अगणो ने खुद शिव बनकर भष्मासुर पैदा किए क्या !




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हाल ही में एस सी एसटी एक्ट को लेकर पूरे भारत में बंद किया गया और हर दिन उसके खिलाफ सवर्णो का गुस्सा सोशल मीडिया पर दिखाई पडता है लेकिन सवर्णो को ये सोचना चाहिए कि जिस व्यक्ति को वो नेता बनाते हैं वो ही सवर्णो के लिए खिलाफ काम करने लगता है।

अगर आपको इसपर विश्वास नहीं हैं तो आप इसका इतिहास भी देख सकते है,


1980 में बीजेपी का गठन जब हुआ उस समय भले ही अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण रहे हो लेकिन इसे समाज में बनिया पार्टी के नाम से जाना जाता था क्योंकि उस समय सभी सवर्ण बडे नेता या तो कांग्रेस में थे या फिर या फिर जय प्रकाश नारायण के खेमें में थे।

उसी समय देश में 1989 में राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह उर्फ वी पी सिंह जनता दल से देश के प्रधानमंत्री बने।

जिस समय वी पी सिंह का पीएम बनना था उस समय बनारस औऱ देश के तमाम जगहों से सिर्फ एक ही नारा निकला था कि राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है लेकिन प्रधानमत्री बनने के बाद ही वी पी सिंह ने देश में मंडल आयोग की सिफारिसों के आधार पर आरक्षण लागू कर दिया। अगस्त 1990 को मंडल आयोग लागू करते ही पूरे देश में में करोड़ो लोग सड़को पर उतर गए और वी पी सिंह की सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज कर दिया।

ये सब वी पी सिंह ओबीसी और एससी एसटी के वोट बैंक के लिए किया था लेकिन 1990 में उनकी सरकार चली गई हालाकिं आरक्षण की आग में पूरा देश जलने लगा था कई लोगो ने देश में आत्म दहन शुरु कर दिया।

उसी समय राम मंदिर की आग अपने चरम पर पहुंच रही थी जिसके बाद पूरे अगण ( general Cast ) आडवाणी के रथ यात्रा और राम मंदिर के साथ जुड गए आडवाणी की यात्रा को देश भऱ में काफी समर्थन मिला और धीरे धीरे बनियों की पार्टी से बीजेपी अगणो की पार्टी के तौर पर अपनी पहचान बनाने लगी।

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अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और डा. मुरली मनोहर जोशी सहित संघ के कई नामों को जोड़ते हुए बीजेपी की सरकार पहले 13 दिन और फिर 13 महीने बाद में 5 साल तक  चली उस समय इंडिया शाइनिंग जैसे तमाम नारे दिए गए लेकिन 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आम चुनाव नहीं जीत पाई और कांग्रेस की सरकार बनी और डा. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने।

एक बार फिर 2014 में देश में फिर अगणो ने बीजेपी पर भरोसा दिखाया और नारा दिया अब की बार मोदी सरकार। करीब 2 दशक बाद किसी भी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

देश में एससी एसटी एक्ट के दुर्पयोग के तमाम मामले लोगो के सामने आने लगे, महाराष्ट्र में मराठो ने एक बीजेपी सरकार के खिलाफ एक बडा आंदोलन किया और एट्रोसिटी एक्ट में सहूलियत के लिए सरकार पर दबाव बनाया। उसी समय महाराष्ट्र के सुभाष महाजन की याचिका पर 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एट्रोसिटी एक्ट के गलत इस्तेमाल को लेकर कुछ नए नियम लागू किए जिसमें तुरंत गिरफ्तारी की जगह पहले जांच की बात कही गई और किसी डीसीपी या एसपी लेवल के अधिकारी के आर्डर के बाद ही गिरफ्तारी की बात कही गई।

इस फैसले से नाराज दलित संगठनो 2 अप्रैल को भारत बंद किया जिसमें हर राज्यो में दलित सड़को पर था। वी पी सिंह की तरह ही एक बार फिर नरेंद्र मोदी ने दलित वोट बैंक को बीजेपी के खेमे में लाने के चक्कर में संसद में कानून लाकर सर्व सम्मति से पारित करवा दिया जिसमें दलित का कानून फिर उसी तरीके से एक्टिव हो गया जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट आर्डर के पहले था।

लेकिन मोदी ये बात भूल गए कि दलितो को अपने पाले में लाने के चक्कर में वो अपने 2 दशक से भी ज्यादा समय से बीजेपी के पारंपारिक वोट बैंक को उन्होने सीधे चोट पहुंचाई है। यही नहीं पार्टी के कई एमएलए और कई बडे पदाधिकारियो पर भी एससी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया। वोट बैंक के नाराज होने के साथ साथ खुद की पार्टी में भी इस बात को लेकर मोदी का दबे मन से पूरे देश भऱ में विरोध शुरु हो गया।

अब जब 2019 सामने है तो तमाम विरोधी पार्टियां बीजेपी के खिलाफ उठे इस अगणों की आग शांत करने के बजाय धीरे - धीरे घी डालकर और तेजी के साथ आगे लेकर चल रही है जिससे आने वाले समय में बीजेपी और मोदी का भी वही हाल होगा जो वी पी सिंह के साथ हुआ था।

अगणो को मनाने के लिए बीजेपी में और खुद मोदी कैबिनेट में मंथन शुरु है लेकिन अब बीजेपी के साथ मुश्किल ये है कि संसद में बने कानून को बदलने के लिए उन्हें फिर संसद का ही सहारा लेना पड़ेगा और उसमें बीजेपी को समर्थन की उम्मीद भी नहीं है हालाकि कोर्ट में फिर पुनर्विचार याचिका औऱ कानून की समीछा के लिए याचिका डाली गई है लेकिन उससे उम्मीद ना के बराबर ही है और 2019 की आसान राह बीजेपी और मोदी ने अपने एक फैसले से कठिन कर ली है।





















Note – लेखक के विचार या लेख व्यक्तिगत हैं इसका किसी भी संस्था के साथ कोई संबंध नहीं है।










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