हमनवा : रुहानी जुड़ाव का लेखा जोखा।





किताब -'हमनवा'

लेखक - राजीव मित्तल
            अनुपम वर्मा

समीक्षा - अश्विनी सोनू

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                              समीक्षा

फेसबुक की आभासी दुनिया में जन्मे, बचपन की तैश भरी कमज़हीन कच्ची सङकों पर दौङते लेकिन सच्चे एहसास की कशिश के वज़ूद पर जवां हुए अफ़साने का नाम 'हमनवा' है.

सोशल मीडिया के इस एरा में इनबाक्स की गुफ़्तगू अक्सर बेहद औपचारिक और प्रेम की बनावटी, स्वार्थी पैरहन में लिपटी मिलती है.

किताब 'हमनवा' ने इन सारे ख़्यालों को न सिर्फ़ तोङा है बल्कि ये एतक़ाद भी दिया है कि आभासी दुनिया में पनपे रिश्ते किस कदर ईमानदारी की नींव पर खङे होकर वास्तविक और ठोस बन जाते हैं जिनका रूहानी-राब्ता उन्हें अपनी निजी ज़िन्दगियों की ग़िरहें खोलने को मजबूर करता है..ऐसी गिरहें जिनमें दर्द की किरचें हैं, ख़ुशियों के संगमरमर हैं, ज़िन्दगी के सबक हैं और तर्क की पैनी निगाहों से तराशे ख़यालात् हैं.

दरअसल 'हमनवा' कोई प्रेम-कहानी भी नहीं है जिसमें दुनियावी उम्मीदें हों..हासिलात् को खोने का डर हो या ज़्यादा पा लेने की चाह में पकती लज़ीज़ ख़्वाहिशें हों..ये एक नैसर्गिक अपनापन है, एक बन्धन है जो उनके एहसासों की गाँठ से कायम है..एक मुक्ति है जिसकी परवाज़ प्रेम की ऊँचाइयों को छूती है.

राज..अनु से उम्र में तीस पायदान ऊपर...लेखन का आक्रामक रवैया..मुद्दों पर बारीक-ज़हीन पकङ ..बातों में इंक़लाबी जज़्बात और मज़लूमों के हुक़ूक़ का हिमायती..

लेखन का वैसा ही आक्रामक अंदाज रखती अनु..लहजे में बेहद मासूम और मिज़ाज़ी है..  स्त्रियों की हाल की समस्याएं..उनके हक़ उसके लेखन के विषय हैं.

राज और अनु के बीच बातचीत के सिलसिले उनकी ज़िन्दगी के अनगिनत लम्हों को बङी संजीदगी से उकेरते हैं.. कभी वो बचपन की गलियों में बन्द सोंधी मिट्टी की ख़ुशबू में खो जाते हैं तो कभी उसी बचपन की ठंडी छांव में रुककर साँस लेते हैं.

कालेज की यादें कितनी अमीरी का नशा भर देती हैं हममें.. जी में आता है वहीं ठहरकर बेइंतेहाँ वक़्त खर्च करें..

कालेज के उन दिनों को अनु ने बङी गहनता से वैचारिकी का जामा पहनाया है..अपने दोस्तों का जिक्र उसने उनकी निजी ज़िन्दगियों के कई पहलुओं को बारीकी से टटोलते हुए किया है...अनु की एक दोस्त जो सबके सामने तो चरित्रवान् होने के कसीदे पढती है लेकिन असल में अपनी सुविधावी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपना जिस्म बेचती है..आख़िरकार बदनामी के चलते मौत चुन लेती है..अनु ने उसे सही ठहराया है..आख़िर दुनिया की हर शै बिकती ही तो है..ज़रूरतें ही हैं जो बेची और खरीदी जाती हैं..फिर एक लङकी अपना जिस्म बेचती है तो उस पर इतने सवाल क्यों ? जिस्म खरीदने वाले पुरुष निष्पाप क्यों है?...क्योंकि ये समाज आज भी पुरुषों का है जहाँ औरतों के हक़ सिर्फ़ घरों की चौखटों में कैद हैं..

राज लङके और लङकी में उसकी जिस्मानी बनावट के अलावा उनमें फ़र्क करना नहीं जानता है...अनु ने लिखा है.." मैं राज से बात करते वक़्त मर्दों की एक और नस्ल से वाक़िफ़ हो रही थी..ऐसे मर्द से..जो खरे होते हैं....जिन्हें हर वक़्त औरत के इंसान बने रहने का एहसास रहता है.." ..राज की ये ख़ासियत अनु को उसके और करीब ले जाती हैं... कि काश ! दुनिया के सारे लङके राज की-सी ज़ेहनियत के हों तो सारी लङकियाँ गली, चौराहे और नुक्कङ पर बग़ैर किसी डर के हवा में स्वच्छंद उङती फिरें.

राज मंटो की माशूका है और मंटो उसका महबूब..उसका ख़ुदा..राज और अनु मंटो की दुनिया में संग संग घूमते हैं.

अनु मंटो की विवादित कहानियों 'बू' और 'ठंडा गोश्त' की गलाज़त में उलझ जाती है..बिलआख़िर राज उसे बहस की फिनाइल से साफ करता है..जो अनु की नजरों में राज को और ज़्यादा सहज बनाती है.

एक-दूसरे के दर्द में हिस्सेदारी, आंसुओं का अपनापन रिश्तों की दीवारें थामकर रखते हैं.. राज के बेटे शिवम की ख़ुदकुशी की ख़बर सुनकर अनु फफक उठती है..टूट-सी जाती है लेकिन जल्दी ही उठकर राज को साहस की हज़ार बाहें देती है..जो उसे तन्हाई में थामते हैं.. उसके आंसुओं को सहलाते हैं और दुनिया में फिर उसी जज़्बे के साथ वापस आने की जमीन तामीर करते हैं.

वो लेखन ही क्या जो समाज की दकियानूसी सोच से इज़ाज़त पाने का मोहताज हो..अनु ने बनी बनायी हदें तोङी हैं बेबाकी से आज की स्त्रियों को अपने हक़ के लिए लङने की जुबान दी है..बेश्तर हर लङकी शादी के बाद समझौते करती है..इस समझौते में या तो वो जीते जी मरती है या ज़िन्दगी से आज़िज़ आकर मौत चुन लेती है.

यक़ीनन कौमार्य-भंग जैसे सवालों से पुरुष आज भी इत्तेफ़ाक नहीं रखते..ऐसे घटिया सवाल सिर्फ़ स्त्रियों की चरित्रहीनता साबित करने के लिए गढे गये हैं..

अनु ने अपनी जाती ज़िन्दगी में आये तमाम उतार चढाव बङी ख़ूबसूरती से जिये हैं.. अपनी तमाम ख़ुशियां दर्द नाक़ामयाबी आँखों में जज़्ब कर वो हमेशा ही ज़िन्दगी को हँसते होठों से चूम लेना चाहती है..

राज अनु से मिला नहीं..ना ही अनु राज से मिलने की ख़्वाहिश करती हैं..एक-दूसरे को सामने पाकर शायद आभासी दुनिया में जन्मे उनके रिश्ते का ख़ूबसूरत तिलिस्म टूट जाय..उनके एहसास फीके पङ जायं..या वो हक़परस्त हो उठें.

उनका कभी ना मिलना उनके भीतर एक-दूसरे के लिए बसे उंस को तमाम उम्र यूँ ही कायम रखेगा.

किताब 'हमनवा' साहित्य की किसी विधा-विशेष से बहुत दूर आभासी दुनिया का एक अनूठा प्रयोग है..ये साहित्य की एक नयी विधा है जिसे 'आभासी दुनिया की बतकही' कहते हैं.

जब-जब इंसानी रिश्ते अपने कायदे भूलेंगे..प्रेम खोने-पाने की दुनियावी चाहतों में सिमट जायेगा..संबन्ध महज औपचारिकताओं की अदायगी से बिखरते नज़र आयेंगे..'हमनवा' हज़ार आँखें बनकर पग-पग पर उन्हें रौशनी देगा.


राजीव मित्तल




अनुपम वर्मा 









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