैं तो वहाँ की चीज़ें हमें ज़्यादा आकर्षित करती हैं और हम उन चीज़ों को अपनाने का पुरजोर प्रयास करते हैं। लेकिन उसके साथ ही हम अपनी जन्मस्थल की चीज़ों को भूलने लगते हैं साथ ही साथ जब कई महीनों बाद अपने गाँव या शहर आते हैं तो जहाँ रहते हुए हमें महज़ कुछ महीने हुए हैं उसका महिमामंडन करने लगते हैं। वहाँ की सड़कें , वहाँ का यातायात , वहाँ की स्वच्छता इत्यादि। हम ये भूल जाते हैं कि जिस मिट्टी में हम खेलें , कूदें और बड़े हुए हैं उसका महत्व क्या है हमारे लिए। मैं ये नहीं कह रहा की आप किसी शहर या नयी जगह जाईये तो वहाँ की चीज़ों को मत अपनाईये। बिल्कुल अपनाईये लेकिन अपनी जन्मभूमि के सम्मान और गौरव के साथ।  

भोजपुरी बहुत ही सरस और मधुर भाषा है। भोजपुरी में बात करने पर हमें अपनत्व का एहसास होता है। भोजपुरी जैसी दूसरी कोई भाषा है ही नहीं। ऐसी बातें आपको आत्ममुग्ध करती हैं जो कि कहीं से सही नहीं है। हर प्रान्त के भाषा की वही गुरुता है जो भोजपुरी की है।

केवल किसी चीज़ को दूर से देख कर निम्न दर्ज़ा दे देना ये सही नहीं है। भोजपुरी भाषा के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की ज़रूरत है, बहरहाल लोग इसके विरोध में खड़े होने के बजाय इसके पक्ष में खड़े हो कर इस भाषा का बचाव करें। अन्यथा आपके पास अपना कहने के लिए कुछ नहीं बचेगा।  










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