एक हूल की जरूरत - विश्व आदिवासी दिवस।


फ़ोटो - गूगल

हूल का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. लेकिन ब्रिटिश भारत में हुई आदिवासी क्रांतियों के बाद आज के दौर में संभवतः आदिवासियों द्वारा ऐसी कोई क्रांति देखने को नहीं मिलती है जिसमें वो अपने अधिकारों के लिए सत्ता से लोहा लेते दिखें. जबकि आज के दौर में उनकी अस्मिता और संस्कृति को खत्म करने की कोशिशें ब्रिटिश भारत की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ गयी हैं.

दरअसल , दुनियाभर में जहां भी लोकतंत्र पर अर्थतंत्र हावी हुआ है वहां यही स्थिति देखने को मिलती है. बीती दो शताब्दियों में इस अर्थतंत्र नें नगरों और महानगरों के रूप में अपनी एक लुभावनी भौतिक संरचना और संस्कृति विकसित कर ली है और इस क्रम में प्राकृतिक अवस्था और उससे जुड़ी संस्कृति को लगातार हीन दिखाया है. 

इसने हमारी सोच इस तरह की बना दी है कि हमें विकास का मतलब धरती के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और वृद्धि नहीं बल्कि उनका अंधाधुंध दोहन और प्रदूषित , अमानवीय तथा कृत्रिम नगरों -महानगरों  की स्थापना और प्रसार समझ आता है. इसमें लोकतंत्र की  भूमिका बदलाव की बजाय महज़ इसे वैधता प्रदान करने वाले टूल की है. हम लगातार इस भौतिक संरचना में जीते हुए इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि अब प्राकृतिक अवस्था हमें पिछड़ी और अविकसित अवस्था लगती है. हमें औद्योगिक विस्तार के समक्ष नदियों , जंगलों , पहाड़ो , नमभूमियों , पशु-पक्षियों के मूल आवासों आदि की सुरक्षा विकास विरोधी बात लगती है. 

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आदिवासी हज़ारों साल से हमारे जीवनदायी प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा रहे हैं. उन्होंने सहजीवी की तरह इस तंत्र पर निर्भरता के साथ उसका संरक्षण भी किया है. आज जब कथित विकास के नाम पर हम इसमें हस्तक्षेप की कोशिश करते हैं तो इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव इन आदिवासियों पर पड़ता है. यह हस्तक्षेप न केवल उनके आवास में हस्तक्षेप होता है बल्कि उनकी अस्मिता और संस्कृति में भी हस्तक्षेप होता है. इसका विरोध आदिवासियों की स्थानीयता और हमारी विकास संबंधी अवधारणा के चलते विकास का विरोध लगता है. हमें उनके विरोध से कोई जुड़ाव महसूस नहीं होता है. न ही उनके पक्ष में कोई संवेदना महसूस होती है. इसीलिए आदिवासियों का मारा जाना इस देश में एक बेहद सामान्य घटना है. ठीक उसी तरह जैसे सड़क चौड़ी होने पर किनारे खड़े पेड़ो का काटा जाना.

कम शब्दों में कहूँ तो लाखों साल पुरानी प्रकृति और उससे जुड़ी मानवीय अस्मिता पर अब दो सौ सालों में विकसित हुई उदासीनता भारी नज़र आती है. 

मैं प्रकृति से जुड़े आदिम और पुरातन अस्मिता के वाहक आदिवासियों में इस उदासीनता के विरुद्ध हूल देखता हूँ. शायद ऐसा कभी हो कि  विध्वंश के कगार पर पहुंचने से पहले हम भी अपने भीतर इस अस्मिता को जागृत कर सकें. हमारे अस्तित्व के लिए यह जरूरी भी है.







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