करंट अकाउंट डेफ़िसिट के बढ़ने पर देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है।





करंट अकाउंट डेफिसिट
फ़ोटो - एलेवेट योर लाइफ 


सबसे पहले जानिए ये करंट अकाउंट डेफ़िसिट के बारे में।


करंट अकाउंट डेफ़िसिट या चालू खाता 

कोई भी देश अपने देश में मौजूद संसाधन से देश नहीं चला सकता और देश के लोगो की सारी जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। ऐसे में देशों के लिए ये जरूरी हो जाता है कि वो एक दूसरे से आयात – निर्यात करें। इस आयात – निर्यात में हो सकता है है किसी देश का आयात, निर्यात कि अपेक्षा ज्यादा हो जाए तो वो उस देश के लिए अच्छे संकेत नहीं है। आसान भाषा में कहें तो “जब किसी देश का निर्यात कम हो जाता है और आयात ज्यादा हो जाता है, तो इस स्थिति में करंट अकाउंट डेफिसिट की स्थिति बन जाती है।“ करंट अकाउंट डेफिसिट की स्थिति बनने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है और कई बार जब डेफिसिट बहुत ज्यादा हो जाता है, तो मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा की कमी भी हो जाती है। विकासशील देशों की बात है, तो उनके साथ यह समस्या अक्सर आ जाती है।

ऐसी स्थिति में विकासशील देश को अपने घरेलू उत्पादन को बढ़ाना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा निर्यात करना चाहिए और आयात को कम करना चाहिए। इसके अलावा देश आयात कि जा रही वस्तुओं पर सीमा शुल्क भी बढ़ा सकती है। 

भारत भी एक विकासशील देश है और अन्य देशों की तरह भारत भी देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरे देशों से आयात और निर्यात करता है। लेकिन भारत का निर्यात हमेशा आयात की अपेक्षा कम ही रहा है। 

उदाहरण - माल लीजिए कि भारत ने कुवैत से 200 रुपये का कच्चा तेल खरीदा, लेकिन कुवैत ने भारत से 180 रुपये का चावल खरीदा. तो भारत को कुवैत को 20 रुपये देने होंगे। यही भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट। 

करंट अकाउंट में दो तरह के व्यापार शामिल होते है
1 – प्रत्यक्ष व्यापार
2 – अप्रत्यक्ष व्यापार

प्रत्यक्ष व्यापार – प्रत्यक्ष व्यापार को अंग्रेजी में विजिबल ट्रेड कहते है। भारत अगर कोई खरीदता (आयात) या बेचता (निर्यात) बेचता है तो उसे प्रत्यक्ष व्यापार के श्रेणी में रखा जाता है। 

अप्रत्यक्ष व्यापार – अप्रत्यक्ष व्यापार में आईएनआरआई और भारत में रह रहे विदेशियों द्वारा किए गए ट्रेड को शामिल किया जाता है। बैंकिंग सुविधाएं, बीमा और विदेशों में रह रहे लोगों की ओर से भारत में भेजा जाने वाला और भारत में रहने वाले विदेशियों की ओर से अपने देश में भेजा जाने वाला पैसा शामिल होता है। देश का करंट अकाउंट डेफ़िसिट कितना कम है और कितना ज्यादा है इसकी तुलना देश की जीडीपी से की जाती है। अभी फिलहाल भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट देश की कुल जीडीपी का 2.4 फीसदी है। ( सोर्स – द लल्लन टॉप) 

करंट अकाउंट डेफिसिट के ज्यादा होने से क्या होगा 

करंट अकाउंट डेफ़िसिट देश की कुल जीडीपी का 2.5 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। अगर करंट अकाउंट डेफ़िसिट देश की कुल जीडीपी से ज्यादा होगा तो भारत दूसरे देशों का कर्ज़दार बन जाएगा। जितना ज्यादा डेफ़िसिट बढ़ेगा भारत को उतना ज्यादा पैसे विदेशों को चुकाना पड़ेगा। चुकी भारत विदेशों से व्यापार डॉलर में करता है तो भारत को विदेशी मुद्रा भंडार से ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेगे क्योंकि भारत का रुपया, डॉलर के मुक़ाबले कमजोर है। अगर भारत का विदेशी मुद्रा भंडार कम होगा तो इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। 

भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट क्यों बढ़ रहा है


अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से भी भारत का चालू खाते का घाटा बढ़ता जा रहा है और भारत पहले के मुक़ाबले अब ज्यादा तेल आयात करता है। 

दैनिक भास्कर मनी में छपी खबर के अनुसार भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) 2018-19 में 2.5 फीसदी तक बढ़ने की संभावना है। जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। 

दरअसल खड़ी देशों में राजनैतिक और व्यापारिक बवाल मचा हुआ है। पिछले हफ्ते तुर्की में राजनीतिक उथल-पुथल के चलते रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 70.32 रुपए के रिकॉर्ड स्तर तक गिर गया। वहीं, चीन की ओर से आर्थिक स्थिति को ठीक रखने के लिए संपत्तियों को सुरक्षित रखने पर जोर देने से उभरते देशों की करंसी पर दबाव बढ़ गया है। वहीं चीन और अमेरिका में बीच व्यापार को लेकर चल रही लड़ाई से भी भारत पर प्रभाव पड़ा है। इसकी वजह से भारत का निर्यात कम हो गया है। 

फ़ोटो - लिव मिंट. कॉम 


भारत को क्या नुकसान होगा 


भास्कर मनी में छपी खबर के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2017 – 18 में भरता का करंट अकाउंट डेफ़िसिट 1.9 फीसदी था। एक साल के अंदर इस करंट अकाउंट डेफिसिट में 0.6 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। आसान भाषा में समझते है 7 सितंबर 2018 में आरबीआई ने कुछ आकड़ें जारी किए। आकड़ों के मुताबिक 2017-18 में भारत का कुल करंट अकाउंट डेफ़िसिट 11,45,421 करोड़ रूपये ( 15.8 बीलीयन डॉलर ) था। वहीं 2016-17 मीन भारत का कुल करंट अकाउंट डेफ़िसिट 10,87,575 करोड़ (15 बीलीयन डॉलर) रूपये था। यानि की एक साल में 57,846 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ था। पिछले साल भी भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट 2.5 फीसदी ही था, जो घटकर 2.4 फीसदी हो गया है, लेकिन पैसे के आंकड़ों में इजाफा सिर्फ इसलिए हुआ था, क्योंकि पिछले साल की तुलना में इस साल जीडीपी का आंकड़ा बड़ा हो गया है।

लेकिन अगर अब भारत का करंट अकाउंट डेफ़िसिट बढ़ता है तो भारत को ज्यादा पैसे देने होंगे और ये पैसे भारत को पाने विदेशी मुद्रा भंडार से चुकाने होंगे। क्योंकि व्यापार डॉलर में होता है और डॉलर रूपये की अपेक्षा हमेशा मजबूत रहा है और वर्तमान में रूपये की हालत बहुत कमजोर है। इसके अलावा दूसरे देश भारत में पैसे लगाने से भी डरेंगे और अगर ऐसा हुआ तो देश की अर्थव्यवस्था को और भी ज्यादा नुकसान हो जाएगा।















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