राजस्थान के रौंसी गांव से पथिक के कलम से उठी चिंगारी बॉलीवुड की 'पटाखा' साबित होगी





पटाखा फिल्म चरण सिंह पथिक की कहानी दो बहनें पर आधारित है. मैंने चरण सिंह की कहानियों पर तीन साल पहले एक लेख लिखा था. उस लेख में दो बहनें पर भी लिखा था. चरण सिंह जी के भाई की मौत चंद रोज पहले हो गई. वे इस समय गहरे दुख में हैं. जीवन व्यापार रुकता नहीं है. सो, फिल्म की स्क्रीनिंग आज से सिनेमाघरों में हो रही है.लेख पढ़ें और मेरे मित्र चरण सिंह की कहानी पर आधारित फिल्म देखने जरूर जाएं... 

दो बहनें कहानी को पढ़ते हुए मालूम पड़ता है कि यह भारत-पाकिस्तान की कहानी है. इस कहानी में दो सगी बहने एक ही घर में ब्याह दी जाती हैं. वे शादी से पहले अपने बालपन में जैसे छोट-छोटी बातों को लेकर लड़ती थीं, वैसे ही अब भी मोर्चा खुला रखा है. दोनों लड़ाई के दौरान एक-दूसरे को असल बाप की है जैसे विशेषणों तक से ललकारती रहती. वे अपने व्यस्त दिनचर्या में से लड़ने का समय ज़रूर निकाल लेतीं. ‘दिन निकलने पर वे पशुओं के लिए खेतों से हरा चारा लाती. फिर गोबर इकट्ठा कर कंडे थापतीं. रोटियां थेपती और लड़ने के लिए रोज वक़्त भी निकाल लेतीं.’ बस साल के एक महीने फागुन में वे नहीं लड़ती थी. दोनों बहनें मोहल्ले की औरतों की अगवाई करतीं. इस समय वे गीत गा-गाकर अपनी लड़ने की हुलहुली के कसर को पूरा कर लेती. कहानी तो कुल मिलकर यही है पर इस कहानी में एक दिलचस्प मोड़ तब आता है जब छुटकी अपने पति के साथ आगरा घूमने चली जाती है. गांव में बड़की की तबियत बहुत ख़राब हो जाती है. डॉक्टर और वैद्य किसी काम नहीं आते. एक दिन बड़की अपनी बेटी से कहकर छुटकी को फ़ोन लगवाया. छुटकी चालू हो जाती है-‘नकटी! मै सू बोलवे की जुर्रत का है. लाल किला ताजमहल देखा. तेरे हड्डा, दारी! ...मुझे अकेले छोड़कर खसम के संग मौज करने गई थी. भुगतेगी-भुगत...तू तो बिल्ली है दारी, पिछले जनम की... दूर से शेरनी बनती है छछूंदर! असल बाप की बेटी है तो गांव में आकर लड़... बड़की ने फिर ललकारा. ‘बनती है फ़ौज की लुगाई.’ दो दिन बाद आ रही हूँ. दारी...! तेरी चुटिया पकड़ फिरा-फिराकर के नीं फेंका तो असल बाप की बेटी मत कहियो. छुटकी ने फ़ोन पर ताल ठोंकी. बड़की ने बात ख़त्म होते ही मोबाइल को स्विच ऑफ किया और खूब सारी रोटियां डकारी. थाली भरकर दूध और रेवड़ियाँ गटक ली और सोने चली गयी. दूसरे दिन सुबह उठकर दवा की पोटली उठाकर घूरे में फ़ेंक आई और बोली-‘कल रात जैसी नींद पिछले बारह-पंद्रह दिनों में कभी नहीं आई.’

ग्रामीण जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्तों का 'पथिक'

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आज़ादी के लेकर अबतक लगभग सात दशकों में कई चरणों में देश बदला है. नगर, महानगर बदले हैं. गांव और कस्बे भी उन बदलावों का साक्षी रहे हैं या यूँ कहें कि उसने सबसे ज्यादा धक्के या धोखे खाए हैं. वरिष्ठ कथाकार व हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ठीक ही कहते थे- ‘गांव, शहरों के धक्कों से ही बदलते हैं.’ बीते दो दशकों में नगर और महानगर बहुत तेजी से बदले हैं और जाहिर है कि इसका असर गांव पर भी साफ़-साफ़ दिखने लगा है. अब गांव में भी उपभोक्तावादी संस्कृति अपना पांव निचले स्तर तक पसार चुकी है. राजस्थान के वरिष्ठ और सुघड़ कथाकार चरण सिंह पथिक की कहानियों में बदलते भारत की तस्वीर बहुत अच्छी तरह से उभर कर सामने आई है। 



ग्रामीण जीवन में कितने भी बदलाव आये हों, लेकिन गाँवों के रास्ते शहरों जैसे सीधे-सपाट और चमचमाते हुए कभी नहीं रहे। गाँवों के जातीय संघर्ष, सामाजिक दबाव, रोटी के लिए हाड-तोड़ मेहनत और जीने की जिजीविषा के बीच जटिल, बीहड़ और ऊबड़ खाबड़ रास्ते आज भी गाँव की विरासत हैं।  इन रास्तों पर चलते हुए लोगों की दुःख- तकलीफों और और जीवन संघर्षों को चरण सिंह पथिक ने गहरी संवेदना के साथ पकड़ा है और खेतों में खिलते- मुरझाते पौधों की तरह उन्हें असली रचनात्मक रंगों के साथ  पेश किया है . यही उनकी ताकत है।  

गाँव के लोगों को अब बाल धोने के लिए मिट्टी की जगह शैम्पू चाहिए. लोन पर मोटरसाइकिल चाहिए. टीवी और फ्रिज चाहिए. शीतल पेय शरबत, निम्बू पानी की जगह कोक और लिम्का चाहिए और मोबाइल फोन तो चाहिए ही। इन वजहों से ग्रामीण आबादी पर लोन का बोझ खूब चढ़ा है. बैंकों के लोन न चुका पाने की हालत में वे आत्महत्या करने तक को मजबूर हैं. चरण सिंह पथिक की एक कहानी का एक पात्र अपनी भैंस बेचकर मोटर-साइकिल उठा लाता है. हजारों की संख्या में किसानों के आत्महत्या कर लेने के बाद भी तमाम राज्य और केंद्र सरकारों के स्वास्थ्य पर इसका कोई असर होता नहीं दीखता है. दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था मुनाफे की लूट पर आधारित व्यवस्था होती है और शोषण-दोहन के स्थूल और सूक्ष्म तरीके ढूंढती लेती है. वह अपने लूट के जाल में इस कदर मानव सभ्यता को उलझाती है कि मनुष्य धीरे-धीरे आत्मकेंद्रित और वस्तुवादी हो जाता है. अंततः मनुष्यता संकट में पड़ जाती है. चरण सिंह पथिक अपनी कहानियों में पूंजीवादी और सामंती व्यवस्था के संकट को खूबसूरती से अपनी कहानियों में दर्ज करा पाते हैं. दरअसल वे ग्रामीण परिवेश पर लिखने वाले इस समय के बड़े कथाकार हैं. चरण सिंह अपनी कहानियों के बारे कभी ढोल नहीं पीटते. उन्होंने अपने लिए कोई प्रचारक संघ जैसी कोई दृश्य-अदृश्य बात को अस्तित्व में आने नहीं दिया है. वे एक सच्चे कथाकार की तरह मौन रहकर बस रचते जाने को अपना काम मानते हैं. वे उस पेड़ के पत्तों की तरह हैं जो अपने नीचे खड़े होनेवालों को छाया, हवा सबकुछ देती है और अपनी नियति जमीन पर गिरने के बाद उसे उर्वरता प्रदान करना अपना काम मानते हैं.



 चरण सिंह की कहानी बक्खड़ जो मेरी सर्वाधिक प्रिय कहानी है, से बात शुरू करना ठीक होगा. चरण सिंह पथिक की बक्खड़ कहानी कोई कहानी भर नहीं है. यह कहानी समाज की विचित्रताओं को कई कोण से देखने का प्रयास करती ही है. इस कहानी की शुरुआत ही किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के रौंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है. ‘हरामजादी कुतिया तेरे बाप का घर है जो चली आई? और फिर तड़ाक-तड़ाक लात-घूंसे. मैं एक कोने में कबूतर-सा दुबका हुआ माँ का पिटना लाचार हो, बस देख सकता था. कितना खौफनाक और मुश्किल होता है अपनी माँ का बेरहमी से पिटना देखना... जी करता था, कुल्हाड़ी उठा लूं और फिर ख्च्चाक से अपने बाप के सिर में दे मारूं. मगर मैं कुछ भी नहीं कर सकता था, सिवा रोने के.’ कहानी के इस अंश में जीवन का यथार्थ कूट-कूट कर ऐसे भरा है कि जीवन, औरतों की आजादी, नौनिहाल बच्चे आदि शब्द बेमानी लगने लगते हैं. अगर घर में या समाज में किसी औरत को दबाया या सताया जाता है तो केवल उस औरत की ज़िंदगी जहन्नुम नहीं हो जाती बल्कि घर के या समाज के बच्चों के कोमल मन पर बहुत बुरा असर पड़ता है. एक ओर बच्चा जिसकी निर्भरता एक ख़ास उम्र तक माँ और बाप पर होती है, जो उनके लिए पहले नायक और नायिका होते हैं, उनकी छवि धूमिल होती है. बच्चे जो स्वभाव से स्वप्नजीवी होते हैं, उनके लिए रोल मॉडल उनके बाप-माँ की छवि चकनाचूर हो जाती है. मतलब एक बच्चे और उसके बचपन के मौत का सिलसिला यहाँ से शुरू हो जाता है और धीरे-धीरे उसकी परिणति क्या होती है इस बारे में बात करने से भी दर लगता है. बच्चा पहली दफा अपनी माँ को पिटता देखता है तब वह रोता है फिर उसे गुस्सा आता है और एक समय ऐसा भी आता है जब उसके मानस में यह बात घर कर जाती है कि औरत पीटने के लिए ही होती हैं. पहली पाठशाला ही उसे औरतों के प्रति इतना असंवेदनशील बना डालती है कि इस पाठशाला से निकला वह छात्र निर्भया जैसी घटना को अंजाम देकर भी किसी पछतावे में या किसी अपराधबोध का शिकार नहीं होता. इस कहानी की माँ का पति सरकार में प्रोन्नति पा जाता है फिर तो मानों उसे कोई लाइसेंस मिल जाता है और उसका कहर अपनी पत्नी पर और जोर-शोर से टूटने लगता है. उसकी सास भी इस खेल में जमकर भाग लेती है. जुल्म और सितम से हारकर वह अपने मायके बार-बार आती है. इस खेल को बंद करने खूब गुहार लगाई जाती है लेकिन एक रोज उसका पति दूसरी शादी कर लेता है. धीरे-धीरे सब ख़त्म हो जाता है और वह अपने पीहर लौट आती है. उसके पिता और भाई उसकी दूसरी शादी कर भेज देंते हैं. यहाँ औरत और बच्चे को घर में सम्मान तो मिलता है पर समाज के लोग बच्चे को बक्खड़ कहकर बुलाते हैं. बच्चा तिलमिलाता है और गुस्से में इस अपमानजनक शब्द के बदले में मारपीट कर लेता है. इसका बदला ऐसे लिया जाता है कि वह पूरी तरह टूट जाता है. हमारे देश में अपने अहंकार और अपनी दुश्मनी का बदला लेने का अंदाज बहुत ही अपमानजनक है. वह आदमी को अन्दर ही अन्दर घुन की तरह खा जाता है.

चरण सिंह पथिक की ‘मूंछे’ भी एक जोरदार कहानी है. यह कहानी आरक्षण पाने और आरक्षण के कोटे में कटौती को लेकर उबल रहे एक असुरक्षा के बोध में जी रहे समाज की कहानी है. राजस्थान के एक गांव का जाटव फौजी बन गया है. फ़ौज में भर्ती हुए उसे कुल तीन साल ही हुए थे. इस तीन साल में कच्चे घर को पक्का बनवाना, कर्ज चुकाना, छोटे भाई की शादी के अलावे अपनी शादी भी कर ली थी. सालभर से उसने अपनी पत्नी का मुंह नहीं देखा था. 15 दिन की कैजुअल छुट्टी लेकर वह घर आया था. दो दिन रास्ते में निकल गए और दो रास्ते की थकान मिटाने में. बेसब्री का आलम मत पूछो. सुबह जागने के बाद से ही ससुराल जाने की तैयारी करने लगा. आरक्षण की लड़ाई सड़क पर आ गई थी. चक्का जाम कर दिया गया था. गुर्जर और मीणा आमने-सामने थे. रामराज जाटव की माँ उसे बार-बार ससुराल जाने से मन कर रही थी. वह भले-बुरे के अंदेशे से मरे जा रही थी पर पिया मिलन के उत्साह में वह कुछ भी सुनने-समझने को तैयार नहीं था. माँ ने आशंका जाहिर करते हुए कहा भी था कि तेरी ये छोटी-छोटी छल्लेदार मूंछे और ये फौजी कट बाल...? कहीं गूजर तुझे मीणा और मीणा तुझे गुजर न समझ बैठे तो...? सावन के अंधे को सबकुछ हरा-हरा ही लगता है. आखिरकार, वह ससुराल के लिए अपनी हीरो-हौंडा मोटरसाइकिल से निकल पड़ा. हालंकि उसके मन में अलग किस्म का डर सा आ बैठा. वह मोटर साइकिल पर झुक सा गया. इतना डर तो उसे बारामूला में आतंकवादियों से जूझते हुए पहाड़ और जंगल के रास्ते में नहीं लगा था कभी. गांव से निकलते ही हथियारों से लैस भीड़ ने उसे घेर लिया. गांव और जाति पूछी. बताने पर उसकी बात का किसी को विश्वास ही नहीं हुआ. मूछें और चमार जाति का लड़का फ़ौज में, भला ये भी कोई विश्वास करनेवाली बात हो सकती है! सो उसका किसी ने विश्वास नहीं किया और उसकी बेहरहमी से पिटाई की. यह पिटाई मीणाओं ने की थी उसे गूजर समझकर. कुछ आगे जाने पर मीणाओं ने उसे घेर लिया. रामराज को लगा कि शायद झूठ बोलने से काम चल जायेगा. उसने जाति पूछने पर मीणा बता तो दिया पर गोत्र भी पूछा जायेगा इसकी शायद कल्पना भी नहीं की थी उसने. अब क्या था उसपर जमकर लात-घूंसे बरसाए गए. अब उसकी मूंछे काट ली गयीं क्योंकि आरक्षण का सवाल तो मूंछों का जो बन गया था. इस कहानी में नौकरी के अवसर कम होने और सरकार की नीतियों में आरक्षण के अवसर की छोटी सी पुड़िया को लेकर किस कदर छीनाझपटी मची हुई है, का दृश्य पानी की तरह उतर आया है. समाज में हजारों साल से दबी-कुचली जातियों को तरक्की करता देख सुविधा सम्पन्न समाज किस तरह हताश होकर हर कीमत पर बदला लेने पर उतारू हो जाता है. वह सवर्णवादी तबका एक ओर तो सत्ता में रहकर दलितों-दमितों को ऊपर नहीं पहुँचने देने के लिए सारे रस्ते बंद करता है और दूसरी ओर सामाजिक स्तर पर उन्हें हरसंभव जलील करने के कोई मौके नहीं छोड़ता है. मूछें में कहानीकार ने इसे दिखने का बहुत अच्छा प्रयास किया है. 



दो बहनें कहानी के बारे में राजस्थान के ही युवा कथाकार संदीप मील कहते हैं इस कहानी को पढ़ते हुए मालूम पड़ता है कि यह भारत-पाकिस्तान की कहानी हो. इस कहानी में दो सगी बहने एक ही घर में ब्याह दी जाती हैं. वे शादी से पहले अपने बालपन में जैसे छोट-छोटी बातों को लेकर लड़ती थीं, वैसे ही अब भी मोर्चा खुला रखा है. दोनों लड़ाई के दौरान एक-दूसरे को असल बाप की है जैसे विशेषणों तक से ललकारती रहती. वे अपने व्यस्त दिनचर्या में से लड़ने का समय ज़रूर निकाल लेतीं. ‘दिन निकलने पर वे पशुओं के लिए खेतों से हरा चारा लाती. फिर गोबर इकट्ठा कर कंडे थापतीं. रोटियां थेपती और लड़ने के लिए रोज वक़्त भी निकाल लेतीं.’ बस साल के एक महीने फागुन में वे नहीं लड़ती थी. दोनों बहनें मोहल्ले की औरतों की अगवाई करतीं. इस समय वे गीत गा-गाकर अपनी लड़ने की हुलहुली के कसर को पूरा कर लेती. कहानी तो कुल मिलकर यही है पर इस कहानी में एक दिलचस्प मोड़ तब आता है जब छुटकी अपने पति के साथ आगरा घूमने चली जाती है. गांव में बड़की की तबियत बहुत ख़राब हो जाती है. डॉक्टर और वैद्य किसी काम नहीं आते. एक दिन बड़की अपनी बेटी से कहकर छुटकी को फ़ोन लगवाया. छुटकी चालू हो जाती है-‘नकटी! मै सू बोलवे की जुर्रत का है. लाल किला ताजमहल देखा. तेरे हड्डा, दारी! ...मुझे अकेले छोड़कर खसम के संग मौज करने गई थी. भुगतेगी-भुगत...तू तो बिल्ली है दारी, पिछले जनम की... दूर से शेरनी बनती है छछूंदर! असल बाप की बेटी है तो गांव में आकर लड़... बड़की ने फिर ललकारा. ‘बनती है फ़ौज की लुगाई.’ दो दिन बाद आ रही हूँ. दारी...! तेरी चुटिया पकड़ फिरा-फिराकर के नीं फेंका तो असल बाप की बेटी मत कहियो. छुटकी ने फ़ोन पर ताल ठोंकी. बड़की ने बात ख़त्म होते ही मोबाइल को स्विच ऑफ किया और खूब सारी रोटियां डकारी. थाली भरकर दूध और रेवड़ियाँ गटक ली और सोने चली गयी. दूसरे दिन सुबह उठकर दवा की पोटली उठाकर घूरे में फ़ेंक आई और बोली-‘कल रात जैसी नींद पिछले बारह-पंद्रह दिनों में कभी नहीं आई.’

 पीपल के फूल कहानी में पीपल बूढ़ा और कमजोर हो चला है. गांव का फैसला हो चुका था और उसे अब कटने का इन्तजार करना था. उस पेड़ के बाशिंदे आपस में बातचीत करने लग जाते हैं और शोक मनाने लग जाते हैं. यह पेड़ ही इसकी पहचान है. इस पीपल की वजह से गांव का नाम पीपलपुरा पड़ा था. पीपल के कटने की खबर से शोक-संतप्त जीव-जंतुओं के बीच संवाद हो रहा है, वह इस कहानी का बीज तत्व है. इसमें प्रकृति की अनदेखी और अपने फायदे के लिए मनुष्य के बर्बर व्यवहार को बहुत शिद्दत से कहानीकार ने पकड़ने की कोशिश की है. कहानी के अंत में जो कटाक्ष मनुष्य प्रजाति पर किया गया है, वह मनुष्य के मनुष्य बने रहने पर संदेह पैदा करता है. कहानी का अंत कुछ इस प्रकार किया गया है- ‘बहरहाल यह किंवदंती गांव-गांव खूब सुनी जाती है कि आज तक किसी ने पीपल के फूल नहीं देखे. लेकिन देखने वालों ने महानगर के कई मल्टी स्टोरों पर फलां ब्रदर्स मल्टीस्टोर (पीपलपुरा वाले) लिखा हुए ज़रूर देखा है.’

 अंत में एक बड़े फलक वाली कहानी गूंगा गुलाब के बारे में थोड़ी सी बातें. यह एक प्रेम कहानी है. प्रेम में संकेत बहुत मायने रखते हैं. संकेत इसलिए मायने रखते हैं क्योंकि प्रेम तो भाव, एहसास और अंतरंगों को समझाने का ही नाम है. यही वजह है कि प्रेम के फूल तमाम बंदिशों के वावजूद खिल ही जातें हैं. किताबों में रखे फूल मुरझा जाते हैं तब उसमें बसी खुशबू प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए संजीवनी का काम करते हैं. इस कहानी में भी संकेतों के माध्यम से बात कही गयी है. प्रेमिका गूंगी और बहरी है. उसका निकाह किसी दूसरे पुरुष से करा दिया जाता है. उसे उसका पति मारता-पिटता है और तलाक ले लेता है. वह मायके आ गई है. बेटी के दुःख से घुल-घुलकर उसके वालिद की जान चली जाती है. प्रेमी बसंत बीते मंजर को कुछ याद करता है- ‘पापा तब बेरहमी से चीखे थे-‘बस्स्स ...पढ़ चुका तू. नालायक...नमक हराम. ये गूंगी मुल्ली ही मिली थी क्या तुझे इस हिंदुस्तान में...? सुनकर मैं और इन्दर सहम गए थे. मुझे याद है रुखसाना अपने घर के दरवाजे पर तब भी खड़ी थी. गर्दन हिलती बार-बार इशारा कर रही थी...मत जाओ...मत जाओ! कितना धोखेबाज और कायर था मैं...!’ प्रेम कहानियां ऐसे ही दफ्न हो जाती हैं और आप उसकी गुलाब सी खुशबू अपने भीतर एक गूंगे आदमी की तरह ताउम्र महसूस करते रहते हैं.  

चरण सिंह पथिक मानवीय संवेदनाओं को बहुत गहरे उतरकर पकड़ पाते हैं और उसे बड़ा फलक दे पाते हैं इसलिए वे बड़े कहानीकार हैं. कहानी और कहानीकार की सफलता भी इसी बात में है कि उसमें जीवन की सूक्ष्मता को जगह दी गयी है या नहीं? अगर स्थूल बातों के सहारे कहानी लिखने की कोशिश की जाय तो उसे गपशप का नाम दिया जाना चाहिए न की कहानी का. पथिक की कहानियों में यथार्थ की कड़वाहट ऐसे उतर आती है कि उस जीवन को भोगे या महसूस किये हुए व्यक्ति की बेचैनी बढ़ जाए. दूसरी और उनके पात्रों के जरिये जीवन का सौन्दर्य भी खूब छलक-छलक कर बाहर आता है जो जीवन में भुखमरी, गरीबी, अभाव से उपजे सूखेपन को कम भी करती है. आज के सन्दर्भ में पथिक की कहानियों को इस समय के खोखले शोर के वजह से भले ही विशेष तवज्जो नहीं मिल रही हो, लेकिन आने वाले समय में वे साहित्य समाज और पाठकों का भरपूर प्यार पाएंगे.












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