कविता : मैं एक बार फिर देसी होना चाहता हूँ।


कविता : मैं एक बार फिर देसी होना चाहता हूँ।


रोजमर्रा की भाग दौड़
की जिंदगी से ऊब चुका हूं मैं,
एक बार फिर से गाँव
की सुध लेने चाहता हूँ।

छोड़ कर एयर कंडीशन
का सुख, गाँव की मंत्र मुग्ध
करने वाली हवा महसूस
करना चाहता हूँ।

छोड़ कर स्लीपवैल और
कर्ल -ऑन मैट्रेस का सुख
एक बार फिर से मूँज
की रस्सी से बनी खटिया
में सोना चाहता हूँ।

छोड़ कर बड़े- बड़े मॉल का 
फ्रोजेन फ़ूड (बासी खाना)
एक बार फिर से चूल्हे में
बनी हुई ताज़ी ताज़ी रोटियां
खाना चाहता हूँ।

छोड़ कर ओला,
उबर की राइड
करके इक्के की सवारी
राजशाही महसूस करना
चाहता हुँ।

उतार कर विदेशी चोला
मैं एक बार फिर देसी
होना चाहता हूँ।

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