I LOVE YOU, I HATE YOU से दूर प्रेम के वास्तविक भाव दिखाते हैं ‘चाहतों के साए में’।









ऐसे समय में जब प्रेम की सारी वेदना सिकुड़कर तीन शब्दों (I LOVE YOU, I HATE YOU) में सिमट गयी हो, उस समय में बसंत चौधरी की कविता, गजल, गीत संग्रह 'चाहतों के साये में' फिर से प्रेम के वास्तविक भावों को जागृत करती है. प्रेम के सभी पक्षों पर प्रकाश डालती है। प्रेम के बिखरे तंतुओं को फिर से जोड़ती है और अध्यात्मिक प्रेम को फिर से परिभाषित करती है क्योंकि प्रेम एक ऐसा एहसास है जिसमें सबकुछ सुन्दर लगने लगता है-  

        हो गया मौसम सुहाना चाहतों के साये में
       मिल गया दिल को बहाना चाहतों के साये में

उम्र धीरे-धीरे बहुत से एहसासों को संजोते हुए बढ़ती है, बचपन में खुशी और गम का प्रवाह अल्प समय में चलता रहता है बच्चा कभी खुश हो जाता है कभी दुखी, जल्दी-जल्दी उसके भाव बदलते रहते हैं, जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है बहुत सी भावनाएं अंतःकरण में पनपने लगती हैं और अल्पकालिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक भी होने लगती हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है हमारी भावनाएँ भी परिपक्व होने लगती हैं। यही परिपक्वता हमें अध्यात्म की तरफ ले जाती है। प्रेम जब परिपक्व होता है तभी पूर्ण होता है, जीवन में इन तमाम प्रकार की भावनाओं का उतार-चढ़ाव आता रहता है। यह पूरी किताब जीवन के इसी उतार-चढाव को संदर्भित करती है।

एक कवि की सार्थकता यही होती है कि वह उन भावों को जिसको उसने जिया है उसे लिखे और कवि बसंत चौधरी 'सागर' ने अपने जीवन में प्रेम के तमाम पड़ावों को जिया है, ‘चाहतों के साये में’ उसका जीता-जागता दस्तावेज़ है। मैं इसी किताब से उदहारण स्वरूप कविता के कुछ अंश को ले रहा हूँ ....
 
एक युवा मन में कैसे बंसत आता है इसका वर्णन देखिए.

   विचित्र है अक्षरों का बगीचा
   पल्लवित न होने पर भी पेड़-पौधे
   ग्रीष्म की आग में खिल जाते हैं
   हँसता हुआ आता है बसंत
   ठंढ को चीरते हुए प्रकट हो जाता है
   अनायास बसंत !

इसके बाद जब इन प्रेम की तरंगों के सुन्दर भावों को कोई शब्द दे देता है तो वही कवि हो जाता है, कवि बसंत लिखते हैं
 
  कोई कवि तभी बनता है
  जब प्रकृति के सौन्दर्य में खिलता है.

यह किताब आपको अपने प्रेम में फिर से धड़कने का मौका देती है, फिर से जीवन में प्रेम की अनुभूतियों का संचार करती है। एक प्रेमी जब प्रेम में होता है यही तो पुकारता है-    
  
वफाओं का मुझे इनाम दे दो
मोहब्बत का छलकता जाम दे दो
 तसल्ली दिल को हो जाए ज़रा सी
 तुम ऐसा कोई तो पैगाम दे दो
एक इसी भाव को भारती एक नज्म
 मैंने सुना है दो दिल वाले
  जब ताजमहल में मिलते हैं
 कांटों से भरी शाखों पर भी
चाहत के फूल खिलते हैं
तुम आओ तो हम भी देखें
क्या सच है और क्या अफसाना
तुम रस्म-ए-वफ़ा निभाना
ताजमल में आना-जाना  

आज की शरारतें कितनी ही सतहीं हो गयी हैं लेकिन जब एक कवि अपनी कलम से शरारत को शब्द देता है वह कितनी शानदार होती है-
     
 जुल्फों को छेड़ती है, दामन से खेलती है
   छूकर तुम्हें हवा भी मदहोश हो गयी है
  
कहा जाता है प्रेम में सब कुछ सुन्दर हो जाता है या हम उसको सुन्दर देखने लगते हैं, प्रेम में कवि सुन्दरता का किस प्रकार वर्णन करता है यह इस गजल में देखिए...
   
  
   करता है नाज़ खुद पर वो चाँद आसमां का
   जब चाँदनी तुम्हारे क़दमों को चूमती है .
 
आज का वह दौर जब ब्रेकअप पार्टी होती है, कितना सरल लगता है किसी का साथ छोड़ना, प्रेम में आज विरह जैसी कोई चीज नहीं रही लेकिन कवि ने जिस विरह का जिक्र किया है उसको निश्चित तौर पर कवि ने अपने जीवन में अनुभव किया है

       गम का सूरज जिंदगी को पी रहा है
      आसमां बादल की चादर सी रहा है
      क्या करें हर बार मिलकर खो गए तुम
      ख्वाब मिलने का अधूरा ही रहा है

प्रेम ऐसा होता है कि प्रियतम की याद कहीं न कहीं किसी बहाने आती ही है, इन यादों में कौन है जो कोई गीत नहीं गुनगुनाता होगा या कोई गज़ल नहीं दोहराता होगा, कवि ने भी इस भाव को बहुत ही मार्मिकता से शब्द दिया है।

   ज़ख्म जाग जाते हैं अब भी तेरी आहट पर
   होठ गुनगुनाते हैं अब भी तेरी आहट पर,
   आसमान हँसता है चाँद जगमगाता है
   तारे झिलमिलाते हैं अब भी तेरी आहट पर।

प्रेम में कुछ यादें ज़ख्म की तरह हो जाती हैं जो कभी जाती ही नहीं,   

हंसते रोते वक्त गुज़र जाता है मगर
  भरते-भरते ज़ख्म ज़माना लगता है

जब प्रेम में पीड़ा का अंत नहीं होता है तो धीरे-धीरे यही प्रेम आध्यात्मिक रूप लेने लगता है, यह  कविता संग्रह केवल प्रेम के संयोग, वियोग के भौतिक स्वरूप तक ही सीमित नहीं है बल्कि प्रेम के आध्यात्मिक स्वरूप को भी बहुत ही सुन्दरता से निखारा गया है, यथा - 'पंख बिना प्रेम' कविता में कवि ने जीवन की सार्थकता को दिखाया है, कैसे बिना किसी एक के यह जीवन कुछ भी नहीं रह जाता, वह एक इश्वर, प्रेमी ब्रम्ह कुछ भी हो सकता है जिसे हम चाहते हैं।
       
ये असंख्य शून्यताएँ देती हैं सिर्फ व्यर्थता
क्योंकि शून्य को अर्थ देने के लिए
शून्य से पहले ज़रूरत होती है किसी 'एक' की
  और मेरे जीवन में वह ‘एक’ नहीं है .
जब हम प्रेम को कोई कोई नाम देने या उसका कोई स्वरूप निर्धारित करने का प्रयास करते हैं तो वह किस प्रकार से प्रेम को सीमित कर देता है उसी भाव को एक कविता में कवि लिखते हैं

    लेकिन ,
   आकार तो खुद अंधकार होता है
   कैसे टिकती उसमें
   प्रेम की दुनिया ?

एक आदमी क्या होता है कुछ अनुभओं का समुच्चय और सारे अनुभव जब हमारे अन्दर ही आपस में एक दूसरे से टकराते हैं तो एक आतंरिक शोर होता है जो चलता ही रहता है लेकिन जब यह सब ख़त्म हो जाता है तो भावशून्यता की स्थिति उत्पन्न होती है। इस स्थिति का कवि ने बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है.
  
आदमी खोजने निकला था,
 सन्नाटा मिल गय

 मैं निश्चेष्ट सोच रहा हूँ कि मुझे इस सन्नाटे की क्या ज़रूरत ?

  अभी मैं साँस ले रहा हूँ
  इस सन्नाटे को नहीं चाहता
मगर दुविधा में हूँ कि इसे हटाऊँ कैसे?

 एक कविता है ''कीचड़'' उसमें कवि रिक्तता को शब्द देते हैं
 
   शून्य कुछ भी नहीं होता
   लेकिन सत्य है-शाश्वत सत्य
   मुझे  बोध होता है -
   यही है केवल यही
   मेरा अंतिम रूप

कवि बसंत चौधरी ‘सागर’ ने केवल प्रेम के भावों पर ही नहीं बल्कि देश में चल रही राजनीति पर भी गहरी समझ रखते हैं। देश की सियासत कहीं-न-कहीं इन लाइनों के आसपास मडराती रहती है
एक गज़ल में लिखते हैं-

    बहुत ज़्यादा यहाँ जो नारे लगते हैं
    वही इन्सान को इन्सान का दुश्मन बनाते हैं
    हमेशा उनको भी हमने तो फूलों से नवाज़ा है
    हमारी राह में जो बेवजह कांटे बिछाते हैं
 

असल में प्रेम मनुष्य को मनुष्य बनाता है, मनुष्य से यदि प्रेम ही ख़त्म कर दिया जाय तो मनुष्य नहीं रह जाता है वह पशु बन जाता है, यह प्रेम जिसके भी प्रति होगा वह उसी को सुन्दर देखना चाहेगा देश से प्रेम है तो वह देश को सुन्दर देखना चाहेगा, यह कविता संग्रह ‘चाहतों के साये में’ प्रेम के भावों का चित्रण करती है जो कि मनुष्यता की एक शर्त है। जब आधुनिक समय में प्रेम की जगह हमने फ़िल्मी संवादों को प्रमुखता देना शुरू किया तो प्रेम के सही मायने पता नहीं कहाँ खो से गए, यह किताब उन्हीं प्रेम के अनुभवों को संजोने का एक प्रयास है।   







Comments