बालिका सुधारगृह में तैयार की जातीं देवदासियां।


By - राजीव मित्तल



फ़ोटो - न्यूज़ 18 इंडिया

बहुत शरीफ शब्द का इस्तेमाल किया है यहां मैंने... देवदासी. मंटो ने तो उपासनागृहों तक को नहीं बख्शा और उन्हें रंडीखाना बताया था, जहां ईश्वर की बोली लगायी जाती है.

बालिका सुधारगृह को क्या नाम देते मंटो.. सोचिये....खैर जाने दीजिए.

यह 13 साल पुरानी रिपोर्ट है..कई ने पढ़ी भी होगी..लेकिन आज के लिए बेहद मौजूं है..फिर से पढ़ी जा सकती है आज के हालात को समझने के लिए...तो सुनिये..

देवघर के प्लेटफार्म पर भटक रही रूपा को जब रेलवे पुलिस ने पकड़ा था तब उसकी उमर आठ साल थी, और जब रिहा हुई तो वो पंद्रह की हो चुकी थी...आज रूपा 21 साल की होगी.

दो हजार पांच की बरसात में प्रभात खबर में चार लाइन की खबर...पहले पेज के लायक तो कतई नहीं.. और ऐसी खबर कि किसी टीवी चैनल को क्या पड़ी है कि वो जाने कि असम की रूपा, छोटी सी लड़की, सात साल तक जेल में इसलिए सड़ती रही क्योंकि उसके पास प्लेटफार्म टिकट नहीं था.

उस देश में, जहां बिना अपराध के ही लाखों व्यक्ति जेल की कोठरियों में सालों से सड़ रहे हों, वहां रूपा का अपराध तो किसी की भी नजर में खटकने वाला होता ही, सो मजिस्ट्रेट ने नियमावली देख नौ दिन की सजा सुना दी..लेकिन इस देश के निजाम और समाज की निहायत घिनौनी सोच के चलते उसे बालिका सुधारगृह नाम की  सडांध में काटनी पड़ गयीं 2555 रातें और झेलने पड़े 2555 दिन..याद रहे इनमें लीप इयर यानि फरवरी का उनतीसवां दिन शामिल नहीं...तो इस हिसाब से.. दो दिन और जोड़ लें बराये मेहरबानी.

सात साल बाद हाईकोर्ट के एक जज ने पता नहीं किस तुफैल में जब उस नारी निकेतन का दौरा किया, तब जाकर रूपा को छुटकारा मिला, नहीं तो पता नहीं न जाने कितने दिन और इस देश के कैदखाने में काट कर रूपा मर-खप चुकी होती.

चूंकि यह वाक़या ...सीवान वाले शहाबुद्दीन को कब होगी जेल ... नामक अरसे से चल रहे ‘धारावाहिक’ के आसपास का है इसलिए उसके सात साल या 2555 दिन-रात का हिसाब किसी ने देना -मुनासिब नहीं समझा.

लेकिन हां, रूपा की सात साला कैद की चुनिया सी खबर ने लगभग रोजाना लीड बन रहे शहाबुद्दीन प्रकरण को एक घटिया प्रहसन में ज़रूर बदल दिया था.. साथ ही किसी भी दिमाग वाले को शायद यह सोचने पर मजबूर भी कर दिया हो कि क्या हम एक आजाद देश के आज़द नागरिक हैं भी कि नहीं.

लेकिन हैं, इत्तेफाक से हम आज़ाद हैं...और इस आजादी में ऐसे प्रहसन होने ही होने हैं क्योंकि शहाबुद्दीन या ब्रजेश ठाकुर रूपा नहीं बन सकते..कभी भी..किसी कोने से नहीं.

आठ साल की बच्ची को सजा सुनाने में मजिस्ट्रेट को कितना समय लगा होगा? यही  कोई ढाई मिनट..और, सजा तामील होने में? स्टेशन से बालिका सुधार गृह  का जितना फासला जैसे भी कटा हो उतना.. यानी रूपा को सजा सुनाने से लेकर बालिका सुधार गृह तक पहुंचाने में पूरा एक दिन मान लीजिये.

और उस दौरान शहाबुद्दीन को गिरफ्तार करो का आदेश दिए कितने दिन या कितने माह या कितने साल गुजर गए चुके थे.. और आज ब्रजेश ठाकुर को कितने साल तक बच्चियों की योनि खरोंचने का मौका दिया गया.

तब रूप की रिहाई तक यही तय नहीं हो पाया था कि सांसद महोदय को गिरफ्तार कौन करे, और कैसे किया जाए..तब अदालत सीवान के डीएम को पुचकार कर समझा रही थी कि भइये, ढंग के कागजात तो लाओ गिरफ्तारी के.. प्रत्यक्ष तौर पर आतंक का जिले वाला दायरा सिकुड़ कर क्रिकेट के मैदान जितना रह गया जबकि परोक्ष में तो शहाबुद्दीन का आतंक शाश्वत है ही, हर उस जगह, जहां भारतीय मानव मौजूद है..जहां ब्रजेश ठाकुर मौजूद है.

राष्ट्र की धरोहर नहीं थी रूपा, इसलिए उसके 2555 दिन-रात का, उसके बच्ची से नवयुवती हो जाने का हिसाब-किताब कोई मूढ़ ही करेगा और वैसा मूढ़ इस आजाद देश में मिलना अब दुर्लभ है.















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