द ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी।


फ़ोटो - जनसत्ता

चाँद तन्हा है आसमां तन्हा
द ट्रेजडी क्वीन 

"मीना कुमारी" अगर अदाकारी शब्द ईजाद हुआ होगा शायद इसी नाम के लिए। एक दशक गवाह होगा जिसने मीना कुमारी को स्पर्श किया होगा तो एक दशक गवाह होगा जिसने उन्हें परदे पर अदाकारी करते हुए देखा है चाहे वो  हों या फिर लेदर फेस से शुरुआत करने वाली बेबी मीना।  

ऐसे और कई नाम थें जो मीना कुमारी ने कमाए थें अपनी अदाकारी के दम पे। चाहे वो "फीमेल गुरु दत्त ऑफ़ हिंदी फ़िल्म" या फिर "सिंडरेला ऑफ़ इंडियन फिल्म"।

इस नाम की भी तो एक कहानी है। एक गरीब पारसी परिवार में जन्मी महज़बीन का फिल्मों में आना उनकी चाहत नहीं बल्कि ज़रूरत थी। अपने परिवार की आर्थिक मदद के लिए महज़बीन 1939 में आयी फिल्म लेदर फेस के बाद बेबी मीना बनी और यहीं से जन्म हुआ मीना कुमारी का।

कहा जाता है कि कोई शख़्स हर कला में पारंगत नहीं हो सकता। इस बात को झुठला दिया था 20वीं सदी की सबसे बड़ी अदाकारा ने। चाहे वो मिस मैरी जैसा कोई कॉमेडी किरदार हो चाहे विजय भट्ट की बैजू बावरा। मीना कुमारी ने हर फिल्म को अपनी अदाकारी से जीवंत कर दिया और पाकीज़ा में किये उनके अभिनय को शायद ही कोई भूल सकता है। मीना कुमारी एक ऐसी अदाकारा थीं जिनका नाम ही काफ़ी था किसी फिल्म के बिकने और हिट होने के लिए। 

न हाथ थाम सकें न पकड़ सके दामन
करीब  से  उठकर  चला  गया  कोई 

शायद ये लाइन कमल साहब के लिए लिखी गयी हो। आख़िर सबसे करीब कोई शख़्स मीना कुमारी के था तो वो कमल अमरोहवी ही थें। जिनसे मीना कुमारी का निकाह भी हुआ और कुछ वक़्त बाद तलाक़।

बेइंतेहा ख़ूबसूरत मीना कुमारी की शादीशुदा ज़िन्दगी इतनी जल्दी और ऐसे ख़त्म हो जायेगी शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा। इस हादसे ने मीना कुमारी को पूरी तरह से तोड़ के रख दिया। मीना कुमारी ने ग़ज़लें भी लिखीं। जिनको उनके इंतक़ाल के बाद गुलज़ार साहब ने प्रकाशित कराया।

शराब और अकेलेपन ने भारत से उसका नायब हीरा छीन लिया। 1972 में महज़ 38 वर्ष की उम्र में ही मीना कुमारी ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जायेंगे ये जहाँ तन्हा 
चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा
- मीना कुमारी 






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