शादी अपनी ही जाति में करनी चाहिए।



सैराट
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शादी अपनी ही जाति में करनी चाहिए। जातियों के बीच की दीवार टूटेगी तो नीच वालों से रिश्ता करना पड़ेगा। वो नीच क्यों है, इससे मुझे मतलब नहीं है लेकिन मुझे बताया गया है कि मैं ऊँच हूं इसलिए मैं इस व्यवस्था को बिगाड़ना नहीं चाहता। वैसे ही जैसे मेरी बीवी, बहन या माँ बाद में खाना खाती है, मैं गरम रोटी खाता हूं और मुझे खाते वक्त रोटी का हिसाब रखने को मना किया गया है, क्यों मना किया गया है, यह नहीं पता लेकिन चूल्हे के आगे मुझे नहीं धकेला जाता इसलिए मैं इसपर चुप ही रहता हूं।

प्यार जैसा कुछ तो सभी कर लेते हैं लेकिन ज्यादातर लोग प्रैक्टिकल हो जाते हैं क्योंकि माँ - बाप है और उनकी भी कुछ इच्छा है, उन्होंने मेरे बोलने पर मुझे पैदा किया और बहुत बलिदान भी दिया है, इसलिए अब मेरी बारी है। हम संस्कृति की अवहेलना नहीं कर सकते। हमारी संस्कृति में हम शादी करते नहीं हैं, हमारी शादी करवायी जाती है। दुल्हन को पकड़ कर लाया जाता है, दूल्हा भी नाचते गाते पहुँच जाता है। हफ्ता, महीना, फोन पर बात कर के, एक दो बार मिल कर हम एक साथ सात जन्म रहने के लिए राजी हो जाते हैं। सकपकाहट तो होती है लेकिन मुझे पता है कि लड़की को ट्रेनिंग घर से मिली हुई है कि कैसे खुद को मारकर, किसी की बीवी बना जाता है। मुझे पता है क्योंकि मैंने भी अपनी बहन को ट्रेनिंग लेते देखा है घर में। और पति बनना भी पापा से लगभग सीख लिया है। एक बार बच्चे हो जाए बस, आपस की कमी मरते दम तक छिपी ही रहती है।

हां तो प्रैक्टिकल होना चाहिए। इमोशनल या तो मरते हैं या जिंदगी भर घर वालों की नजर में वापस उठने की कोशिश करते हैं। लड़कियों को तो ऐसे भी इज्जत न लव मैरिज में मिलती है न अरेंज। बल्कि लव मैरिज में ससुराल को जीतने के लिए और भी बेइज्जती करवानी पड़ती है। दूसरे धर्म से है तो उसके धर्म को गाली, जाति अलग तो जाति को गाली और कुशल गृहणी न बन पाने पर उसके माँ बाप को गाली देना तो हमारी संस्कृति का हिस्सा है ही। अपने मन का तो वो किसी भी केस में नहीं कर सकती, करना भी नहीं चाहिए क्योंकि हर रिश्ते में कुछ समझौते होते हैं। वह अपनी पसंद से उठना बैठना, खाना पीना, कही आना जाना, नहीं कर सकती। करेगी तो टीशर्ट पैजामा आरामदेह लगता है लेकिन अगर आराम ही करना था तो शादी क्यों की।

लड़कों को भी एडजस्ट करना पड़ता है। हर हफ्ते पार्टी नहीं हो पाती। माना कि बैचलर वाले दर्द मिट जाते हैं, खाना, कपड़ा सफाई सब खुद ब खुद होने लगती है लेकिन इन सब के लिए सामान का जुगाड़ तो करना होता है, मॉल के चक्कर भी लगाने होते हैं, सब्जी, राशन वगैरह सब लाना पड़ता है, प्लस माँ का दिल रखने के लिए बीवी को ढंग से रहने, सुहागिन के नियम वगैरह निभाने के लिए बीवी को भी मनाना पड़ता है। ससुराल में बसर करना किसी के लिए भी मुश्किल है इसलिए मैं भी ससुराल जाने से बचता हूं। चार तरह की सब्जी, मिठाई, मुझसे खाई नहीं जाती और ससुराल वाले है कि मानते नहीं, न बीवी स्पोर्ट करती है।

लेकिन जीवन गाड़ी ऐसे ही चलती है। एक ढांचा है जिसमें सब को ढलना है। जैसे हमारी संस्कृति में कुछ अपनी जात बताते हुए छाती चौड़ी कर लेते हैं तो कुछ नजर नीची। कुछ बीच बाजार रहते हैं कुछ गाँव के किनारे। लेकिन सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए यह बेहद जरूरी है। बेहद जरूरी है कि नीच जाति के लोग आजादी के 70 साल बाद भी सीवर में ही मरें, बेहद जरूरी है कि उसका बच्चा भी आजादी की आखिरी साँस गटर में ही ले, बेहद जरूरी है कि उनकी एक पूरी नस्ल अनपढ़ ही रह जाए, बेहद जरूरी है कि हर सरकार उनसे मुँह मोड़ आगे निकल जाए।

इसलिए अभी तक बेटी को जिंदगी भर खुश रखने के लिए जो कीमत पिता अदा करता आया है, नीच को नीच बनाए रखने के लिए जो विवाह-प्रशासन व्यवस्था तय है, पत्नी-बहु का सुख भोगने और पुरुषसत्ता को बचाए रखने के लिए जो ट्रेनिंग दी जाती है, गैर जाति तथा धर्म के प्रेमियों को जैसे काटा जाता है, जूता सिलने और कचड़ा हाथ से साफ करने का जो हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर हो रहा है, ऊँच जात के आगे जो जमीन पर बैठने की आदत पड़ी हुई है, बस यही सबसे सेफ और टिकाऊ जरिया है समाज में बैलेंस बनाए रखने का। बाकी, प्रिविलेज तो कोई नहीं छोड़ता, बता जरूर देता है।





यह लेख दीपाली दास की फेसबुक वाल से साभार है।





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