आरक्षण से डर नही लगता साहब, आरक्षण से बने डॉक्टर से लगता है।



फ़ोटो - DNA

कुछ दिनों से कुछ फोटोज, वीडियो सोशल मीडिया पर खूब घुमाया जा रहा है : लिखा है आरक्षण से डर नही लगता साहब, आरक्षण से बने डॉक्टर से लगता है। कुछ ने लिखा है आरक्षण कोटे से बने शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर की वजह से आज हमारा देश पीछे होता जा रहा है और इसी कारण काफी लोग भारत को छोड़ दूसरे देश जाने को विवश हैं। ऐसे कई और भी बातें आपको भी देखने सूनने को मिलती होगी। पता नही ऐसा लिखने, दिखाने वाले किस जाती और समाज से आते हैं और उनकी क्या कुंठा है।

मैं आरक्षण का हिमायती नही हूँ लेकिन जातिगत, सामाजिक भेदभाव का पुरजोर विरोध करता हूँ और इसलिए आरक्षण का समर्थन भी करता हूँ। आरक्षण का शुरू से एक ही मकसद रहा है सामाजिक तौर पर उन लोगों को मजबूत बनाना जिन्हें वर्षों से दबा कर रखा गया है, उन लोगों को आगे लेकर आना जिन्हें वर्षों से पिछड़ा बना कर रखा गया है। 

जब "वर्षों से" की बात होती है तो कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी नाराजगी जाहिर करते हुए बोलते, हम तो जाती-वाती नही मानते फिर क्यों हमसे आरक्षण के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है। आगे बढ़कर ये आरक्षण मुक्त भारत की भी बात करते दिखते।

इसमें कोई शक नही की हम बदल रहे हैं, और इसके लिए हमें समाज के एक हिस्से का बड़ा शुक्रिया भी करना चाहिए। लेकिन सच्चाई ये भी है कि जब नौकरी, नंबर्स से हट कर बात होती है तो ये भीड़ कम होती नजर आती और ये बदल गए लोग गायब हो रहे होते हैं।

हमें आज के समाज को देखते हुए खुद से कुछ प्रश्न करने चाहिए। क्या सच में हम बदल गए हैं:

क्यों आज भी गाओं में दलित वर्ग के लिए पूरे गांव से हटके रहने की जगह होती है?

क्यों आज भी उनके पास खेतीबाड़ी या कहें जीने के लिए पर्याप्त जगह, साधन नही है?

क्यों आज भी उनके घर आने पर औरों की तरह साथ नही बिठाया जाता है ?

क्यों हम आज भी उनके घर जाने को कतराते हैं ?

क्यों आज भी हम उनके घर से आया हुआ या फिर छुआ हुआ खाने से पहले हज़ार बार सोचते हैं ?

क्यों आज भी किसी के घोड़े पर बैठने या तथकथित बड़े जातियों वाले पोशाक पहनने पर मारा पीटा जाता है ?

क्यों वो औरों की तरह समाज में सर उठा कर नही निकल पाते हैं ?

सुबह उठकर देखिये, क्यों आज भी गंदी से गंदी नाली, गटर साफ करने वाले सभी एक ही वर्ग से आते हैं? यहां तक कि कई जगह ये आपका मैला भी ढोते दिख जाएंगे।

क्यों आज भी किसी आरक्षण पाकर पढ़ने गए विद्यार्थी, या नौकरी पा रहे नौजवान से सामाजिक व जातिगत भेदभाव किया जाता है ? 

और भी कई प्रश्न हैं जो इस बदले हुए बताने वाले समाज का एक घटिया चेहरा आज भी हमारे सामने रखते हैं। 

हाँ मैं मानता हूँ, कुछ जगह इनका गलत इस्तेमाल भी किया जाता है जिसे आज ठीक करने की जरूरत है। कुछ बदलाव की आवश्यकता है पर ये कहना कि आरक्षण हटा दिया जाए या फिर देश के भ्रष्ट व्यवस्था का ठीकरा इनके माथे फोड़ दिया जाए तो ये नाइंसाफी होगी।

आप बोल सकते हो कि क्रीमी लेयर की बात यहाँ की जाए, जिनके परिवार को एक बार इसका फायदा हो चुका उन्हें दुबारा न मिले। पर इन बातों के साथ हमें ये भी करना होगा कि हम उनका मज़ाक न उड़ाये उनके साथ अन्याय न करें, न होने दे। उनके साथ हर वक़्त कदम से कदम मिलाकर खड़े हो। क्योंकि नौकरी उनका आर्थिक उत्थान तो कर सकती पर उनके सामाजिक उत्थान के लिए हमें ही बदलना होगा।

अगर सच मायने में हम और आप बदल गए हैं तो गाली देने की जगह गले लगाइये बदलाव जरूर आएगा।

मुझे लगता है आज आरक्षण पर बोलने से पहले उसे समझने की आवश्यकता है।




लेखक एक स्वतंत्र विचारक हैं।









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