सचिन और धोनी से भी ज्यादा संघर्ष की भट्ठी में तपे लड़के की कहानी।


By - नवनीत मिश्रा


फ़ोटो - नई दुनिया


सचिन तेंदुलकर भी कोई बड़े बाप के बेटे नहीं थे, मगर बचपन में जब खेलते थे तो न पॉकेट मनी की चिंता थी न खाने-पीने और न ही रहने के इंतजाम की। गरीबी धोनी ने भी देखी मगर इतनी भी नहीं कि गुजर-बसर के लिए पानी पूरी का ठेला लगाना पड़ा हो। धोनी ने नौकरी की भी तो सरकारी। कभी बस में कंडक्टर रहे तो कभी रेलवे में टीटी। मगर इतने भी बुरे दिन नहीं थे कि उन्हें किसी सेठ की दुकान में चाकरी करनी पड़ी हो। विराट कोहली के पिता तो क्रिमिनल लॉयर थे।विश्व क्रिकेट के ये दिग्गज खिलाड़ी अपार प्रतिभाशाली रहे।उनकी सफलता उनकी प्रतिभा, अनुशासन और कठोर परिश्रम की देन है। सचिन महान हैं तो बाकी भी लीजेंडरी प्लेयर।

मगर बात जब मैदान के अंदर/ बाहर संघर्षों की होगी मैं तो यूपी के इस 17 बरस के क्रिकेटर को सचिन, धोनी और विराट कोहली से भी ऊपर स्थान दूंगा। सपने को पूरा करने के लिए कोई बच्चा कितना जिद्दी और जुनूनी हो सकता है, अपने सपने को पूरा करने के लिए कोई बच्चा टेंट में कई रातें गुजार सकता है, अपने सपने को पूरा करने के लिए कोई बच्चा मुंबई की सड़कों पर पानी-पूरी के ठेले लगा सकता है, वो भी उस स्टेडियम के बाहर पानी-पूरी बेच सकता है, जहां खुद प्रैक्टिस करता हो। अपने सपने केलिए नामुमकिन को भी मुमकिन करने वाले इस बच्चे का नाम यशस्वी जायसवाल है। 

यूपी के छोटे से क़स्बे भदोही निवासी यशस्वी जायसवाल की अल्पवय में संघर्षगाथा दिल को छू लेने वाली है तो आंखों को भिगो देने वाली भी। एक तो भदोही वैसे ही छोटा ज़िला, और ऊपर से यहाँ की सुरियांवा जैसी छोटी बाज़ार। यहां एक छोटी सी पान की गुमटी चलाने वाले दुकानदार का बेटा यशस्वी आज देश की अंडर 19 क्रिकेट टीम की तरफ से खेलने के लिए श्रीलंका के दौरे पर जा रहा। यशस्वी को श्रीलंका दौरे के लिए 11 खिलाड़ियों में जगह मिली है। यशस्वी के संघर्ष को देखकर इस बच्चे को सैल्यूट करने का दिल करता है।

भला सोचिए। क्रिकेटर बनने की धुन सवार थी। पापा से कहा-मुंबई जाना है। पापा ने कहा-जाओ बेटा। मुंबई के वर्ल्र्ली मे चाचा संतोष रहते थे, मगर घर छोटा था। रहने में दिक्कत होती थी।बस फिर क्या था कि यशस्वी बैग उठाकर मुंबई के आजाद मैदान चले आए।यहां एक ग्राउंडमैन से बात की तो मैदान के किनारे लगे टेंट में डेरा डालने का मौक़ा मिल गया। मैदान में प्रैक्टिस और मैदान में ही रातें गुज़रने लगीं। छोटे दुकानदार पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि मुंबई में बेटे का खर्च निकल सके। यशस्वी ने आइडिया निकाला। 

प्रैक्टिस से फुर्सत मिलती तो आजाद मैदान के बाहर पानी-पूरी के ठेले लगाते। खिलाड़ियों और अन्य लोगों को पानी-पूरी खिलाकर हर दिन डेढ़-दो सौ रुपये कमाई हो जाती तो उसी से प्रैक्टिस समेत बाकी खर्च निकालने लगे। कुछ साथी खिलाड़ी यशस्वी को ठेला लगाते देख सहानुभूति रखते तो कुछ मौज लेते।यशस्वी ने कुछ दिन तक एक डेरी पर भी लेबर का काम किया। मुंबई में कहीं ठौर-ठिकाना न होने और क्रिकेट प्रैक्टिस की थकान के कारण यशस्वी डेरी में फ़र्श पर ही सो जाते थे। यह देखकर डेयरी मालिक ने यशस्वी को भगा दिया था। 

मालिक ने कहा था-तुम केवल सोने आते हो, काम करने  नहीं। तब से यशस्वी स्टेडियम के टेंट में ही गुजर-ब्लर  करने लगे। हालांकि, अब यह युवा क्रिकेटर कदमवाड़ी की छोटी सी चाल में रहता है। आप ताज्जुब करेंगे कि अंडर-19 क्रिकेट खेलने जा रहे इस युवा के पास अपना एक स्मार्टफोन भी नहीं है। प्रदर्शन की बात करें तो इस युवा का लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम भी दर्ज है। 14 बरस की उम्र में अंजुमन इस्लाम उर्दू हाई स्कूल की तरफ से खेलते हुए राजा शिवाजी मंदिर के खिलाफ जाइस शील्ज मैच में यशस्वी ने नाबाद 319 रनों की पारी खेली थी। इसके बाद 99 रन देकर 13 विकेट भी लिए थे।पांच वर्षों यशस्वी के नाम  49 शतक दर्ज हैं। यशस्वी के संघर्ष को शायद मुकाम न मिल पाता, अगर उस पर कोच ज्वाला सिंह की नजर न पड़ती।ज्वाला ने ही मैदान मे इस उपेक्षित सितारे की तड़प को महसूस कर तरजीह देनी शुरू की। 

उम्मीद है कि संघर्षों की भट्ठी में तपकर निकले इस यशस्वी की यशोगाथा से एक दिन विश्व क्रिकेट चमत्कृत होगा।यह युवा टीम इंडिया में ज़रूर जगह बनाएगा। वैसे भी भी अब दिलीप बेंगसरकर जैसे ' जौहरी'का सानिध्य इस युवा को हासिल हो चुका है। 









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