फेसबुक पोस्ट ने दिला दी दिव्यांग माता -पिता की बेटी को साईकल।


By - मैं थिंकर


फ़ोटो - द किविंट 


इस दुनिया में हमेशा से ही माता-पिता का दर्ज़ा सर्वोच्च रहा है। फिर चाहे बात प्राचीन काल की हो या वर्तमान समय की।


माता-पिता की आमदनी भले कितनी ही कम क्यों न हो वे अपने बच्चों को हर सुख देना चाहते हैं। फिर उन्हें इसके लिए क़र्ज़ ही क्यों न लेना पड़े। इन सब के बावजूद हम बच्चे उनसे किसी भी चीज़ के लिए ज़िद करने लगते हैं। हमारी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए वे बिना आह भरे बस ये सोचकर हमें किसी भी चीज़ को दिलाने के लिए हाँ कर देते है कि वे अब से एक घंटा ज़्यादा नौकरी कर लेंगे और अपने बच्चों को उसका मनपसन्द खिलौना दिलाकर उसे खुश कर देंगे।

फ़ोटो - द किविंट 

हमारे माता पिता हमेशा इस बात के लिए तैयार रहते हैं कि वे ज़्यादा काम करके अपना शरीर तुड़वा लेंगे लेकिन अपने बच्चों का दिल नहीं तोड़ेंगे।

ऐसे ही कुछ कहानी है बैंगलुरू की मंजूश्री की।

मंजूश्री के पिता का नाम नागेश मूर्ति है और माँ का नाम सुधा। दोनो ही शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं।  मंजूश्री अभी सिर्फ 8 साल की हैं। ज़ाहिर है उसके अंदर भी बचपना फूट-फ़ूटकर भरा होगा। नागेश और सुधा दोनों जीवनयापन के लिए नींबू बेचते हैं। नींबू की दुकान पर मंजूश्री भी होती थी और वह वहीं अपने माता-पिता से साइकल दिलाने की ज़िद करती थीं। नागेश और सुधा ने तो सोच लिया था कि वे अब ज़्यादा मेहनत करके अपनी बेटी के लिए जल्द से जल्द साइकल खरीद देंगे।

फ़ोटो - द किविंट


लेकिन एक दिन अचानक ही 24 घंटों के अंदर उनकी बच्ची के पास एक स्पोर्ट साइकिल आ जाती है। जिसे देखकर माता-पिता और बच्ची दोनों खुशी से झूम उठते हैं।

दरअसल इस मामले का खुलासा तब हुआ जब वित्तीय योजनाकार और व्हाइटफील्ड निवासी नागराज बसारकोड ने एक फेसबुक पोस्ट के ज़रिए इस बात की जानकारी दी। नागराज ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा कि ये जोड़ा जीवन जीने के लिए नींबू बेचता है। मैंने एक दिन नींबू खरीदने के दौरान इन दोनों की समस्या सुन ली थी कि कैसे ये दोनों अपनी बच्ची को एक साइकिल दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। तभी मैंने इस बच्ची के लिए कुछ करने का फैसला लिया, जिसके बाद अंवाया फाउंडेशन के संपथ रामानुजम से बच्ची के लिए एक कदम उठाने के लिए कहा।

फ़ोटो - द किविंट

अंवाया फाउंडेशन फेंकी हुई और बेकार साइकिल को नया बनाकर ज़रूरतमंद लोगों को देते हैं। रामानुजम ने साइकिल के लिए उस जोड़े से बात की क्या वाक्ई आपको साइकिल की ज़रूरत है। जोड़े की हामी के बाद रामानुजम ने एक अच्छी साइकिल की खोज शुरू कर दी। 24 घंटे बाद कहीं जाकर मराठहल्ली चक्र संग्रह केंद्र पर साइकिल मिल पायी। रामानुजम बताते हैं, “मैंने साइकिल चालक गिरीश कुमार और एक अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर कार में रखकर साइकिल को उस जोड़े के घर तक पहुंचाया। जब मैंने माता-पिता को बुलाया और उन्हें साइकिल के बारे में बताया यह जानकर वे बहुत उत्साहित हुए।” साइकिल देखते ही बच्ची के चेहरे पर एक मुस्कुराहट फैल गई।






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