भोजपुरी के गौरव : महेंद्र मिसिर



महेंद्र मिसिर (1888-1946) उन विरले रचनाकारों में से हैं, जिन्होंने लोक के अनुभवों को अपने शब्दों में पिरोकर उन्हें अमर कर दिया। उनकी रचनाओं ने न सिर्फ भोजपुरी साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि ये रचनाएँ भोजपुरी की अनमोल विरासत हैं। मार्च 1888 में सारण जिले के काहीं-मिश्रवलिया गाँव में जन्मे महेंद्र मिसिर ने स्कूली शिक्षा तो नहीं पाई। पर अपने स्वाध्याय और लोकजीवन के प्रति अपनी संवेदना और सहृदयता से लोकधुनों, छंदों व रागिनियों में ऐसी सिद्धहस्तता हासिल की कि उन्हें लोकधुन ‘पूरबी’ का सम्राट माना जाने लगा।

अकारण नहीं कि उनके निधन के सात दशकों बाद भी उनके गीत आज भी लोगों के जुबान पर हैं। भगवती प्रसाद द्वारा लिखित यह महेंद्र मिसिर की यह जीवनी उनके जीवन और रचनाकर्म के विविध पक्षों से हमारा साक्षात्कार कराती है। 

महेंद्र मिसिर का जीवन सीधे-सपाट आदमी का जीवन नहीं है, वह जीवन-संग्राम के झंझावातों से जूझने वाले एक जुझारू आदमी का जीवन है। इसमें उतार-चढ़ाव हैं, उथल-पुथल है और समाज के पूर्वग्रहों से लड़ने का माद्दा भी। 

उल्लेखनीय है कि भोजपुरी के इस अप्रतिम कवि के रोमांचक जीवन को आधार बनाकर भोजपुरी में तीन उपन्यास लिखे गए हैं। ये हैं : ‘फुलसुंघी’, ‘महेंद्र मिसिर’ और ‘पूर्वी के धाह’, जिनके लेखक हैं क्रमशः आचार्य पांडेय कपिल, रामनाथ पांडेय और जौहर शफियाबादी। अनामिका ने अपने उपन्यास ‘दस द्वारे का पिंजरा’ में महेंद्र मिसिर और ढेलाबाई के संबंधों का ज़िक्र किया है। 

महेंद्र मिसिर ने रामचरित मानस को आधार बनाकर भोजपुरी में ‘अपूर्व रामायण’ (सात कांड) की रचना की। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य रचनाएँ हैं : महेंद्र मंजरी, महेंद्र विनोद, महेंद्र दिवाकर, महेंद्र चंद्रिका, महेंद्र रत्नावली, महेंद्र कुसुमावली, आदि।  

औपनिवेशिक भारत की आर्थिक दुर्दशा को अपनी कविता में महेंद्र मिसिर ने बेबाकी से अभिव्यक्त किया: 

हमरा नीको ना लागे राम / गोरन के करनी
रुपया ले गइले, पइसा ले गइले / ले गइले सारा गिन्नी, 
ओकरा बदले में देके गइले / ढल्ली के दुअन्नी.... 

महेंद्र मिसिर के जिन गीतों को आज भी याद किया जाता है, उनके कुछ उदाहरण हैं : 

आधी-आधी रतिया के पिहिके पपीहरा / से बैरिनिया भइली ना, 
मोरी अँखिया के रे नींदिया / से बैरिनिया भइली ना... 

या फिर यह प्रसिद्ध गीत : 
अंगुरी में डंसले बिया नागिनीया रे!
ए ननदी, दियरा जरा दे! 

महेंद्र मिसिर की निर्गुण रचनाएँ भी अत्यंत प्रसिद्ध हुईं। अपनी एक ऐसी ही रचना में उन्होंने अनहद नाद और सुरति का वर्णन किया है : 

प्रेम खजाना सेई सिरहाना / भगती के सेजिया डंसइबो राम 
गगन गुफा में अनहद बाजा / ताहि बिचे सुरती रमईबो राम
कहत महेंदर ओही घरे जाना / जहवाँ से बहुरि नाहीं अइबो राम 

लोकजीवन में रमे हुए महेंद्र मिसिर के गीतों ऋतुओं की इंद्रधनुषी छटा भी देखने को मिलती है। मसलन, बारहमासा की परंपरा में रचित उनका यह गीत देखिये: 

गरजत असाढ़ मास पागल घनघोर चहुं 
सावन मनभावन मोरे जीव को डरावत है 
भादों की अन्हारी रैन, बिजुरी चमक रही  
पपीहा की बैन सुनि काम तरसावत है। 

साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित इस किताब की कीमत है 50 रुपये। जरूर पढ़ें!






Comments