लखनऊ गोलीकांड : क्या मुआवज़ा किसी के जाने का दुःख और पुलिसिया रौबदारी को ख़त्म कर देगा

मर्डर
फ़ोटो - DB
खून का बदला मुआवज़े से, ये क्या बात हुई। मैं अपने गुस्से में, अपने रौब में जाकर किसी को भी गोली मार दूँ और फिर बाद में सहानुभूति और प्रायश्चित के नाम पर पैसे दे दूँ तो क्या उसको अच्छा लगेगा जिसने अपने बेटे, बहन, भाई या बाप को खोया है ? मुझे नहीं लगता जो अपने को प्यार करता होगा, उससे लगाव रखता होगा वो ऐसा करेगा, कम-से-कम मैं तो ऐसा कभी नहीं करूँगा। 

लखनऊ गोलीकांड

बात दे कि शुक्रवार रात एप्पल कंपनी के एरिया मैनेजर अपनी सहकर्मी सना के साथ अपने कार से घर जा रहे थे। तभी पुलिस कॉन्स्टेबल प्रशांत चौधरी ने उनके कार को रोकने की कोशिश की  लेकिन कार के न रोकने पर प्रशांत ने विवेक की कार पर गोली चला दी, गोली सीधे विवके के सर में लगी जिससे उसकी मौत हो गयी।

विवेक की मौत के बाद मामले ने मीडिया में हाईलाइट हो गया। विवेक की मौत की गंभीरता को देखते हुए जिले के डीएम ने कहा, ‘परिवार की सभी मांगें स्वीकृत हो गई हैं। अगर परिवार चाहेगा कि मामले की सीबीआई जांच हो, तो इसकी प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी। मृतक की पत्नी कल्पना तिवारी को नौकरी दी जाएगी और 25 लाख का मुआवजा दिया जाएगा। इस घटना की जांच 30 तीन के भीतर पूरी कर ली जाएगी।'

भले ही हिंसा के बदले हिंसा कोई समाधान नहीं है लेकिन मन में बदले की भावना ज़रूर होगी, जी करेगा मैं उस पर गुस्सा उतारूं। लेकिन अपने की जान के बदले पैसा, ये तो संभव ही नहीं और ये अपमान है जनता का। और तब तो यह और भी बड़ा अपराध है जब ऐसा जान बूझकर किया गया हो। 

भारतीय जनता के मन में पुलिस को लेकर कोई अच्छी छवि नहीं है, जिसको देखकर वह सुरक्षा की भावना से भर जाए बल्कि ऐसी छवि है कि उसे देखते ही आदमी और डर जाए। मुझे याद है बचपन में जब गांव में पुलिस आती थी चाहे किसी से मिलने ही क्यों न आयी हो, सारे बच्चे-बड़े घर में घुस जाते थे और सबके दरवाज़े बंद हो जाते थे डर के मारे। और यह स्थिति कमोबेश अब भी वही है। ये हमारी बहुत बड़ी नाकामी है। और यह बात उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अपने चरम पर है, वहां के लोगों में अपराधी और पुलिस को लेकिन सामान डर है। ये शर्म की बात है। 

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ही एक व्यक्ति द्वारा सिर्फ गाड़ी न रोकने की वजह से कोई कांस्टेबल गोली चला देता है, उसे रोकने का प्रयास नहीं करता और ऐसा करने के बाद लीपापोती करते हुए उसे आत्मरक्षा का हवाला देता है और मृतक के चरित्र हनन में लग जाता है जो सबसे आसान काम है। इससे बड़ी शर्म की बात क्या होगी अगर आपको शक है तो पकड़िए थाने ले जाइए पूछताछ कीजिए। या बिना कुछ जाने समझे गोली मार देंगे। ये बन्दूक और वर्दी का गुरुर नहीं तो और क्या है। 
अब जब मामले ने तूल पकड़ लिया तो मुआवज़े और नौकरी की बात होने लगी। सबसे बड़ी संवेदनहीनता और अमानवीयता की बात ये होती है कि हत्याओं के बाद ब्लडमनी देने की गलत परंपरा चल निकली है। ये बात सही है कि जिसके परिवार में कमाने वाल व्यक्ति नहीं रहा उसकी आर्थिक मदद ज़रूरी है लेकिन उस पैसे से उसकी मौत का सौदा कर देना तो शर्मनाक है। 

पैसा या मुआवज़ा या नौकरी से ज़्यादा महत्वपूर्ण न्याय है जो उस आम आदमी का अधिकार है। जो उसके साथ अन्याय हुआ है और जो उसके लिए ज़िम्मेदार है उसको सजा मिलना मुआवज़े से अधिक ज़रूरी है। ऐसा नहीं हुआ तो सिरफिरे लोग किसी को भी मारते फिरेंगे और सरकार मुआवज़े देती रहेगी नौकरी देती रहेगी भीख में। 
ये मामला बहुत ही सोचने वाला है कि जिसके ऊपर पूरे शहर और जनता का ज़िम्मा है जब उसी से डरने लगेगी जनता और खुद को उससे ही सुरक्षित महसूस नहीं करेगी तो फिर वो अपराध होने पर किसके पास जाएगी और किससे उम्मीद करेगी। ऐसे पुलिसवालों का घमंड किसने बढ़या जो इनको ऐसा शर्मनाक काम करने की हिम्मत देते हैं।


डियर गवर्नमेंट मुवावज़ा दीजिए या मत दीजिए नौकरी दीजिए या मत दीजिए ये ब्लडमनी से ज़्यादा ज़रूरी उस बात पर गौर करना है जो आपको और इस राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा रही है। 
वहीं इस मामले में आरोपी पुलिस कॉन्स्टेबल प्रशांत चौधरी का कहना है कि उस समय रात के 2 बज रहे थे। सड़क के किनारे उसे एक कार खड़ी दिखाई दी जिसकी लाइट्स बंद थी। संदेह होने पर वह उस गाड़ी के करीब गया। गाड़ी के पास जाते ही कार को ड्राइव कर रहा व्यक्ति (विवेक तिवारी) भागने लगा। कॉन्स्टेबल ने बताया- विवेक ने उसे कार से तीन बार मारने की कोशिश की। अपनी जान बचाने के लिए ही उस शख्स पर गोली चलानी पड़ी।










Comments