जेएनयू के पहले वाइस-चांसलर : जी. गोपालस्वामी पार्थसारथी।

By - शुभनीत कौशिक




जेएनयू के पहले वाइस-चांसलर : जी. पार्थसारथी (1912-1995)




पत्रकार, क्रिकेटर, राजनयिक, शिक्षाविद जी. पार्थसारथी वर्ष 1969 में जेएनयू के पहले कुलपति नियुक्त हुए। गोपालस्वामी पार्थसारथी, जिन्हें लोग जीपी के नाम से जानते थे, ने जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई विश्वविद्यालय की उस संकल्पना को पूरा करने का बीड़ा उठाया, जिसके अनुसार : “एक विश्वविद्यालय मानववाद, सहिष्णुता, तर्क, विचार के साहस और सत्य की ख़ोज के पक्ष में खड़ा होता है। यह उच्चतर उद्देश्यों को हासिल करने के लिए मानव-जाति के आगे बढ़ने के पक्ष में भी खड़ा होता है।” जीपी ने भारत में अकादमिक जगत के चोटी के विद्वानों को इस काम के लिए जुटाया। 

1969 से ही विभिन्न स्कूलों के लिए एकेडमिक एडवाइजरी कमेटी ने काम करना शुरू किया। जहाँ इतिहास जैसे पाठ्यक्रमों के लिए रोमिला थापर, सतीश चंद्र, एस. गोपाल और बिपन चंद्र सरीखे विद्वान थे। वहीं लाइफ साइंस की एडवाइजरी कमेटी में कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन, एमजीके मेनन, टीएस सदाशिवन सरीखे लोग थे। जब कमेटी की पहली बैठक दिसंबर 1969 में हुई, तो उसमें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक जॉर्ज बिडल भी मौजूद थे।   

जेएनयू की इमारतों के निर्माण का काम जीपी ने युवा वास्तुविद सीपी कुकरेजा को सौंपा, तब कुकरेजा महज 32 वर्ष के थे। वर्ष 1971 में छात्रसंघ के पहले चुनाव के दौरान छात्रों ने विवि की ईंट की इमारतों पर पोस्टर चस्पा कर दिये। इसकी जानकारी जब कुकरेजा को हुई, तो उन्होंने इसकी शिकायत जीपी से की। पर जीपी ने हँसते हुए उनसे कहा : “यह एक लोकतान्त्रिक देश के विवि का परिसर है। इन इमारतों और छात्रों के बीच संवाद होने दो। इन दीवारों को छात्रों को कैनवास बनने दो।” 

Photo - google 

एन गोपालस्वामी आयंगर के बेटे जीपी ने ऑक्सफोर्ड के वैडहम कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की और बाद में उन्होंने वकालत की पढ़ाई भी की। पत्रकारिता के उनके कैरियर की शुरुआत ‘टाइम्स ऑफ लंदन’ से हुई। 1936 में भारत लौटने पर जीपी ‘द हिन्दू’ से जुड़ गए। ए. रंगास्वामी आयंगर तब द हिन्दू के संपादक हुआ करते थे। वे लंदन में प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि भी रहे। जीपी ने नेहरू द्वारा मुख्यमंत्रियों को लिखे गए पत्रों ("लेटर्स टू चीफ़ मिनिस्टर्स", पाँच खंडों में) का भी सम्पादन किया। 

बतौर क्रिकेटर जीपी ने रणजी ट्रॉफी में मैच खेले और टेस्ट क्रिकेट भी। जीपी के राजनयिक कैरियर की शुरुआत 1954 में हुई। एक कुशल राजनयिक के रूप में जीपी कंबोडिया, वियतनाम, इंडोनेशिया, चीन और मंगोलिया में भारत के राजदूत रहे और पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त भी। 

जीपी ने कश्मीर के संदर्भ में इन्दिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला के बीच 1975 में हुए समझौते में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह समझौता जीपी और शेख अब्दुल्ला के प्रतिनिधि मिर्ज़ा अफ़जल बेग के बीच तीन साल तक चले संवाद का नतीजा था। 11 साल बाद जीपी ने मिजोरम के संदर्भ में यही भूमिका निभाई, जब वे राजीव गांधी और लालडेंगा के बीच समझौते के सूत्रधार बने। वर्ष 1980 में जीपी आईसीएसएसआर के चेयरमैन बने। इसी वर्ष वे मीडिया संगठनों के पुनर्गठन के लिए बनी एक चौदह सदस्यीय सलाहकार समिति के भी अध्यक्ष बने।









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