मुझे मीडिया के स्वतंत्र ना होने का दुख है, पूण्य प्रसून वाजपेयी के साथ हुए धोखे पर कोई आश्चर्य नहीं।


By - राजेश यादव


फ़ोटो - mohd.muslim 


जी हाँ, इन्होंने भाजपा के साथ जो किया था और अब भाजपा ने जो किया है उसे बस पलटवार ही कहा जा सकता है।

ये वही साहब हैं जिन्होंने संघ के कहने पर मुज़फ्फर नगर दंगे को भड़काने में एहम भूमिका निभाई थी। दंगो के वक़्त साहब देशभक्त जी न्यूज चैनल में थे और एजेंडे के तहत आजम खान की फ़र्ज़ी विडियो को खूब रगड़-रगड़ कर चलाया था। बाद में सपा सरकार ने कमेटी बनाकर जाँच की तो मामला फर्ज़ी निकला, नतीजन कई लोगों के खिलाफ एफ आई आर करवाई गई थी।

इन्होंने सवर्णों को भजपा के खेमे में एकजुटता करने के लिए 86 एसडीएम में 56 यादव होने जैसी झूठी खबर चला कर पूरे यादव समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया था। इसका सीधा फायदा चुनाव में भाजपा को होता हुआ दिखाई भी दिया।

प्रसून साहब का आज तक वाला वो एपिसोड तो देखा ही होगा आप ने, जिसमें वो अपने  दो और साथी पत्रकारों के साथ मिलकर फारूक अब्दुल्ला से उनके भारतीय होने का सुबूत मांग रहे थे। जो लोग राह चलते हर मुसलमानो को शक की नज़र से देखते है दरअसल उन्हें ऐसे ही सवालों से प्रेरणा मिलती है की जब एक पत्रकार मुसलमान से नैशनल टीवी पर उसकी देशभक्ति पर सवाल कर सकता है तो वो क्यूँ नहीं ?

साहब ने पहले तो सभी के साथ मिलकर ये खेल खेला, फिर भीड़ का हिस्सा लगने पर अपनी सहूलियत के हिसाब से अलग राह चुन ली। साहब ऐसा थोड़े चलता है, जब मर्ज़ी इस पार्टी के साथ हो... गए जब मर्ज़ी दूसरी पार्टी के साथ और कुछ नहीं तो अचानक से जनउपयोगी पत्रकारिता की बात करने लगे। यहाँ युद्ध चल रहा है सबका पक्ष निर्धारित है पाला बदलने वाला किसी के भरोसे लायक नहीं होता।

एक बार फिर आप से बोल रहा हूँ, मुझे मीडिया के स्वतंत्र ना होने का बहुत दुख है पर स्वतंत्र ना होने का रास्ता फ्रंट रो के पत्रकारों ने अपनी मर्ज़ी से चुना है।





लेखक स्वतंत्र विचारक हैं। 










Comments