ये गैंगरेप पीड़िता आज भी अपने अपराधियों की फ़ोटो साथ लेकर चलती हैं।


फ़ोटो - बीबीसी 

लगभग छह साल पहले गैंगरेप का शिकार हुई ये लड़की आज भी अपने अपराधियों की तस्वीरें अपने बैग में रखती है क्योंकि वो भूलना नहीं चाहती कि इस दौरान उसने क्या खोया.

उसने खोया सिर से बाप का साया. उसके बलात्कार का वीडियो पिता तक भी पहुँच गया था. नतीजा उन्होंने आत्महत्या कर ली.

घटना के बाद अपना गाँव छोड़ चुकी ये लड़की अब हिसार में अपनी माँ और भाई के साथ रहती है.

दिसंबर 2012 में निर्भया के साथ हुए दर्दनाक हादसे को पूरा देश जानता है. उस घटना से ठीक तीन महीने पहले ये गैंगरेप हुआ था. गाँव के ही आठ जाट लड़कों पर अनुसूचित जाति की इस लड़की के साथ गैंगरेप का आरोप था.

तब बारहवीं क्लास में पढ़ रही ये लड़की 16 साल की थी. गैंगरेप के बाद डर के मारे उसने किसी को कुछ नहीं बताया. बलात्कार करने वाले अगले दिन उसके वीडियो के साथ स्कूल के बाहर पहुँच गए.

वो इतनी डरी हुई थी कि नौ दिन तक किसी को कुछ नहीं बताया, लेकिन वो वीडियो उसके पिता तक पहुँच गया. 18 सितंबर 2012 की रात जब वो लड़की अपनी माँ के साथ हिसार में अपनी नानी के घर पर थी, उसके पिता ने ज़हर खा लिया.

इस घटना को लेकर इतना ग़ुस्सा पैदा हुआ कि गाँव में उसकी जाति के लोगों और सामाजिक संगठनों ने उसके पिता के शव के साथ विरोध प्रदर्शन किया. तमाम दबावों के बाद 24 सितंबर 2012 को एक अभियुक्त को पकड़ लिया गया. उसके बाद ही उसके पिता का दाह संस्कार हुआ.

मामला मीडिया में तूल पकड़ चुका था. बड़े-बड़े नेता फ़ोन पर उसे अपना समर्थन दे रहे थे.

एक लड़के के पकड़े जाने के बाद बाक़ी अभियुक्तों की भी गिरफ़्तारी हुई. एक साल फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में केस चला. आठ में से चार अभियुक्तों को तो उम्र क़ैद की सज़ा हुई, लेकिन बाक़ी चार को बरी कर दिया गया.

प्रशासन ने क़रीब 12 लाख मुआवज़े की रकम भी दिलवाई. पीड़िता की माँ को 9200 रुपए महीने के कांट्रैक्ट पर नौकरी भी दी गई और उसी नौकरी के साथ मिला रहने के लिए दो कमरे का मकान भी.

ये सब जानने के बाद ऐसा लगता होगा कि बलात्कार की शिकार लड़की को न्याय मिल गया. जब मीडिया और राजनेताओं की नज़र बराबर बनी हुई हो तो इतना सब होना मुमकिन हो सकता है.

लेकिन जहाँ उनकी नज़र नहीं पड़ी, इस लड़की की कहानी वही बताती है.
हिसार में अपने घर पर वह अपनी कहानी छह साल पहले से शुरू करती है. हम एक छोटे से कमरे में बैठे थे, जहाँ कोने में एक खाली गैस सिलेंडर रखा था. कपड़ों का ढेर हटाकर हम चारपाई पर बैठे गए.

साथ के कमरे में एक पुलिस कांस्टेबल भी था. लड़की की माँ बस अभी नानी के घर से लौटी थीं. छोटे से घर में चार लोग भी भीड़ जैसे महसूस हो रहे थे.

वो याद करती है कि गांव वाले घर के आंगन में पिता का शव रखा था, लोगों की भीड़ जमा थी. इस बीच वो ना जाने क्या सोचकर बारहवीं का इम्तिहान देने स्कूल चली गई. बलात्कार की घटना हुए 15 दिन होने को आए थे और तब तक इलाज भी मिलना शुरू नहीं हुआ था. दर्द की वजह से बैठना भी मुश्किल होता था.

वो आँखें झुकाए बोले जा रही थी, "मेरी क्लास में हमारी जाति से उस वक्त मैं और मेरी सहेली ही थे, जो गाँव के स्कूल में पढ़ते थे. बलात्कार करने वाले कुछ लड़के शायद मुझे पहचानते थे. जब वो मुझे स्कूल के बाहर ब्लैकमेल करने आए तो मेरी वो सहेली भी मेरे साथ थी. उसने मुझे उनमें से दो लोगों के नाम बताए थे."

उसने बताया, "मेरी उस सहेली का भी बाद में बलात्कार हुआ था. आज वो ज़िंदा नहीं है. हमारे गाँव की कई लड़कियाँ हैं, जिनके साथ यही किया गया. हमारी जाति के लोग काफ़ी ग़रीब हैं और वो ऊँची जाति वालों के खेतों में काम करते हैं. वो कैसे अपनी बेटियों के लिए उन लोगों से लड़ पाएंगे? मेरे पिता की मौत ना होती और इतना प्रदर्शन ना हुआ होता तो हम भी ना लड़ पाते."

उसने बताया कि कोर्ट में मामला जाने से पहले गाँव की पंचायत ने प्रस्ताव रखा था कि उन्हीं अभियुक्तों में से किसी एक से उसकी शादी करवा दी जाए. लेकिन उसने इससे साफ़ इनकार कर दिया था.

मामला कोर्ट में चलने लगा. बारहवीं पास करने के बाद अब कॉलेज में दाख़िला लेना था क्योंकि वो पढ़ना चाहती थी, आगे बढ़ना चाहती थी.

"बारहवीं के बाद हिसार के एक गर्ल्स कॉलेज में दाख़िला लिया तो वहाँ लड़कियों ने टिप्पणियाँ करनी शुरू कर दीं. उन्हें किसी तरह पता चल गया था कि मेरे साथ क्या हुआ है. परेशान होकर कॉलेज के प्रिंसिपल से शिकायत की तो कोई कार्रवाई करने की बजाय उन्होंने मुझे टाल दिया. आँतों में इंफ़ेक्शन था. सरकारी अस्पताल में ठीक से इलाज नहीं मिल पा रहा था. ज़िलाधिकारी से शिकायत की तो उन्होंने कॉलेज के प्रिंसिपल और अस्पताल के सीएमओ को तलब किया. उन दोनों ने माफ़ी तो माँगी, लेकिन मुझसे मीडिया में बयान देने को कहा कि मेरी दिमाग़ी हालत ठीक नहीं है और इसलिए मैंने ये सब आरोप लगाए."

उसके बाद उसने कॉलेज छोड़ दिया क्योंकि अब वहाँ पढ़ने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. पूरा साल ख़राब हो गया और फिर पढ़ाई से भी मन हटने लगा.

स्थानीय सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं हो पा रहा था तो प्राइवेट अस्पताल में इलाज शुरू करवाना पड़ा.

वो बताती है कि आज भी जब वो कभी आत्मविश्वास के साथ से घर से बाहर निकलती है तो हिसार में उसके पड़ोसी टिप्पणी कर देते हैं और ऐसा करने वालों में महिलाएं भी शामिल हैं.

माँ को जो कांट्रैक्ट पर नौकरी मिली थी, वो कुछ महीने रहती और कुछ महीने नहीं. तीन साल बाद साल 2017 में एक दूसरे शहर में वकालत की पढ़ाई शुरू की, लेकिन यहां हॉस्टल की 14 हज़ार की फ़ीस जुटाना भी मुश्किल हो गया था. किताबों के लिए भी पैसे नहीं थे.

"ज़िलाधिकारी दफ़्तर से जवाब मिला था कि दोबारा से कांट्रैक्ट बनाए जाएँगे. फ़िलहाल मैं माँ से घर चलाने के लिए कुछ पैसे ले लेती हूँ. जो पैसा मुआवज़े में मिला था वो पुराने कर्ज़ में, बेटी के इलाज और वकील की फ़ीस में खर्च हुआ."

उन्हें सरकारी वकील तो दिया गया, लेकिन फिर भी निजी वकील की ज़रूरत पड़ी जिसकी फ़ीस प्रशासन ने नहीं दी बल्कि उन्होंने ख़ुद जुटाई.

हाईकोर्ट में बरी कर दिए गए चार लोगों के ख़िलाफ़ पीड़िता आज भी मुक़दमा लड़ रही है. उसका कहना है कि बरी लोगों में से दो लोग हरियाणा के एक राजनेता के रिश्तेदार हैं. कई बार जान से मारने की धमकी दी जा चुकी है. इसलिए अब भी उसके साथ एक पुलिसकर्मी की ड्यूटी रहती है.

मैंने उससे पूछा कि कभी ये डर नहीं लगता कि नई जगह पर किसी को इस हादसे के बारे में पता चल गया तो?

वो कहती है, "मैं दोस्त बनाती ही नहीं अब. शुरुआत में तो सब साथ दे रहे थे, लेकिन आज कोई नहीं पूछता कि हम किस हालात में रह रहे हैं. मैं अब किसी पर भरोसा नहीं करती हूँ. घरवालों पर भी नहीं.''

उसकी बातों से लगा कि उन्हें मुआवज़े का पैसा मिलने की वजह से उनके रिश्तेदारों और बाक़ी लोगों की सहानुभूति जाती रही.
हिसार में आपराधिक मामलों के वकील लालबहादुर कहते हैं, "मैंने कितने ही हाई-प्रोफ़ाइल मुक़दमे देखे हैं. शुरू में तो सब लोग पीड़िता के साथ दिखाई देते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद कोई मदद के लिए नज़र नहीं आता. ये तो मीडिया की वजह से हाई प्रोफ़ाइल केस था तब ऐसा है. यहाँ मुक़दमों के ढेर हैं, जहाँ पीड़िताएं क़ानूनी और आर्थिक मदद के लिए चप्पल घिसती रह जाती हैं."

हिसार की सामाजिक कार्यकर्ता शंकुतला जाखड़ कई सालों से महिलाओं के लिए काम कर रही हैं. प्रशासन की ओर से पीड़िता को मिलने वाली सरकारी वकीलों की मदद को वो नाकाफ़ी मानती हैं.

शकुंतला के अनुसार, "बहुत बार सरकारी वकील पीड़िता के लिए संवेदनशील नहीं होते. उनकी ट्रेनिंग ठीक से नहीं होती है. पीड़िता को वो वक्त भी कम दे पाते हैं और कभी-कभी सीधा तारीख़ पर ही कोर्ट में मिलते हैं. पीड़िता का हित देखने की बजाए वे अपने हिसाब से चलना पसंद करते हैं. ऐसे में पीड़िता को निजी वकील की मदद लेनी ही पड़ती है."

वहीं सरकारी अस्पतालों पर वो कहती हैं कि स्थानीय सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव होने की वजह से लोग बड़े सरकारी अस्पतालों में जाते हैं और वहाँ भी कई दिन तक उन्हें इंतज़ार करना पड़ता है. तुरंत इलाज की ज़रूरत देखते हुए पीड़िता के पास प्राइवेट अस्पताल जाने का ही विकल्प बचता है.

हिसार के ज़िलाधिकारी दफ़्तर ने पीड़िता की मां की नौकरी को लेकर बताया कि जिस विभाग में वे काम करती हैं, वहां नई एजेंसी आएगी और नए कांट्रेक्ट बनेंगे. उसके बाद उन्हें नौकरी पर रखा जाएगा.

दूर से ऐसा लग सकता है कि बलात्कार पीड़िता को न्याय मिल गया और उसके पुर्नवास की भी सरकार ने व्यवस्था कर दी है, लेकिन एक पीड़िता को कितनी ही सामाजिक, आर्थिक और मानसिक चुनौतियों से गुज़रना पड़ता है.

जहाँ मीडिया का दबाव नहीं होता और जहाँ मौत जैसी त्रासदी नहीं होती, वहाँ एक बलात्कार पीड़िता की स्थिति क्या होती है, आप इस कड़ी की पिछली रिपोर्ट में पढ़ सकते हैं.

फ़िलहाल घर में आर्थिक तंगी है और माँ की नौकरी की वजह से मिला घर भी छूट जाने का डर है. पीड़िता ने एक अंतराल के बाद अपनी पढ़ाई तो शुरू कर दी है, लेकिन अब भी बाक़ी आरोपियों से लड़ने की कोशिश जारी है.

मेरे जाने से पहले उसके आख़िरी शब्द थे, "मैं बस चाहती हूँ कि कुछ बन जाऊँ और एक दिन उन अपराधियों से मिलूँ. उनकी तस्वीरें इसलिए रखती हूँ ताकि ये हादसा भूलूँ ना."




साभार - बीबीसी 




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