खैरलांजी हत्याकांड के 12 साल, हासिल क्या



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29 सितम्बर 2006 में नागपुर से 70 किलोमीटर दूर भंडारा जिले के खैरलांजी गाँव में उसी गाँव के लोगों ने एक दलित परिवार पर अमानवीय अत्याचार किये। उन दरिंदो ने इंसानियत की सारी हद तोड़ कर जातीय अभिमान में सुरेखा भोतमांगे और उसकी 17 साल की बेटी प्रियंका भोतमंगेखैरलांजी हत्याकांड को सरेआम गाँव में नंगा करके घुमाया और उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया। वो दरिन्दे इतने पर भी नहीं रुके बल्कि माँ-बेटी की योनी में बैलगाड़ी का सरिया तक डाल दिया। सुरेखा भोतमांगे के दोनों बेटों को भी पीट-पीट कर मार डाला और उनके लिंगो को भी कुचल डाला गया। यह बर्बरता होती रही और पूरा गाँव मूकदर्शक की तरह सबकुछ देखता रहा। घर के मुखिया भैयालाल भोतमांगे खेत में काम करने गये थे इसलिए बच गये। गांव के पिछड़ी जाति के 41 पुरुषों ने इस वारदात को अंजाम दिया था। सामूहिक बलात्कार और हत्या करके इस केस पर लीपा-पोती की गई। इस मामले में 1 अक्टूबर तक भी पुलिस ने कोई एफआईआर दर्ज नहीं की थी।

यह सबकुछ किया गया केवल जातिगत वैमनस्य और जलन के कारण। महीने भर की चुप्पी के बाद एक खोजी पत्रकार ने इस घटना पर अपनी स्टोरी की, तब जाकर यह घटना पूरे देश के सामने आई और अंतरराष्ट्रीय दवाब के चलते सरकार को एक्शन लेना पड़ा।

Photo - The Hindu 

6 सितम्बर 2008 को 41 लोगों में 36 लोगो को चिन्हित किया गया और उनमें से भंडारा डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने 6 आरोपियों को फांसी की सजा और दो को उम्रकैद की सजा मुकर्रर की। 16 सितम्बर 2008 को इस केस से एसी -एसटी एक्ट हटा दिया गया। 14 जुलाई 2010 को अपील करने के बाद न्यायालय ने 6 लोगों को मौत की सजा को 25 वर्ष की सश्रम कारावास में बदल कर अपराधियों को जीवनभर जीने का तोहफा दे दिया। अपनी पत्नी, बेटी और बेटों की याद को छाती से चिपटाए भैयालाल कोर्ट में चप्पलें घिसते रहे पर न्याय नहीं मिलाl घटना के एकमात्र गवाह जो जीवित बचे और न्याय के लिए अंतिम सांस तक लड़े भैयालाल भोतमांगे ने भी पिछले साल 20 जनवरी 2017 को दम तोड़ दिया।

आज 12 साल के बाद भी ये केस कोर्ट में झूल रहा। आज भी हालात बदत्तर हैं क्योंकि हम सोये हुए हैं। आज भी न आपकी उपस्थिति न्यायालय में है, ना प्रशासन में और न ही सरकार में। घटनाएँ अभी भी हो रही है और यही होता रहेगा जब तक आप जागेंगे नहीं। हज़ारों-लाखों केस हैं, लड़ाई है, संघर्ष है...............सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष को और तेज़ करने की जरुरत है।






यह लेख दीपाली तायड़े की वाल से साभार है। 









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