हिंदी को इतना कूल बना दो कि लोगों को उससे प्यार हो जाए।





फ़ोटो - गूगल 

सवाल यही है कि आप हिंदी को कहां देखना चाहते हैं? इस सवाल का सीधा जवाब है कि आप दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को कहां देखना चाहते हैं ? जैसे- तमिल, मराठी, बंगाली, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ और भी।

बाज़ार बढ़ता जा रहा है इसलिए हिंदी बढ़ती जा रही है। इस दौर में हिंदी को आगे बढ़ाने में किसी शख्स या किसी संस्था का कोई भी योगदान नहीं है। इसलिए, अगर आपको लगता है कि हिंदी ही हिंदी है तो अपने आपको करेक्ट कीजिए, हिंदी ही हिंदी नहीं है हिंदी भी है। 

बेंगलुरू में अमेजॉन वाला प्रोडक्ट लेकर आता है और कन्नड़ में बात करता है आपको कन्नड़ नहीं आती तो आप उससे कहते हैं कि आपको काम करना ही है तो हिंदी सीख लो। क्यों भाई ? बाजार के दवाब में ना आप ये कह पा रहे हो ? अगर नहीं तो, आप बेंगलुरू में आए हो आप कन्नड़ क्यों नहीं सीख लेते ? 


आप ऑटो वाले से, पंसारी से, मॉल के काउंटर पर, फिल्म के काउंटर पर, एयरपोर्ट पर, बस कंडेक्टर से हिंदी में बात कर रहे हो...वो सब आपके लिए टूटी-फूटी हिंदी बोल रहे हैं...उन्होंने सीखी है...वो कोशिश कर रहे हैं...आप नहीं कर रहे हैं...आप अपनी भाषा में लगातार बोलते जा रहा हैं...ऐसे ही वो भी अपनी मातृभाषा में बोल सकते हैं....लेकिन नहीं, बाजार का दवाब है...मेरा एक दोस्त कोलकाता से है धांसू हिंदी बोलता है...लोकल हिंदी भी बोल लेता है...एक महाराष्ट्र से है अच्छी हिंदी बोलता है...दूसरे स्टेट से भी हैं जैसे गुजरात, कर्नाटक सब हिंदी बोलते हैं...

मैं यानी कि हिंदी भाषी राज्यों के लोग दूसरी भाषा क्यों नहीं सीखते...? हिंदी भाषी राज्यों के लोग हिंदी छोड़कर कुछ नहीं बोल पाते...ऑफिस में एक मेरा दोस्त तमिलनाडू से है... हिंदी ना ही समझ पाता है, ना ही बोल पाता है...वो सीख रहा है... हिंदी वर्णमाला और हिंदी के आम बोलचाल के शब्दों की किताब खरीदी है...मुझसे रोज पूछता है...मैं तमिल नहीं सीख रहा हूं...क्यों ? मैंने एक बार भी कोशिश भी नहीं की...क्यों ? 

हमारे दिमागों में बात बैठा दी जाती है कि दिल्ली-एनसीआर ही देश है....अपर इंडिया ही इंडिया है...वो नहीं है मेरे दोस्त। आपके ही देश में तमाम दूसरी बड़ी और महत्वपूर्ण भाषाएं भी हैं...उनकी इज्ज़त करिए...अगर नहीं कर सकते तो कम से कम उनपर हंसिए मत।

 मेरे सर्कल में ऐसे लोग नहीं है जो हिंदी को थोपते हो...लेकिन हिंदी पट्टी में ऐसे लोग जरूर हैं...उन्हीं लोगों की वजह से लोअर इंडिया में अपर इंडिया के लोगों की ऐसी इमेज बनी है कि ये लोग हिंदी थोपते हैं...

'अंग्रेजी के दरबार में दासी हिंदी' टाइप कविताएं अब पोस्ट करना बंद कर दीजिए...वो दौर चला गया है...हिंदी लोग अपने आप सीखेंगे...सीख रहे हैं...उसे इतना कूल बना दो कि लोगों को उससे प्यार हो जाए...तब तक आप दूसरी भाषाओं से प्यार कीजिए....












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