भीमा कोरेगांव हिंसाचार की असलियत।

By - अली शेख

फ़ोटो - जीरो माइल्स


सबसे पहले तो ये जो कैप्शन मैंने लिखा हैं गलती इसी में हैं तो शुरुआत इसीसे करते हैं। जिस गाँव में हुई हिंसा को लेकर पूरे दुनियाभर में आग लगी पड़ी हैं उसका नाम दरअसल कोरेगांव भीमा हैं भीमा कोरेगांव नहीं और ये नाम इस तरह से पड़ा क्योंकि इस गाँव के बगल से भीमा नदी बहती हैं जिसके चलते इस कोरेगांव को कोरेगांव भीमा के नाम से जाना जाता हैं। 

भीमा नदी के अलावा यहाँ एक स्तंभ भी हैं जिसको विजय स्तंभ कहाँ जाता हैं। इस स्तंभ का इतिहास कुछ 200 साल पुराना हैं जब ब्रिटिशों की महार सेना (तुकड़ी) ने पेशवाओं की मराठा सेना को युद्ध में धूल चटायीं थीम। माना जाता हैं कि यह दलितों की उच्च जातीयों की भीड़ पर पहली जीत थी और उस समय छुआछूत और ऊँची जाती द्वारा अन्य समस्याओं से ग्रस्त दलितों ने इस लड़ाई को अपनी जीत के नाम से इतिहास में दर्ज कर लिया। इस लड़ाई में शहीद हुए सेवकों और उनकी जीत को विजय स्तंभ के नाम पर खड़ा कर दिया गया।

महार सेना 1 जनवरी को यहाँ आती हैं


1 जनवरी 2018 को इस जीत के 200 साल पूरे होनेवाले थे और हर साल की तरह इस साल भी देशभर से दलित समाज के लोग इस विजय स्तंभ पर मत्था टेकने आनेवाले थे। जश्न इस बार बड़ा होना था क्योंकि 200 साल पूरे हो रहे थे और उसी जश्न को मनाने के लिए पुणे के शनिवारवाड़ा में एक दिन पहले यानिकि 31 दिसंबर 2017 को एल्गार परिषद का आयोजन किया गया। इस परिषद द्वारा दलितों की उस समय की जीत, उनकी ताकत और वर्तमान की परिस्थिति को दिखाने के लिए कई बड़ी हस्तियों को आमंत्रित किया गया जिसमें जिग्नेश मेवानी, उमर खालिद और रोहित वेर्मूला की माता राधिका वेर्मूला भी शामिल थी।

इनके भाषणों द्वारा दलितों की शक्ति और वर्तमान परिस्थिति को दिखाने की खूब कोशिशें हुई इतना ही नहीं वर्तमान सरकार के साथ पेशवाओं और ब्राह्मण समाज की आलोचना भी की गई। आलोचना इसलिए थी क्योंकि 200 साल पहले दलितों और वंचितों को नीचा दिखाने या छुआछूत जैसी समस्याओं को निर्माण करने का काम उस समय कुछ लोगों ने किया था जिसका गुस्सा आज भी यहाँ लोग उस समाज के लिए पाल रहे थे।  ये सब करने के लिए खूब भाषणबाज़ी हुई, नाटकिय स्वरुप में या गानों के स्वरुप में माहौल बनाने की कोशिश हुई और अंत में कार्यक्रम समाप्त हुआ।  

दलितों को भगवे झंडे दिखाये गये



31 दिसंबर के प्रोग्राम के बाद एल्गार परिषद द्वारा ये तय हुआ था की मंच पर विराजमान सभी महाशय करीब 200 गाड़ियों के जत्थे के साथ कोरेगांव भीमा में विजय स्तंभ पर जाएंगे लेकिन बाद में इस प्लान में कुछ बदलाव हुए और मंच पर से कोई भी विजय स्तंभ पर नहीं पहुँचा। अगले दिन कोरेगांव भीमा में हज़ारों लोग पहुँच रहे थे हर साल की तरह इस साल भी वहाँ एक माहौल बना हुआ था। इसी दिन यानिकि 1 जनवरी को हिंदू संगठन द्वारा एक रैली निकाली गयी जिसका जत्था विजय स्तंभ पर पहुँच रहे दलितों से टकरा गया, दलितों को भगवे झंडे दिखाये गए ,पत्थर फेंके गए और बस ये विवाद हिन्दू-दलित विवाद बन गया जिसकी आग राज्यभर में फ़ैल गयी और असर अब तक देश पर हैं।


फ़ोटो - आजतक 


अब सवाल ये हैं कि ये रैली क्यों निकली थी और निकली भी थी तो उसी दिन क्यों ? ये जानते हुए भी की उस दिन दलितों का बड़ा प्रोग्राम वही करीब में होने जा रहा था बावजूद इसके पुलिस ने इस रैली को रोकने की कोशिश क्यों नहीं की ?

यह रैली निकली थी एक समाधि के विवाद में जो कोरेगांव भीमा के ही करीब वढू बुद्रुक नामक गाँव में स्थित हैं। वढू गाँव में छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी महाराज की समाधि हैं और कहाँ जाता हैं कि 1689 के दशक में मोघल सम्राट औरंगज़ेब के आदेश पर संभाजी महाराज की हत्या कर दी गयी थी, उनके शरीर को अलग अलग हिस्सों में काँटा गया था। माना जाता हैं कि संभाजी महाराज के शरीर के सभी हिस्सों को एक जगह लाकर उन्हें मुखाग्नि देने का काम एक दलित ने किया जिसका नाम था गोविंद महार।


औरंगजेब और संभाजी महाराज मुखाग्नि 


संभाजी महाराज के शरीर के हिस्सों को एकत्रित कर मुखाग्नि देने की हिम्मत कोई इसलिए नहीं कर पाया क्योंकि औरंगज़ेब ने फरमान निकाला था की जो कोई उन्हें मुखाग्नि देगा उसके परिवार को मिटा दिया जाएगा। अब इस इतिहास के साथ गोविंद महार की हिम्मत को दलितों ने सबसे बड़ा मान लिया और उनकी भी समाधि वही बनाई गयी। इस साल उस समाधि के पास कुछ ऐसे पोस्टर लगाए गए जो मराठा समाज को चुभनेवाले थे जिसके चलते कुछ मराठा समाज के कार्यकर्ताओंने पोस्टर के साथ साथ समाधी की तोड़फोड़ की। 
इस घटना ने गाँव में तनाव निर्माण कर दिया और उसी तनाव के चलते कई लोगों पर एट्रोसिटी के तहत मुक़दमे दर्ज हो गए।
इसके बाद विवाद और बढ़ा और उसे शांत कराने के लिये ज़्यादा पुलिस तैनात करनी पड़ी और अंत में 1 जनवरी के दो दिन पहले यानिकि 30 दिसंबर को ही गाँव के दोनों गुटों में बातचीत कर इस मामले को शांत किया गया। इस बैठक के बाद ये मामला यहाँ शांत हो जाना चाहिए था लेकिन वो गुस्सा कुछ लोगों के मन में बाद में भी रहा और ये विवाद आस पास के गाँव में फैलता गया।

कोरेगांव भीमा ग्रामपंचायत 



कोरेगांव भीमा ग्रामपंचायत के पत्र के मुताबिक कायदा और सुव्यवस्था को बनाये रखने की नज़र से 1 जनवरी 2018 को संपूर्ण गाँव को बंद करने का फ़ैसला लिया गया था लेकिन इसके विपरीत आरोप यह था की हिंदू संगठनों के आदेशों के बाद ही विरोध स्वरूप में ये बंद पालने के आदेश दिए गए थे । ऐसा बताया जाता हैं कि इस आदेश को सोशल मीडिया द्वारा प्राप्त संदेशों के आधार पर ही मिलिंद एकबोटे को हिरासत में लिया गया था । आरोप यह भी हैं की इस तरह के सन्देश मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े के समर्थकों द्वारा ही फैलाएं गए थे।


फ़ोटो - पत्रिका 



इसके अलावा एक और मामले को इससे जोड़ा जाता हैं और वो हैं एक दलित लड़की की मौत का जिसका नाम था पूजा सकट। लड़की के परिवार ने उसे कोरेगाव भीमा हिंसा की प्रत्यक्षदर्शी होने के कारण मारने की बात कहीं तो वही पुलिस के जांच अधिकारियों की माने तो यह लड़की प्रेमसंबंध के चलते आत्महत्या की शिकार हुई थी। पूजा किसी लड़के से प्यार करती थी जिसका पूजा के परिवार वाले विरोध कर रहे थे कई बार मनाने के बावजुद जब घरवाले नहीं माने तो लड़की ने आत्महत्या कर दी लेकिन आरोप हैं कि परिवार ने पुलिस को दी हुई शिकायत में कुछ और ही कहानी लिख दी। अब यह आत्महत्या ही थी या Honour Killing का कोई मामला था ये अब भी जांच का हिस्सा बना हुआ हैं।

कोरेगांव भीमा हिंसा और पुलिस 


9 जनवरी 2018 को पुणे के एक पुलिस थाने में शिकायत दर्ज हुई की 31 अगस्त को हुई एल्गार परिषद में दलितों को भड़काया गया जिसके चलते कोरेगांव भीमा की हिंसा हुई। 1 जनवरी को हुई हिंसा के संबंध में 31 दिसंबर को हुए प्रोग्राम के खिलाफ शिकायत दर्ज करनेवाला व्यक्ति था तुषार दामगुड़े जिसके हिंदू समर्थक होने की बाते सामने आती हैं, एक जानकारी के मुताबिक इस घटना के आरोपी संभाजी भिड़े के साथ इनकी तस्वीरें वायरल हैं।

यह मामला भड़काऊ भाषण देकर हिंसा भड़काने का था जो आज माओवादियों के साथ संबंध और प्रधानमंत्री की हत्या करने का कट रचने जैसी घटनाओं तक आ पहुँचा हैं ।  इस मामले की जाँच करते हुए पुलिस सुधीर ढवले तक पहुँची जो खुद एल्गार परिषद के आयोजन में शामिल था और उसीकी जाँच करते हुए पुलिस ने कुछ अहम सबूत जमा किये और फिर नागपुर,मुंबई और दिल्ली से पाँच लोगों को गिरफ्तार किया।


इन पांच लोगों पर आरोप एल्गार परिषद को लेकर कुछ भी नहीं था बल्कि इनपर आरोप ये थे की ये माओवादियों से संबंध रखते हैं, इनपर आरोप लगाया गया कि ये प्रधानमंत्री को मारने की साजिश रच रहे थे जिसके आधिकारिक पत्र पुलिस ने कोर्ट में पेश किये। कोर्ट के अलावा भाजपा प्रवक्ता ने भी इन पत्रों को अपनी प्रेस कांफेरेंस में जारी किया। इन्हीं पाँच लोगों की जाँच में कुछ और नाम सामने आये जिसके चलते पुलिस ने हाल ही में पांच एक्टिविस्ट को गिरफ्तार किया जिसकी आग देश से दुनियाभर में फ़ैल गयी। इस जांच में कुछ और पत्र सामने आये जिनमें कोरेगांव भीमा के प्रोग्राम को और ज़्यादा अच्छा बनाने और उसके लिए पैसे देने की बात कही गयी हैं।

कांग्रेस नेता का मोबाइल नंबर सामने आया 


पुलिस का मानना हैं कि माओवादी समर्थक होने के साथ माओवादियों द्वारा कोरेगांव भीमा में मानसिक तौर पर लोगों को भड़काने का काम इन लोगों ने किया हैं इतना ही नहीं उसके लिए पैसों का भी इंतज़ाम किया गया। हाल ही में आये एक पत्र में काँग्रेस के एक दिग्गज नेता का मोबाइल नंबर भी सामने आया जिसे मिडिया से पहले भाजपा प्रवक्ता रिलीज़ कर चुके थे। मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में हैं और कल इसपर फ़ैसला होना हैं कि इन पाँचों को गिरफ्तार किया जा सकता हैं या नहीं । पत्रों पर सवाल कई उठ रहे हैं इसके अलावा गिरफ्तार किये गए सभी दस लोगों के पहले रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि ये नक्सल गतिविधियों और माओवादियों का समर्थन करते आये हैं।

ऊपर दर्ज की गयी सभी चीज़े मैंने खुद रिपोर्टिंग के दरमियाँ रिपोर्ट की हैं इसलिए इसके source पर शक करने का आपको पूरा अधिकार हैं 



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