दिल्ली के विधायक पंकज पुष्कर तक ये तस्वीर पहुंचा दो यारों।




फ़ोटो - प्रद्युमन 


ये दिल्ली के गांधी विहार ब्लॉक बी की तस्वीर है. यहां पिछले एक महीने से सड़ा हुआ पानी और उसमें पड़ा हुआ कचरा इकट्ठा है. इस कचरे से ऐसी बदबू उठती है जिसे झेलना आसपास की लगभग 200-400 मीटर की आबादी के लिए मुश्किल हो जाता है. मैं जब भी बाहर ताज़ी हवा के लिए निकलता हूँ तो सबसे पहले इस कचरे से उठने वाली बदबू सूंघने को मिलती है. 

आज ऐसा नहीं हुआ है. आज सुबह जब मैं अपने कमरे से बाहर निकला तो रोजाना की बदबू गायब थी. मुझे लगा शायद सफाई हुई होगी. लेकिन जब मेन रोड की तरफ बढ़ा तो पता चला कि यहां अभी भी कचरा पड़ा हुआ है.  

हुआ असल में ये है कि रोजाना की बदबू सूंघते हुए अब बदबू सूंघने की आदत हो गयी है. जुकाम नहीं है फिर भी नाक दुर्गंध को पहचान नहीं पा रही है. मेरी तरह शायद और लोगों को भी इसकी आदत हो गयी होगी. ये कचरा यही पड़ा सड़ता रहा तो शायद एक दिन ऐसा भी आएगा जब लोग बीमार होने लगेंगे और उन्हें बीमारी की भी आदत हो जाएगी. कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो इससे बचने के लिए मास्क , एयर प्यूरीफायर आदि जैसे उपाय कर लेंगे. 

बड़े शहरों के लोग हाईटेक होते हैं. हाईटेक लोगों की समस्या का तो फौरी सॉल्यूशन हो जाएगा. लेकिन ये कचरा जस का तस पड़ा रहेगा. यहां पहले की तरह ही रोजाना गंदगी होती रहेगी और लोग अपने घरों में बैठकर गंदगी से बचने के नए नए उपाय करते रहेंगे.

फ़ोटो - प्रद्युमन 


इस कचरे का असर ये है कि ग्राउंड फ्लोर के कमरे में दिन में भी मच्छर काटते हैं. कोई मार्टिन , गुडनाईट आदि के क्वायल जलाकर हवन भी कर दे तब भी कुछ घंटे बाद मच्छर मर कर पुनर्जीवित हो उठते हैं. मुझे लगता है जैसे यहां रहने वाले इंसान गंदगी के आदती हैं वैसे ही शायद यहां के मच्छर , मच्छर भगाने वाले उपायों के आदती हैं. इतने आदती हैं कि वो मच्छरदानी के हज़ारों छेदों में अपने घुसने लायक एक छेद मात्र पांच मिनट के अंदर खोज लेते हैं. यहां उनके प्रकोप से बचने का कोई उपाय नहीं है. वाबजूद इसके मैंने आज तक कभी अपने मुहल्ले में मच्छरों से बचने वाली दवा का छिड़काव होते नहीं देखा है. यहां मच्छर और इंसान के साहचर्य का ऐसा इकोसिस्टम बन गया है जिसमें मनुष्य न चाहते हुए भी मच्छरों के लिए उदार पालनकर्ता की भूमिका निभा रहा है.

दिल्ली और यहां की गंदगी के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि यह शहर ऐसे ही धीरे धीरे गंदा होता गया होगा और लोग अपने घरों में इससे बचने के नए नए उपाय अपनाते गए होंगे. इस भागदौड़ भरी जिंदगी में शायद किसी ने मूल समस्या को हटाने के बारे में कभी सोचा नहीं होगा या सोचा भी होगा उनके पास इससे निपटने का कोई 'झटपट तरीका' नहीं रहा होगा. 'झटपट तरीका' वो तरीका है जिससे फ़ास्ट और हाईटेक शहरों में किसी समस्या का समाधान कोई ऑफलाइन या ऑनलाइन प्रोडक्ट खरीदते ही झटपट हो जाता है.

बहुत संक्षेप में , सफाईकर्मियों की बात करें तो जो सफाईकर्मी यहां आते हैं उनके पास एक झाड़ू होती है और एक छोटा 'बेलचा' होता है. उससे इस सड़ते हुए कचरे के आसपास तो सफाई हो जाती है लेकिन कचरे का निर्माणाधीन लघु तालाब साफ नहीं हो पाता है. मैंने कई बार सोचा है कि उनसे शिकायत करूँ , उन्हें ये सब साफ करने को बोलूं लेकिन अखबारों में हर महीने सफाईकर्मियों की मौत और उनकी घटती हुई औसत आयु के आंकड़े देखकर ऐसा करने की हिम्मत नहीं हुई. बाकी फोटो में दिख रही गायों पर कुछ नहीं लिखना है. उनके लिए देश की सबसे बड़ी पार्टी और गौपुत्र ऑलरेडी चिंतित हैं.

फ़ोटो - प्रद्युमन


यहां ये सब इसलिए लिख रहा हूँ ताकि बाकी लोग भी अपने आसपास झांक सकें. इससे पहले की वो गंदगी झेलने के आदती हों और मेरी तरह उनकी नाक भी प्रदूषित हवा के लिए अनुकूलित हो जाए. दवा-दारू और बीमारी से पहले मूल समस्या का समाधान खोज लें और यह सुनिश्चित कर लें कि हमारे सफाईकर्मी इस बिखरी हुई गंदगी को साफ करते करते अधेड़ होने से पहले न मरें. 

इसलिए भी लिखा है ताकि कोई मेरे इलाके के विधायक श्री pankaj pushkar जी तक यह संदेश पहुंचा सके. सुना है काफी पढ़े लिखे व्यक्ति हैं. शायद वो समझ पाएं कि एक विद्यार्थी अपने आसपास की गंदगी और अपनी नाक की अक्षमता से घबराया हुआ है. वह उनके लिए चिंतत भी है जो रोजाना उसके आसपास का परिवेश साफ सुथरा रखते हैं. वह आज अपने उस स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार से वंचित हो रहा है जो उसे अभी तक सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए ही रटा जाना जरूरी लगता था. 

जिनकी भी लिस्ट में पंकज पुष्कर जी हों कृपया उन तक मेरी बात पहुंचा दें.



- यह लेख प्रद्युमन यादव जी के फेसबुक से ली गई है।













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