शिवम के नाना अटलबिहारी वाजपेयी।

By - राजीव मित्तल


फ़ोटो - गूगल 


1995 शुरू हो चुका था..अपन कानपुर स्वतंत्रभारत को आबाद किये हुए थे...मुख्य सम्पादक घनश्याम पंकज ने हमें कन्फर्म न कर कभी भी नौकरी से निकालने की तलवार म्यान से निकाल ली थी...अपन के स्थानीय संपादक प्रमोद जोशी ने उनसे पूछा भी कि लल्ला ने ऐसा क्या कर दिया तो मांद से उनके गुर्राने की आवाज़ें आने लगीं..

अपन ने दस साल पहले के नवभारत टाइम्स और आज के पंकज के गुर्राने का मिलान किया तो कोसना शुरू कर दिया खुद ही को ..कि बेट्टा राजीव, पंकज जी की होने वाली बीवी को देख तुम जो ग़ज़लें गाते थे और वो फरमाइश पे फरमाइश करती जाती..और अंदर केबिन में बैठे पंकज जी कबूतर की तरह लोट रहे होते..तो आज भुगतो..

भुगतने की आदत अपनी कभी रही नहीं..एक दिन गोमती एक्सप्रेस ने जैसे ही कानपुर स्टेशन पर कदम रखा हम इस्तक़बाल करने पहुंच गए..साथ में था स्वतंत्र भारत का एक और नागरिक सुंदर, जिसका रिज़र्वेशन था और अपने पास केवल टिकट..बहरहाल हम दोनों आधे के आधे में सट लिए..

यह बात है चार मार्च 1995 की..आप लोगों के आशीर्वाद से दस मार्च को हम शहीद एक्सप्रेस से जस्ट चार गुना की तनख्वाह वाला BITV का लेटर लिए लखनऊ लौट रहे थे..जब बीवी को लग गया कि पति बिलकुल ही गया गुजरा नहीं है तो दोनों बेटों की शिक्षा को लेकर मनन शुरू हुआ..

दोनों CMS में कक्षा छह और कक्षा तीन में तब से पढ़ रहे थे जब जगदीश गांधी उन्हें गोदी मेँ उठाने बाहर आते और अंदर खुद ही फार्म भर कर अपन से दस्तख़त करा लेते..

लेकिन दिल्ली में न CMS था न जगदीश गांधी..सोच विचार के बाद उन दोनों को सेंट्रल स्कूल में डालने का फैसला हुआ क्योंकि पिछले 15 साल साथ में गुजारने के बाद श्रीमती मित्तल को लग गया था कि उनका विवाह किसी फ़क़ीर से हुआ है, जो अब तक पांच शहर और पांच नौकरियां बदल चुका है..

उन दिनों सेंट्रल स्कूल में दाखिला सांसद की सिफारिश से हो जाता था.. तब अटल जी लखनऊ से सांसद थे..पत्नी बोली कि अटल जी उसके पिता के दोस्त हैं तुम साथ चलो लेटर लिखवाने को..पता किया तो अटल जी को शहर में पाया..

लेकिन अपनी दुम उस दिन भी सीधी नहीं थी..साफ मना कर दिया साथ चलने को और पायनियर ऑफिस में पंकज जी को इस्तीफा देने निकल लिया..भन्नाई पत्नी ने बर्तन मांजने वाली ग्वालन और छोटे बेटे शिवम को रिक्शे पे लादा और पहुंच गई स्टेट गेस्ट हाउस, जहां अटल जी किसी मीटिंग में थे..

कुछ देर बाद मीटिंग खत्म हुई, अटल जी बाहर आये तो पत्नी ने अपना परिचय दिया..अटल जी ने फौरन शिवम को गोद में बैठा कर पैड पर लेटर लिखा.. और एक लेटर शिवम के नाम लिखा कि बेटा मैं तुम्हारा नाना हूँ..साथ ही आशीर्वचन भी..गर्व से लदी फंदी पत्नी ने घर आकर  दोनों लेटर दिखाए इस उलाहना के साथ कि तुम क्या जानो मेरे बाप को...

दिल्ली में एक साल बाद ही पत्नी फिर पहुंच गई अटल जी से मिलने..कार में बैठ चुके थे, देखा तो उतरे, बात सुनी और जब चलने लगे तो पूछ बैठे... बेटी, तुम्हारे पति क्या करते हैं..
जी पत्रकार हैं...

अरे वाह, साथ ले कर आओ दामाद जी को..

पत्नी पीछे पड़ी रही कि अब तो प्रधानमंत्री हो गए हैं अटल जी, चलो मिल आएं..लेकिन दुम जस की तस टेढ़ी थी..तो किस खुशी में मिलने जाता.. और हां, अटल जी का लिखा वो लेटर आज भी कहीं रखा है, जिसे यहां चैंपने का अपना कोई इरादा नहीं..






नोट...

इस कथा का अगला अंश जल्द ही, जिसे पढ़ कर आप सब मिल कर लेखक को 21 तोपों की सलामी देंगे लेकिन लेखक 28 से नीचे तैयार नहीं होगा।







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