क्या भारत में हिन्दू धर्म जैसा कोई धर्म कभी रहा है ?


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क्या भारत में हिन्दू धर्म जैसा कोई धर्म कभी रहा है ? हिन्दू धर्म छोड़िये , क्या भारत में इस्लाम के आगमन के पहले कोई भी धर्म रहा है ?

जवाब है नहीं.

उस दौर में धर्म के समकक्ष कुछ रहा है तो सिर्फ बौद्ध और जैन जैसा सम्प्रदाय , जो अपने प्रमुख व्यक्तियों के विचार और व्यवहार का अनुयायी था. जिसकी अपनी संस्कृति और आध्यात्मिक परम्परा थी.

भारत में प्राचीनकाल से ही देवता ( आदिपुरुष ) और उनके पूजक रहे हैं. सभी जातियों में उनके स्वयं के देवता थे. इसीलिए उन्हें उन जातियों का कुल देवता कहा गया. विभिन्न जातियों के कुलदेवता वाचिक कथा और परंपरा के रूप में आज भी अस्तित्व में हैं. उनका अस्तित्व न किसी धर्म से जुड़ा रहा है न ही किसी ग्रंथ से. 

जिसे आज हम हिन्दू धर्म कहते हैं वह असल में ब्राह्मण जाति के काल्पनिक देवी-देवताओ का समुच्चय है जिसमें बाद में अनेक जातियों के देवी देवताओं को जबरन शामिल किया गया. जिसमें अनेक जातियों की सांस्कृतिक पूंजी और आध्यात्मिक परंपरा भी जबरन शामिल की गयी. जिसका ब्राह्मणों से कोई संबंध नहीं था.

चूंकि शिक्षा मात्र ब्राह्मणों और कुलीन शासको का जन्मसिद्ध अधिकार थी इसलिए उन्होंने अपने देवताओं की स्तुति, वंदना और कथाओं को लिपिबद्ध किया. अपने वर्चस्व वाली संस्कृति स्थापित की. अपनी आध्यात्मिक परंपरा और पाखंड को दूसरों पर थोपा. अन्य जातियाँ ऐसा नहीं कर पाई क्योकि उन्हें पढ़ने लिखने का अधिकार नहीं था. अगर होता तो वह भी अपनी जाति के देवी-देवताओ की स्तुति , वंदना , कथाये ,  आध्यात्मिक परंपरा और संस्कृति को लिपिबद्ध करती. आज इन सब के नाम पर उनके पास जो भी मूल रूप में है वो उनकी दीर्घकालिक वाचिक परंपरा और स्थापित प्राचीन संस्कृति के निरंतरता की देन हैं.

ब्राह्मणों ने अतीत में इस स्थिति का भरपूर फायदा उठाया है. उन्होंने अपनी सुविधानुसार समय समय पर दूसरी जाति के देवी-देवताओ को हाईजैक किया. उन्हें जिस जाति का जो देवता पसंद आया उसे ब्राह्मणीय देवता बना दिया और जो खराब लगा उसे खलनायक घोषित कर राक्षस बना दिया. उन्होंने अनेक जातियों की संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा पर अपना वर्चस्व थोपा , उन्हें अपने अधीन किया और जो अपने अनुरूप ठीक नहीं लगे उन्हें असभ्य और बर्बर घोषित किया.

आज ब्राह्मणों की आस्था और पाखंड को हिन्दू धर्म माना जाता है. उनके द्वारा लिखित ग्रंथो को हिन्दू धर्मग्रंथ माना जाता है. उनके द्वारा स्थापित और अन्य जातियों के हड़पे हुए देवी-देवताओ को हिन्दू धर्म का प्रमुख देवी-देवता माना जाता है. उनकी संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा को हिन्दू धर्म का मूल माना जाता है तथा अन्य जातियों के देवी-देवता पूजकों को हिन्दू धर्म के अंतर्गत शामिल माना जाता है. 

लेकिन यहां न हिन्दू जैसा कुछ है और न ही धर्म जैसा कुछ है. यहां सिर्फ एक ब्राह्मण जाति है , उसके द्वारा लिखित कुछ ग्रंथ हैं , उसकी आस्था और पाखंड है , उसकी ब्राह्मणीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराएं है , उसके अधीन जबरन हिन्दू कह कर कथित धर्म के रूप में संगठित की गई अनेक जातियों की आस्थाएं और मान्यताये है.  इसीलिए कथित हिन्दू धर्म ईसा के नाम पर ईसाई , बुद्ध के नाम पर बौद्ध जैसे धर्म एवं सम्प्रदाय की तरह स्वयं के आदिपुरुष या देवता का  नाम तक धारण नहीं करता.  हिन्दू शब्द भी एक फारसी शब्द है. इसीलिए कथित हिन्दू धर्म में ब्राह्मण सर्वोच्च स्थान रखता है और बाकी सभी उससे निम्न हैं.

वास्तव में ब्राह्मणों ने समाज को श्रेणीक्रम में विभाजित कर लंबे समय से राजनीतिक और सांस्कृतिक वर्चस्व कायम रखा है. ब्राह्मणों के इस विभाजन को उनके कथित हिन्दू  धर्म ने वैधता प्रदान की है जो मूलरूप में धर्म नहीं बल्कि एक जाति (ब्राह्मण) की सामाजिक , आध्यात्मिक और सांस्कृतिक तानाशाही है. इस कथित धर्म का विभाजन ही इसकी मज़बूती और कमजोरी दोनो है. ये मज़बूत तभी तक रहेगा जब तक विभाजित समूह अशिक्षित , पाखंडी और धर्मभीरु हैं. जिस दिन वो शिक्षित , जागरूक और वर्गीय आधार पर एकजुट हो गए उस दिन यह  कथित हिन्दू धर्म और उसके मूल में बसी ब्राह्मणीय सत्ता ध्वस्त हो जाएगी.

भला हो सूचना क्रांति का कि यह प्रक्रिया अब शुरू हो चुकी है और बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है. आगे आने वाले बीस-पच्चीस  सालों में ब्राह्मणों का कथित हिन्दू धर्म इतना कमजोर हो जाएगा जितना इतिहास में कभी नहीं रहा.





लेखक स्वतंत्र विचारक हैं। 





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