मुन्ना बजरंगी की तो हत्या हो गयी हैं, अब जरा उनके बारे में भी पढ़ लें !


By - राकेश पाणिग्राही




फ़ोटो - एबीपी न्यूज़ 



मुन्ना बजरंगी का जन्म 1967 में यूपी के जौनपुर जनपद के सुरेरी थाना क्षेत्र के अंतर्गत कसेरू पूरदयाल गाँव मे हुआ था।

मुन्ना बजरंगी का असली नाम प्रेम प्रकाश सिंह है। उनके पिता श्री. पारसनाथ सिंह थे; जो कि इन्हें पढा-लिखा कर एक सभ्य व्यक्ति  बनाना चाहते थे, लेकिन प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना बजरंगी ने अपनें पिता के अरमानो को कुचल दिया। मुन्ना पांचवी कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई छोड़ दी और छोटे-बड़े अपराधों में अपनी किस्मत आजमाना सुरू कर दिया।

किशोर अवस्था में आते-आते मुन्ना ने कई गैर कानूनी और असंवैधानिक कामों में अपना अस्तित्व बना लिया था, जो की उसे जुर्म की दुनिया में ले जाने के लिए काफी था।

बजरंगी को हथियार रखने का सोख बचपन से ही था फिल्मो में दिखाए गए चरित्र की तरह और उसकी यही दिलचस्पी ने उसे 17 साल की नाबालिक उम्र में जुर्म की दुनिया में घसीट लिया।

बजरंगी का जुर्म की दुनिया में जन्म 15 साल की नाबालिक उम्र में ही हो गया था 1982 तक उसपर कई मुकदमे दर्ज हुए जौनपुर में मारपीट और अवैध असलहा रखने के (u/s 147,148, 323 of IPC).
बस इसके बाद बजरंगी ने पिछे पलट कर फिर कभी नहीं देखा और बस जुर्म की दुनिया में आगे बढ़ता चला गया।

1984 यानी की 17 साल की उम्र में मुन्ना पर पहली बार हत्या और डकैती का मुकदमा दर्ज हुआ। जिसके बाद उसका का दबदबा और तेज़ी से बढने लगा। जौनपुर के बाद अब पुरा उत्तरीय यूपी उसकी खोफ मै था।

अस्सी की दशक में मुन्ना ने अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, इसी दौरान उसे जौनपुर के स्थानिय दबंग माफिया गजराज सिंह का संरक्षण मीला।


फ़ोटो - आजतक

मुन्ना अब गजराज सिंह के लिए काम करने लगा था। उस वक्त गजराज सिंह का दबदबा पुरे प्रदेश में था और हालांकि मुन्ना से भी लोग खौफ खाते थे।।

1984 तक मुन्ना की तलवार को खून लग चुकी थी और उसकी भुख बढती जा रही थी। इसी दौरान मुन्ना ने एक व्यापारी की हत्या कर दी और इसके बाद गजराज सिंह के कहने पर ही मुन्ना ने जौनपुर के भाजपा के विधायक रामचंद्र सिंह और उनके सरकारी गनर अब्दुल्लाह समेत तीन लोगों की हत्या कर दी।

भाजपा नेता के हत्या के बाद मुन्ना का नाम अपराध जगत में ऊपर उठने लगा था।  अब जौनपुर से शुरू हुआ वारदातों का सिलसिला आगे बढने लगा।

इसी दौरान 1996 मैं जौनपुर में कैलाश दुबे नाम का व्यक्ती अपनी राजनीतिक कॅरियर के लिए लोगो के दिल में बसने लगा था। कैलाश दुबे जल्द ही ईज्जत, शोहरत और प्यार हासिल कर के रामपुर के ब्लाक का प्रमुख चुन लिए गया।

यह बात अब स्थानिय नेताओं को रास नहीं आ रही थीं। गजराज को लगने लगा था कि कैलाश की गति गजराज के राजनीतिक कॅरियर को संकट में डाल सकता है; और फिर गजराज ने कैलाश को जान से मारने का मन बना लिया ओर इसकी जिम्मेदारी दे दी मुन्ना बजरंगी को।।

कैलाश की मौत की सुपारी मिलते ही मुन्ना ने 1996 में रामपुर थाना के जमालपुर बाजार के पास AK-47 से ब्लाक प्रमुख पंचायत सदस्य समेत तीन लोगों को मौत के घाट उतार दिया। *यह पहली बार था जब जिले में AK-47 तङतङाई गईं थी।*

जौनपुर के बाद वाराणसी और फिर दिल्ली तक मुन्ना का नाम फैल चुका था ओर अब वह जौनपुर ज़िला का एक खौफनाक अपराधी बन चुका था।
अब हर शख्स ख़ौफ में जिने लगा था कि न जाने कब मुन्ना पैसों के लिए ओर अपनी पहचान बनाने के लिए किसी को भी मौत के घाट उतार देगा। ।

धीरे धीरे उसने वाराणसी की और अपना रूख़ मोङ लिया और उसने कैंट इलाके में छात्र नेता राम प्रसाद शुक्ल की हत्या कर दी।  धीरे-धीरे उसका नेटवर्क देश की राजधानी दिल्ली में तक पहुँच गया ओर फिर इसके बाद 1988 से 2000 के बीच  मुन्ना ने कई बङी वारदातों को अंजाम दिया ओर अपराध जगत में सुर्खिया बटोरने लगा।


2002 में फिर एक बार मुन्ना अपना अस्तित्व कायम करने के लिए पूर्वांचल पहूंचा ओर उसने वाराणसी में एक स्वर्ण व्यापारी की दिन दहाङे गोली मार कर हत्या कर दी।

इसी समय मुन्ना, मुख्तार अंसारी के लिए काम करता था जो की 90 के दशक में पूर्वांचल के बाहुबली माफिया ओर राजनेता थे।

मुख्तार अंसारी ने अपराध जगत की दुनिया से राजनीति में कदम रखा ओर 1996 में सपा के टिकट पर मऊ के विधायक चुनें गए। जिसके बाद मुख्तार की ताकत बढने लगी ओर मुन्ना लगातार उसके निर्देशन पर काम करने लगा था।

पूर्वांचल मे सरकारी ठेकों ओर वसूली के कारोबार पर मुख्तार अंसारी का कब्जा था; लेकिन इसी दौरान विपक्षी पार्टी भाजपा के विधायक कृष्णानंद राय उनके लिए चुनौती बनने लगे। क्योकि राय पर मुख्तार अंसारी के दुश्मन बिजेश सिंह का संरक्षण था ओर उसके संबध अंङरवल्ङ के साथ भी जुङे थे।

कृष्णानंद राय का प्रभाव बढता देख मुख्तार ने उसे अपने रास्ते से हटाने का जिम्मा मुन्ना को सोंप दिया। 

मुख्तार का फरमान मिलते ही मुन्ना ने भाजपा के विधायक कृष्णानंद राय को जान से मारने की साजिश रची ओर फिर 29 नवम्बर 2005 को मुन्ना ने राय को दिन दहाङे गोली मार कर मौत की नींद सुला दी। मुन्ना ने अपने साथियों के साथ मिलकर लखनऊ हाईवे पर राय की दो गाङियो पर AK-47 से 400 गोलियाँ दागी थीं। इसी दौरान राय के साथ चल रहे छह अन्य लोग भी मारे गए। *पोस्टमार्टम के दौरान हर मृतक के शरीर में 60 से 100 गोलियाँ बरामद हुईं।*


फ़ोटो - दैनिक जागरण

इस हत्या के बाद मुन्ना मोस्ट वांटेड बन गया, उस पर सात लाख रुपये का ईनाम भी घोषित कर दिया गया था यूपी पोलिस द्वारा। पोलिस का दबाव बढ़ता जा रहा था ओर मुन्ना लगातार अपनी जगह बदलने लगा था।

मुन्ना को अब यूपी, बिहार ओर दिल्ली भी असुरक्षित महसूस होने लगा था ओर उसे अपने एनकाउन्टर का भी ङर सता रहा था।

मुन्ना छुपकर बंबई आ गया और बंबई के मलाङ में रिक्शा चलाने लगा, ताकि उसे कोई ढूंढ न सके। ऐसा माना जाता है कि मुन्ना को अपने एनकाउन्टर का ङर सता रहा था इसिलिए उसने एक योजना के तहत दिल्ली पोलिस से अपनी गिरफ्तारी कराई थी। 29 अक्टूबर 2009 को दिल्ली पुलिस ने भेस बदल कल मुन्ना को मलाङ से गिरफ्तार कर लिया।।

गिरफ्तारी के तकरीबन चार साल बाद मुन्ना को राजनितिक में उभरने की चाह जगी; सामने था 2012 का विधान सभा चुनाव। पर मुन्ना तिहाङ जेल में कैद था पर उसे लगता था कि अगर उसे मङियाहू सीट से सपा का टिकट मील जाएगा तो वो जीत जाएगा पर सपा ने मङियाहू से श्रद्धा यादव को टिकट देकर अपना उमीदवार घोषित कर दिया; लेकिन मुन्ना थमा नहीं उसने निर्दलीय पर्चा भरा पर इस बार मुन्ना असफल रहा ओर सपा की उमीदवार श्रद्धा यादव चुनाव जीत गईं।

इसी दौरान मुन्ना के संबध मुख्तार अंसारी से बिगङते जा रहें थे; हालांकि इसके चलते मुख्तार अंसारी ने मुन्ना के लोगों की मदद करना भी बंद कर दिया था।

फिर मुन्ना ने काग्रेस का हाथ थामा वह काग्रेस के एक नेता के शरण में पहुँचे जो की जौनपुर का ही रहने वाला था पर बंबई में रहकर सियासत करता था।  कहा जाता है कि मुन्ना ने एक बार नेता जी को महाराष्ट्र के विधान सभा में भी मदद की थीं।।

9 जुलाई 2018 सोमवार की सुबह मुन्ना बजरंगी की बागपत जेल में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. उसे एक विधायक से रंगदारी मांगने के मामले में पेशी पर झांसी से बागपत लाया गया था. इसी दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुख्यात सुनील राठी ने जेल में ही मुन्ना को गोली मार दी।









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